छोटा सा काला तिल मकर संक्रांति के दिन इतना जरूरी क्यों हो जाता है?

मकर संक्रांति के अवसर पर तिल का धार्मिक, सांस्कृतिक और आयुर्वेदिक महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है. तिल से स्नान, दान, और भोजन करने की परंपरा पाप नष्ट करने और स्वास्थ्य लाभ देने वाली मानी जाती है. मिथिला क्षेत्र में तिल-तिल बहबे की परंपरा से परिवार में प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है.

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मकर संक्रांति पर तिल के दान और भोजन का महत्व है मकर संक्रांति पर तिल के दान और भोजन का महत्व है

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 12 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:58 PM IST

मकर संक्रांति के मौके पर स्नान-ध्यान और दान का महत्व है. इस दिन तिल का उपयोग खास तौर पर किया जाता है. जो लोग संक्रांति स्नान के लिए नदी तट पर नहीं जा पाते हैं उनके लिए कहा गया है कि वह तिल मिले जल से स्नान करें तो उन्हें तीर्थ स्नान का फल मिल जाता है. इसके अलावा सर्दी के मौसम तिल सिर्फ खाद्य पदार्थ नहीं औषधि बन जाता है.

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तिल का आयुर्वेद में बड़ा ही महत्त्व हैं.

तिलस्नायी तिलोद्वर्ती तिलहोमी तिलोदकी । 
तिलभुक् तिलदाता च षट्तिलाः पापनाशनाः ।। 

यानी तिल मिले जल से स्नान, तिल के तेल से शरीर में मालिश, तिल से ही यज्ञ में आहुति, तिल मिले जल को पीना और भोजन में तिल का प्रयोग और तिल का दान षट्तिला में तिल के ये छह प्रकार के कार्य करने से पर्व का लाभ मिलता है और पाप नष्ट हो जाते हैं. इस बार मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी एक ही दिन है और सनातन परंपरा में दोनों ही पर्व तिल के महत्व को बताने वाले हैं.

तिल की उत्पत्ति की कहानी
कहते हैं कि जब हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रहलाद पर लगातार अत्याचार कर रहा था तो यह देखकर भगवान विष्णु क्रोध से भर उठे. गुस्से में उनका सारा शरीर पसीने से भींग गया. यह पसीना जब जमीन पर गिरा तब तिल की उत्पत्ति हुई. तिल को गंगाजल के ही समान पवित्र माना गया है. माना जाता है कि जिस तरह गंगा जल का स्पर्श मृत आत्माओं को वैकुंठ के द्वार तक पहुंचा देता है ठीक इसी तरह तिल भी पूर्वजों, भटकती आत्माओं और अतृप्त जीवों को मोक्ष का मार्ग दिखाता है. इसलिए तिल धार्मिक तौर पर भी बहुत महत्वपूर्ण बन जाता है.

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बिहार के मिथिला क्षेत्र में तिल को लेकर अलग ही मान्यताएं हैं. यहां गंगा (या नदी स्नान) के बाद अपने प्रियजनों के हाथों में तिल दिया जाता है और तिल-तिल बहबे कहा जाता है. इस लोक वाक्य के कई तरह के अर्थ हैं. पहला अर्थ है कि तिल-तिल बढ़ो, यानी तरक्की करो. यह कामना इसलिए की जाती है क्योंकि धीरे-धीरे हुई तरक्की का मूल्य व्यक्ति समझ पाता है और वह सार्थक होती है. इसके साथ ही तिल-तिल बहबे का अर्थ है कि अगर कोई कष्ट है तो वह तिल-तिल करके खत्म हो जाए. 

तिल-तिल बहबे की परंपरा और इसका अर्थ
इस तरह एक परंपरा और है. माताएं स्नान के बाद अपने बेटों के हाथ में तिल देकर 'तिल-तिल बहबे' कहती हैं. इस तिल में चावल और गुड़ भी मिले होते हैं. जहां तिल पिता और पूर्वजों के प्रतीक हैं, चावल माता के और गुड़ प्रेम और सामंजस्य का प्रतीक बन जाता है. पुत्र उसे अपने हाथों में लेकर मां को माता-पिता की सेवा और कुल की मर्यादा रखने और पितृकर्म के निभाने का वचन देते हैं.

माताएं तिल-गुण को पांच बार बेटों के हाथ में रखती हैं और उनसे एक सवाल करती हैं कि क्या वो उनके साथ तिल तिल बहेंगे और पुत्र जवाब में हां कहते हैं. इसका मतलब होता है कि मां अपने पुत्रों से यह वचन लेती हैं कि जब वो बुजुर्ग अवस्था में चली जाएंगी तो बेटे उनका साथ देंगे या नहीं. इस दिन पुत्र अपनी माता को वचन देते हैं कि वो जीवन भर माता-पिता की सेवा करेंगे.

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ज्योतिष में तिल शनि का प्रतीक है और गुड़ सूर्य का. इस तरह दोनों को साथ मिलाकर खाने, उनका दान करने से शनि और सूर्य दोनों के सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं. इसलिए इनका दान करना इस दिन काफी महत्वपूर्ण माना गया है. मकर संक्रांति के दिन तिलकुट भरने की भी परंपरा निभाई जाती है. उत्तर भारत में घर के सभी सदस्य कुल देवता पर गुड़, चावल और तिल का प्रसाद चढ़ाते हैं. यह प्रसाद परिवार में आपसी सामंजस्य का प्रतीक बन जाता है.

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