Garud Puran: गरुड़ पुराण के अनुसार इस संसार में जो भी जन्म लेता है, उसका अंत निश्चित है. मनुष्य, देवता, पशु या पक्षी, चाहे कोई भी मृत्यु से बच नहीं सकता है. यहां तक कि ग्रह, नक्षत्र और सूर्य तक की भी एक तय आयु होती है. इसे ही जन्म और मृत्यु का चक्र कहा गया है. इस चक्र में व्यक्ति अपने कर्मों और मानसिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग योनियों में जन्म लेता है. यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो जाती है.
गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद की प्रक्रियाओं को लेकर कई नियम बताए गए हैं. इन्हीं में से एक सवाल यह भी है कि मृत्यु के बाद शव को अकेला क्यों नहीं छोड़ा जाता है और किन हालात में अंतिम संस्कार तुरंत नहीं किया जाता है. आइए इसे आसान शब्दों में समझते हैं.
शव को अकेला न छोड़ने के पीछे 3 मुख्य कारण
1. सुरक्षा कारण
गरुड़ पुराण के अनुसार, यदि शव को बिना निगरानी के छोड़ दिया जाए, तो उस पर कीड़े-मकोड़े, चींटियां या अन्य जीव नुकसान पहुंचा सकते हैं. इसी वजह से कोई व्यक्ति पास में बैठकर उसकी देखभाल करता है.
2. नकारात्मक शक्तियों से बचाव
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रात के समय शव को अकेला छोड़ देने से नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव हो सकता है. इससे परिवार पर भी मानसिक और भावनात्मक संकट आ सकता है.
3. आत्मा का जुड़ाव
गरुड़ पुराण में बताया गया है कि जब तक शरीर का अंतिम संस्कार नहीं होता है, तब तक आत्मा किसी न किसी रूप में उस शरीर और अपने परिजनों से जुड़ी रहती है. ऐसे में शव को अकेला छोड़ देना आत्मा को कष्ट पहुंचा सकता है.
इन 3 कारणों से कुछ समय के लिए टाल दिया जाता है दाह संस्कार
1. सूर्यास्त के बाद मृत्यु होने पर
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु सूर्यास्त के बाद होती है तो उसी समय उसका दाह संस्कार नहीं किया जाता है. ऐसी स्थिति में शव को रात भर घर में रखा जाता है और अगली सुबह अंतिम संस्कार किया जाता है. धार्मिक ग्रंथों में माना गया है कि रात में दाह संस्कार करने से आत्मा को शांति नहीं मिलती और उसकी गति बाधित हो सकती है.
2. पंचक काल में मृत्यु होने पर
गरुड़ पुराण के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का निधन पंचक काल के दौरान होता है, तो पंचक समाप्त होने तक दाह संस्कार नहीं किया जाता है. इस दौरान शव को घर में ही रखा जाता है और उसकी देखरेख की जाती है. मान्यता है कि पंचक में मृत्यु होने पर विशेष दोष लगता है. इसी दोष से बचने के लिए कुछ विशेष धार्मिक उपाय किए जाते हैं, जिससे नकारात्मक प्रभाव समाप्त हो जाए.
3. पुत्र या पुत्री के दूर होने की स्थिति में
अगर मृतक का पुत्र या पुत्री किसी कारणवश उस समय पास में मौजूद न हो, तो उनके आने तक अंतिम संस्कार रोका जाता है. मान्यता है कि संतान के हाथों किया गया दाह संस्कार आत्मा को शांति देता है. इसलिए तब तक शव को घर में रखा जाता है और कोई न कोई व्यक्ति उसके पास रहता है.
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