इस साल वैशाख माह की पूर्णिमा 1 मई को है, जिसे बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है. यह दिन भगवान विष्णु के 9वें अवतार भगवान बुद्ध को समर्पित है. उन्होंने संसार को सत्य, अहिंसा, प्रेम, दया, करुणा और सेवा का संदेश दिया था, जिसका प्रभाव आज भी लोगों पर दिखाई देता है. आज भी भारत सहित कई देशों में लोगों ने बौद्ध धर्म को अपनाकर उनके विचारों को अपने जीवन में उतारा हुआ है. क्या आप जानते हैं कि दुनिया के अंधियारे जीवन को ज्ञान के प्रकाश से रोशन करने वाले बुद्ध की मृत्यु कैसे हुई थी.
मान्यता है कि एक बार भगवान गौतम बुद्ध कुंडा नाम के लोहार के निमंत्रण पर उसके घर भोजन के लिए गए थे. तब कुंडा भोजन के लिए जंगल से मशरूम लेकर आया था. लेकिन अनजाने में वह जंगल से जहरीला मशरूम ले आया. भगवान बुद्ध ने जैसे ही उस भोजन का पहला निवाला खाया, उन्हें समझ आ गया कि खाने में कुछ गड़बड़ है. कुंडा का मान रखने के लिए उन्होंने वहां भोजन किया, लेकिन उसे अपने शिष्यों को परोसने से मना कर दिया. इस तरह वो जहरीला भोजन खाने से गौतम बुद्ध की मृत्यु हो गई. लेकिन उन्होंने अपने सभी शिष्यों का जीवन बचा लिया.
कहते हैं कि भोजन करने के कुछ समय बाद भगवान बुद्ध की तबीयत बिगड़ने लगी. वह भूमि पर विश्राम मुद्रा में लेट गए और उसी अवस्था में अपना अंतिम उपदेश देना शुरू कर दिया. उनके शिष्य वहां एकत्र हुए और गुरु के अंतिम वचन सुने. इसी अवस्था को महापरिनिर्वाण की मुद्रा कहा जाता है.
सूअर के मांस के पीछे क्या है सच्चाई?
अब कुछ लोगों के बीच ऐसी भ्रांति है कि गौतम बुद्ध की मृत्यु सूअर का मांस खाने से हुई थी. दरअसल, गौतम बुद्ध के शिष्य बुद्ध घोष ने अपनी किताब सुमंगल विलासिनी में सूकर मद्दव शब्द का जिक्र किया था, जिसे लोगों ने सूअर का मांस समझ लिया. लेकिन सच्चाई ये है कि शूकर मद्दव एक खास किस्म के मशरूम का नाम था, जिसे जंगल में सूअर खोदकर निकालते थे. यह मशरूम खाने में बड़ा स्वादिष्ट होता था. लेकिन इसकी कुछ प्रजातियां जहरीली होती थी.
बताते चलें कि गौतम बुद्ध के देहावसान के बाद कई दिनों तक लोग अंतिम दर्शन के लिए आते रहे. बाद में उनके अवशेषों को लेकर विभिन्न राज्यों के बीच विवाद हुआ. अंततः एक ब्राह्मण द्रोण ने समझौता कराया और अवशेषों को आठ भागों में विभाजित किया गया. बाद में सम्राट अशोक ने उन्हें अनेक स्तूपों में स्थापित कराया, जिससे बुद्ध का संदेश दूर-दूर तक फैल सका.
भगवान गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व लुम्बिनी के पास हुआ था. उनका प्रारंभिक नाम सिद्धार्थ था. राजसी जीवन के बीच भी उनका मन सांसारिक मोह माया से मुक्त हो गया. 29 वर्ष की आयु में उन्होंने वैराग्य का मार्ग चुना और जीवन के गहरे सत्य की खोज में निकल पड़े. आगे चलकर उन्होंने अनेक उपदेश दिए और लोगों को संयम, शांति और जागरूक जीवन का रास्ता बताया.
aajtak.in