15 फरवरी यानी कल देशभर में महाशिवरात्रि का पावन पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा. इस दिन लोग शिव भक्ति से सराबोर रहेंगे. मंदिरों से लेकर शिवालयों तक हर हर महादेव के जयकारे गूंजेंगे. भगवान को प्रसन्न करने के लिए शिव भक्त शिवलिंग का गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करेंगे. भांग, धतूरा, शमीपत्र और बेलपत्र भी शिवलिंग पर खूब चढ़ेगा. महादेव को ये चीजें अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए उनका हर भक्त शिवलिंग पर इन चीजों को जरूर चढ़ाता है.
लेकिन क्या कभी आपने महादेव के एक ऐसे भक्त के बारे में सुना है जो मुंह में पानी भरकर शिवलिंग का अभिषेक करता था. शिवजी को प्रसन्न करने के लिए उनका यह भक्त शिवलिंग पर मांस भी चढ़ाता था. हम बात कर रहे हैं भगवान शिव के सबसे परम भक्तों में से एक कन्नप्पा नायनार की. शिव भक्तों में कन्नप्पा का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है. शिव के प्रति कन्नप्पा की आस्था भक्ति के परंपरागत नियमों से एकदम अलग थी. लेकिन अटूट विश्वास और समर्पण से भरी हुई थी.
कन्नप्पा दक्षिण भारत का एक शिकारी था, जिसका जीवन अत्यंत सरल, साहसी और प्रकृति के करीब था. कन्नप्पा शास्त्रों और विधि-विधान से बिल्कुल अनजान था. लेकिन उसके हृदय में शिव के लिए घनिष्ठ प्रेम था. यही आस्था उसे शिव के सबसे महान भक्तों में सर्वोपरि बनाती थी.
कैसे शिव भक्त बना कन्नप्पा?
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार कन्नप्पा जंगल में शिकार करने निकला. जंगल में शिकार की तलाश करते हुए उसकी नजर एक शिला पर पड़ी. कन्नप्पा उसे देखकर वहीं ठहर गया. कन्नप्पा समझ गया कि यह कोई साधारण शिला नहीं है. बल्कि यह किसी महान देवता का प्रतीक है, जिसे भोजन और देखभाल की आवश्यकता है. उसी दिन से कन्नप्पा ने उस शिला की देखरेख और पूजा का संकल्प ले लिया. हालांकि कन्नप्पा को पूजा के तौर-तरीके तो पता नहीं थे. इसलिए उसने खुद से ही उस शिला की सेवा का रास्ता ढूंढ लिया.
कन्नप्पा की अनोखी पूजन विधि
कन्नप्पा को पूजा की पारंपरिक विधि का ज्ञान नहीं था. और न ही उसके पास ऐसी कोई कीमती चीज थी, जिसे वो शिवलिंग को अर्पित करता. चूंकि शिकार उसकी सबसे पसंदीदा चीज थी, इसलिए वो शिकार से लाया हुआ मांस ही शिवलिंग पर अर्पित करत था. वो एक वन में रहने वाला शिकारी था, इसलिए उसके पास पानी के लिए कोई पात्र भी नहीं था. इसलिए कन्नप्पा मुंह में पानी भरकर लाता और उससे शिवलिंग का अभिषेक करता था. अपने हाथों से वो रोज शिवलिंग और उसके आस-पास सफाई करता. पारंपरिक दृष्टि से यह आचरण सामान्य नहीं था.
भक्ति की अंतिम परीक्षा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक दिन उस शिवलिंग की एक आंख से रक्त बहने लगा. यह देख कन्नप्पा परेशान हो गया. उसने बिना सोचे-समझे अपनी एक आंख निकालकर शिवलिंग को अर्पित कर दी. ताकि रक्तस्राव रुक जाए. तभी शिवलिंग की दूसरी आंख से भी रक्त बहने लगा. यह देख कन्नप्पा ने अपनी दूसरी आंख भी अर्पित करने का प्रण लिया.
कन्नप्पा ने पैर से शिवलिंग पर एक स्थान को चिह्नित किया और जैसे ही वो अपनी दूसरी आंख निकालने लगे, वहां स्वयं भगवान शिव प्रकट हो गए. भगवान शिव ने कन्नप्पा को ऐसा करने से रोक लिया. शिवजी उसकी अटूट भक्ति से प्रसन्न हो गए और उन्होंने कन्नप्पा को अपना परम भक्त मानकर उसे मोक्ष प्राप्ति का वरदान दे दिया. दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश स्थित भक्त कन्नप्पा से जुड़ा श्रीकालहस्ती मंदिर आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है.
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