चंद्रयान-2 से इसरो का शनिवार को कनेक्शन टूटते ही भारत को करारा झटका लगा. हर कोई हैरान और परेशान था. लेकिन तभी कहानी में दिलचस्प मोड़ आया. इसरो चीफ के. सिवन ने विक्रम लैंडर को ढूंढ निकालने की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि इसरो वैज्ञानिक अब लैंडर विक्रम से संपर्क साधने का प्रयास कर रहे हैं. ऐसे में हर किसी के मन में बस एक ही सवाल आ रहा है कि आखिर कब लैंडर विक्रम से इसरो का संपर्क होगा?
ज्योतिष शास्त्र का खगोल विज्ञान से गहरा नाता है. एस्ट्रोलॉजी और
एस्ट्रोनॉमी को सिक्के के दो पहलू कहना गलत नहीं होगा. चांद की सतह को लगभग छूने की अवस्था में उससे
संपर्क टूटा है. संभव है यह पुनः स्थापित हो जाए. इसरो वैज्ञानिक इस प्रयास
में जुटे हुए हैं. खगोल विज्ञान में चंद्रयान-2 उड़ान में पूर्णतः सफल रहा माना जा सकता है.
यहां सिर्फ ज्योतिष शास्त्र द्वारा गंडमूल नक्षत्रों को भारी नक्षत्र मानने वाली थ्योरी पर भी विचार कर लिया जाता तो बेहतर होता. चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग के समय पृथ्वी के लिए चंद्रमा ज्येष्ठा से मूल नक्षत्र में प्रवेश लेने वाला था. इन्हें ज्योतिष में सबसे भारी व कष्टप्रद नक्षत्र माना जाता है.
इनमें जन्मे नवजातों की पुनः 27 दिन बाद यही नक्षत्र आने पर शांति कराई जाती है. ऐसे में यह विश्वास रखा जा सकता है कि विक्रम लैंडर से संपर्क इन नक्षत्रों की पुनः उदय होने पर हो जाए.
यह संधिकाल ज्योतिषशास्त्र में कठिनतर समय माना जाता है. 360 डिग्री के भ्रमण में चंद्रमा के लिए 120 डिग्री के तीन संधिकाल आते हैं. इनमें वह अक्षीय-कक्षीय गति को संतुलन देता है. दिक् परिवर्तन करता है. इनमें ज्येष्ठा-मूल का संधिकाल सबसे प्रभावशाली माना जाता है.
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तीनों संधिकाल की खास बात यह होती है कि नक्षत्र बदलने के साथ राशियां भी बदल जाती हैं. साथ ही मूल नक्षत्र का स्वामी केतु है. राहु-केतु ग्रहण लगाते हैं. सौरमंडल में महत्वपूर्ण बदलाव भी इनकी उपस्थिति के आसपास देखा जाता है.
छाया ग्रह राहु-केतु की उपस्थिति में पृथ्वी-चंद्रमा-सूर्य के सीध में आने पर ही ग्रहण बनते हैं. यह अवस्था पृथ्वी और उसके उपग्रह चंद्रमा को सौरमंडल में सटीक भ्रमण के लिए आवश्यक करेक्शन देती है. गुरुत्वीय और चुंबकीय बल में संतुलन लाती है.
चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर भी चंद्रमा पर रात्रि 1 बजकर 56 मिनट पर सॉफ्ट लैंडिंग लेने वाला था. उसका संपर्क लगभग रात्रि पौने दो बजे टूट गया. यह समय ज्येष्ठा और मूल के संधिकाल के आसपास ही था. विक्रम लैंडर की. लैंडिंग के लगभग 3 घंटे बाद चंद्रमा रात्रि 4 बजकर 57 मिनट पर ज्येष्ठा से मूल नक्षत्र में प्रवेश करने वाला था.
ज्योतिष में कुल तीन ऐसे संधिकाल रेवती-अश्वनी, अश्लेषा-मघा और ज्येष्ठा-मूल नक्षत्र में बनते हैं. यह समय राशि और नक्षत्र दोनों के बदलाव का होता है. इस अवस्था को कष्टप्रद समय माना जाता है. इनमें ज्येष्ठा-मूल का संधिकाल कठिनतर होता है.