Jain Muni: जैन मुनि कपड़े क्यों नहीं पहनते? केवल वैराग्य नहीं, इसके पीछे छिपे हैं ये 5 कारण

Jain Muni: जैन मुनि पूर्ण त्याग और अहिंसा के प्रतीक हैं. दिगंबर मुनि 'अपरिग्रह' का पालन करते हुए वस्त्रों का त्याग कर दिशाओं को ही अपना अंबर मानते हैं. वे पैदल विहार, केश लोच और कठोर उपवास द्वारा इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर मोक्ष मार्ग पर चलते हैं, जो आत्म-संयम की मिसाल है.

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aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 31 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 1:11 PM IST

Jain Muni: दुनियाभर में जैन धर्म अपनी कठिन तपस्या और अहिंसा के लिए जाना जाता है. आपने अक्सर देखा होगा कि दिगंबर जैन मुनि शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं पहनते. कड़कड़ाती ठंड हो या चुभती गर्मी, वे हमेशा इसी अवस्था में रहते हैं. कई लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर इसके पीछे का असली कारण क्या है? क्या यह सिर्फ एक परंपरा है या कोई बड़ी वजह? 

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1. दिशाओं को ही अपना वस्त्र मानना
'दिगंबर' शब्द का अर्थ बहुत गहरा है. इसका मतलब होता है 'दिक्' (दिशाएं) और 'अंबर' (आकाश या कपड़ा). यानी वे मुनि जिनके लिए चारों दिशाएं ही उनके कपड़े हैं. वे खुद को किसी खास कपड़े में बांधने के बजाय पूरी कुदरत और आसमान को ही अपना पहनावा मानते हैं. उनके लिए ईश्वर की बनाई यह प्रकृति ही उनका घर और उनका वस्त्र है. 

2. किसी भी चीज़ से मोह न रखना
जैन धर्म में अपरिग्रह का बहुत महत्व है, जिसका सीधा सा मतलब है. किसी भी वस्तु को इकट्ठा न करना. एक सच्चा मुनि वही है जिसका इस दुनिया की किसी भी चीज़ से कोई लगाव न हो. अगर वे कपड़े पहनेंगे, तो उन्हें धोने, सुखाने और सहेजने की चिंता रहेगी. इन सब झंझटों और मोह-माया से दूर रहने के लिए वे कपड़ों का पूरी तरह त्याग कर देते हैं. 

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3. छोटे जीवों की रक्षा करना (अहिंसा)
जैन मुनि अहिंसा का बहुत सख्ती से पालन करते हैं.  वे मानते हैं कि कपड़ों में पसीना या नमी होने से छोटे-छोटे कीटाणु या सूक्ष्म जीव पैदा हो सकते हैं. जब कपड़े धोए या झाड़े जाते हैं, तो उन बेगुनाह जीवों की जान जा सकती है. जीव-हत्या के इसी पाप से बचने के लिए मुनि बिना कपड़ों के रहना बेहतर समझते हैं, ताकि उनकी वजह से किसी छोटे जीव को भी तकलीफ न हो. 

4. सर्दी-गर्मी पर जीत हासिल करना
बिना कपड़ों के रहना कोई मामूली बात नहीं है. यह मन और शरीर को काबू में करने का एक तरीका है.  जैन मुनि इस माध्यम से खुद को इतना मजबूत बना लेते हैं कि उन्हें न तो तेज धूप सताती है और न ही बर्फीली ठंड. वे दुनिया को यह दिखाते हैं कि इंसान का मन अगर मजबूत हो, तो वह शरीर की हर जरूरत और तकलीफ पर जीत हासिल कर सकता है. 

5. जन्म के समय जैसी मासूमियत और सादगी
जैन शास्त्रों के अनुसार, मोक्ष पाने के लिए इंसान को वैसा ही सरल और निष्कपट होना चाहिए जैसा वह पैदा होते समय था. एक छोटा बच्चा जैसे बिना कपड़ों के भी मासूम और विकारों से दूर रहता है, वैसे ही मुनि भी लोक-लाज और दुनियादारी के बंधनों को तोड़कर अपनी प्राकृतिक अवस्था में रहते हैं.  इसे 'यथाजात रूप' कहा जाता है, जो पूरी तरह पवित्र माना जाता है. 

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