Mahashivratri Vrat Katha: जानें महाशिवरात्रि व्रत की पावन कथा, जिसे सुनने से मिलता है संपूर्ण फल

Mahashivratri Vrat Katha:महाशिवरात्रि भगवान शिव को समर्पित प्रमुख हिंदू पर्व है. यह फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है. मान्यता है कि इसी पावन रात्रि में भगवान शिव ने तांडव किया था और माता पार्वती के साथ उनका विवाह भी इसी दिन हुआ माना जाता है.

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महाशिवरात्रि महाशिवरात्रि

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 15 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:07 AM IST

Mahashivratri Vrat Katha: भगवान शिव की असीम कृपा और महाशिवरात्रि व्रत की महिमा का वर्णन प्राचीन ग्रंथों में अत्यंत श्रद्धा के साथ किया गया है. शिव पुराण में भी इस व्रत को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है.  मान्यता है कि जो मनुष्य महाशिवरात्रि का व्रत कर लेता है, वह शिवकृपा का पात्र बन जाता है और यमदूत भी उसके समीप नहीं आते. इसलिए इस पावन व्रत के अवसर पर इस कथा का श्रवण और पाठ विशेष फलदायी माना गया है. 

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प्राचीन समय में चित्रभानु नाम का एक शिकारी रहता था. वह जंगल में शिकार करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता था.  एक बार उस पर एक साहूकार का भारी कर्ज हो गया.  समय पर ऋण न चुका पाने के कारण साहूकार ने उसे शिव मठ में बंदी बना दिया.  संयोगवश जिस दिन उसे बंदी बनाया गया, वह महाशिवरात्रि का दिन था.

चतुर्दशी के दिन उसने वहां महाशिवरात्रि व्रत की कथा सुनी.  संध्या समय साहूकार ने उसे बुलाकर ऋण चुकाने की याद दिलाई और फिर छोड़ दिया. बंदीगृह में रहने के कारण वह अत्यंत भूखा-प्यासा था. वह शिकार की खोज में दूर जंगल में निकल गया. रात होने पर उसने एक पेड़ पर चढ़कर वहीं विश्राम करने का निश्चय किया.

उस पेड़ के नीचे एक शिवलिंग स्थापित था, जो बेलपत्रों से आच्छादित था.  शिकारी को इसकी कोई जानकारी नहीं थी। पेड़ पर बैठते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे अनजाने में शिवलिंग पर गिरती रहीं. इस प्रकार बिना अन्न-जल ग्रहण किए उसका उपवास भी हो गया और बेलपत्र अर्पित होने से पूजा भी संपन्न होने लगी. 

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रात के प्रथम प्रहर में एक गर्भवती हिरणी पानी पीने आई. शिकारी ने जैसे ही धनुष उठाया, हिरणी बोली— “मैं गर्भवती हूं. यदि तुम मुझे मारोगे तो दो प्राणों का नाश होगा. मुझे संतान को जन्म देने दो, मैं वचन देती हूं कि लौट आऊंगी.” शिकारी ने उसे जाने दिया.

कुछ समय बाद दूसरी हिरणी आई. उसने विनम्रतापूर्वक कहा— “मैं अभी ऋतु से निवृत्त हुई हूं और अपने पति की खोज में हूं. उससे मिलकर शीघ्र ही लौट आऊंगी.” शिकारी ने उसे भी छोड़ दिया.

रात के अंतिम प्रहर में एक हिरणी अपने बच्चों सहित आई. उसने भी प्रार्थना की और शिकारी का हृदय फिर द्रवित हो गया. वह भी चली गई. अंत में एक हिरण आया. शिकारी ने निश्चय किया कि अब इसे नहीं छोड़ेगा. परंतु हिरण ने कहा— “जैसे तुमने मेरी पत्नियों पर विश्वास किया, वैसे ही मुझ पर भी विश्वास करो. हम सब मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित होंगे.” शिकारी ने उसे भी जाने दिया.

पूरी रात वह जागता रहा. इस प्रकार उपवास, रात्रि जागरण और बेलपत्र अर्पण— ये सभी कर्म अनजाने में पूर्ण हो गए और उसकी महाशिवरात्रि की पूजा संपन्न हो गई.

प्रातः होते ही हिरण अपने पूरे परिवार सहित उसके सामने उपस्थित हो गया. उनका सत्य और समर्पण देखकर शिकारी के हृदय में गहन पश्चाताप हुआ. उसने सभी को जीवनदान दे दिया.

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अनजाने में किए गए इस व्रत के प्रभाव से उसे अंततः मोक्ष प्राप्त हुआ. मृत्यु के समय जब यमदूत उसे लेने आए, तब शिवगणों ने उन्हें लौटा दिया और उसे शिवलोक ले गए. भगवान शिव की कृपा से चित्रभानु को अपने पूर्व जन्म की स्मृति बनी रही और अगले जन्म में भी उसने श्रद्धापूर्वक महाशिवरात्रि व्रत का पालन किया.

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