Buddha Purnima 2026: हर साल वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध जयंती मनाई जाती है. माना जाता है कि इसी पावन तिथि पर गौतम बुद्ध का जन्म हुआ, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और उन्होंने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था. यही कारण है कि इस दिन को बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है, जो पूरी दुनिया में शांति और करुणा के संदेश का प्रतीक माना जाता है. लेकिन गौतम बुद्ध का जीवन सिर्फ उपदेशों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह गहरे अनुभवों से भरा हुआ था. एक ऐसी गौतम बुद्ध से जुड़ी एक घटना हमें जीवन का असली अर्थ समझाती है, जब उन्होंने एक पीड़ित मां को बहुत सरल तरीके से जीवन की सच्चाई का बोध कराया. चलिए जानते हैं उस कथा के बारे में.
जीवन के सच्चे अर्थ से कराया रूबरू
कथा के मुताबिक, 'एक बार एक महिला अपने मृत बेटे को गोद में लेकर गौतम बुद्ध के पास पहुंची थी. उसका दुख इतना गहरा था कि वह बार-बार रोते हुए बुद्ध से गुहार लगाने लगी कि किसी तरह उसके बच्चे को वापस जीवित कर दें. उसकी हालत देखकर वहां मौजूद सभी लोग भावुक हो गए. गौतम बुद्ध ने उस महिला की बात ध्यान से सुनी और फिर शांत स्वर में कहा कि वे उसके पुत्र को जीवन दे सकते हैं, लेकिन इसके लिए उसे एक काम करना होगा. उन्होंने कहा कि वह एक मुट्ठी सरसों के दाने ऐसे घर से लेकर आएं, जहां आज तक कभी किसी की मृत्यु न हुई हो.'
महिला ने जाना मृत्यु का सच
महिला को यह काम आसान लगा और वह तुरंत सरसों के दाने लेने के लिए घर-घर जाने लगी. वह हर दरवाजे पर जाकर एक ही सवाल पूछती- 'क्या आपके घर में कभी किसी की मृत्यु नहीं हुई?' लेकिन हर घर से उसे एक ही जवाब मिलता. किसी ने अपने पिता को खोया था, किसी ने मां को, तो किसी के घर से भाई, बहन या संतान हमेशा के लिए चली गई थी. हर घर किसी न किसी दुख से जुड़ा हुआ था. धीरे-धीरे जब वह यह सब सुनती गई, तो उसके मन की सोच बदलने लगी. उसे समझ आने लगा कि मृत्यु हर जीवन का हिस्सा है, कोई भी इससे बच नहीं सकता है.
कई घरों से खाली हाथ लौटने के बाद जब वह फिर से गौतम बुद्ध के पास पहुंची, तो उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन इस बार उसके अंदर दुख के साथ समझ भी थी. बुद्ध ने उससे पूछा कि 'क्या वह सरसों के दाने लेकर आई है. वह कुछ नहीं बोली और चुपचाप उनके चरणों में बैठ गई.' अब उसे यह स्पष्ट हो चुका था कि जीवन और मृत्यु दोनों ही जीवन का सबसे बड़ा सत्य हैं, और मोह ही दुख की जड़ है. बुद्ध ने उसे शांति से आशीर्वाद दिया. इसके बाद वह मां अपने पुत्र के अंतिम संस्कार के लिए चली गई, लेकिन इस बार उसके मन में केवल शोक नहीं, बल्कि शांति थी.
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