15 फरवरी को महाशिवरात्रि है. इस दिन भक्त पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ भोलेनाथ की पूजा करते हैं. कोई गंगाजल और पंचामृत से शिवलिंग का अभिषेक करता है. तो कोई भांग-धतूरा और बेलपत्र अर्पित करके भगवान को प्रसन्न करता है. युगों-युगों से संसार ऐसे ही महादेव को पूजता आया है. हालांकि शास्त्रों में महादेव से ईर्ष्या करने वालों का भी जिक्र मिलता है. इनमें दक्ष प्रजापति का नाम सबसे ऊपर आता है. कहते हैं कि दक्ष प्रजापति ने हमेशा शिवजी का तिरस्कार किया. महादेव के प्रति उनके मन में घृणा और द्वेष का स्तर क्या था, इसका प्रमाण दो पौराणिक कथाओं में मिलता है.
दक्ष प्रजापति ब्रह्मा के मानस पुत्र थे. उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा जी के दाएं अंगूठे से हुई थी. दक्ष प्रजापति की दो पत्नियां थीं- प्रसूति और वीरणी. प्रसूति से दक्ष की 24 पुत्रियां थीं और वीरणी से 60 पुत्रियां. इस तरह दक्ष की कुल 84 पुत्रियां थीं. मान्यता है कि समस्त दैत्य, गंधर्व, अप्सराएं, पशु-पक्षी सब इन्हीं से उत्पन्न हुए थे. आज भी संसार दक्ष प्रजापति की पुत्रियों को किसी न किसी रूप में पूज रहा है.
पहली कथा
दक्ष प्रजापति ने अपनी 27 कन्याओं का विवाह चंद्र देव से किया था. लेकिन इन कन्याओं में सबसे सुंदर रोहिणी थी. इसलिए चंद्र देव रोहिणी से सर्वाधिक स्नेह रखते थे. यह बात अन्य 26 पत्नियों को अच्छी नहीं लगती थी. इसकी खबर जब राजा दक्ष को हुई तो उन्होंने चंद्र देव को आमंत्रित कर सभी पुत्रियों के साथ समान व्यवहार और स्नेह करने का आग्रह किया. चंद्र देव ने भी वचन दिया कि वो भविष्य में ऐसा भेदभाव नहीं करेगा.
लेकिन चंद्र देव ने अपना भेदभावपूर्ण रवैया जारी रखा. तब अन्य 26 पुत्रियों ने पुनः इसकी शिकायत अपने पिता राजा दक्ष से की. दक्ष प्रजापति अपनी पुत्रियों के साथ हो रहा भेदभाव सहन न कर पाए और क्रोधित होकर चंद्र देव को कुरूप होने का श्राप दे दिया. श्राप लगते ही दिन-प्रतिदिन चंद्र देव की सुंदरता और तेज घटने लगा. तब नारद जी ने चंद्र देव को बताया कि इस समस्या का समाधान केवल भगवान शिव के पास है.
तब चंद्र देव भगवान शिव के पास पहुंचे और उनकी आराधना की. चंद्र देव की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें आंशिक रूप से श्रापमुक्त किया. महादेव ने कहा कि कृष्ण पक्ष से शुक्ल पक्ष की ओर बढ़ते हुए आप अपनी कलाएं वापस पाने लगेंगे. इस तरह चंद्र देव को शिव की जटाओं में बसने और कभी पूरी तरह विलुप्त न होने का दिव्य वरदान मिल गया.
इस बात का पता जब दक्ष प्रजापति को लगा तो वो अत्यंत क्रोधित हो गए और शिवजी से युद्ध करने कैलाश पर्वत पहुंच गए. शिव और दक्ष प्रजापति के बीच युद्ध छिड़ गया. इस युद्ध को रोकने के लिए ब्रह्मा और भगवान विष्णु को आना पड़ा था. कहते हैं कि तभी से दक्ष प्रजापति भगवान शिव से ईर्ष्या रखने लगे.
दूसरी कथा
एक पौराणिक कथा के अनुसार, शिवजी के औघड़ स्वरूप के कारण दक्ष सती का विवाह शिव से नहीं करना चाहते थे. इसलिए जब उन्होंने सती का स्वयंवर कराने का निर्णय किया, तो इस स्वयंवर में दक्ष ने तमाम गंधर्व, यक्ष, देवों को आमंत्रित किया, लेकिन शिव को नहीं बुलाया. इतना ही नहीं, महादेव को अपमानित करने के लिए उन्होंने उनकी एक प्रतिमा बनाकर मुख्य द्वार के पास लगा दी.
जब यह बात सती को पता चली तो उन्होंने स्वयंवर छोड़कर उसी शिव मूर्ति के गले में वरमाला डाल दी. तभी भगवान शिव वहां साक्षात प्रकट हो गए. भगवान शिव ने सती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया और उन्हें लेकर कैलाश धाम चले गए. इस पर दक्ष बुरी तरह भड़क गए.
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