भस्म, सांप, डमरू, त्रिशूल... शिवजी के शृंगार में क्यों शामिल हैं अजीब चीजें

भगवान शिव के विभिन्न रूपों और शृंगार में छिपे गहरे अर्थ और प्रतीकों को समझना आवश्यक है. शिव का अमंगली रूप भी मंगलकारी है और वे साकार व निराकार दोनों रूपों में पूजे जाते हैं. उनके शृंगार में सांप, चंद्रमा, धतूरे के फूल और गंगा जैसी अनेक प्रतीकात्मक वस्तुएं शामिल हैं.

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शिवजी अपने शरीर पर भस्म क्यों मलते हैं, गले में सर्प क्यों पहनते हैं और डमरू क्यों बजाते हैं शिवजी अपने शरीर पर भस्म क्यों मलते हैं, गले में सर्प क्यों पहनते हैं और डमरू क्यों बजाते हैं

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 10 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:22 PM IST

पुराणों में भगवान शिव के रूप और शृंगार का अलग-अलग तरीके से वर्णन मिलता है. वह जैसे हैं यानी जिस तरह की उनकी छवि है उसे अमंगली कहा जाता है, इसके बाद भी शिवजी अपने इसी अमंगली रूप में भी मंगल करने वाले हैं. महादेव शिव ही अकेले ऐसे हैं जिनकी पूजा लिंग और स्वरूप दोनों रूपों में होती है. यानी शिव साकार स्वरूप वाले भी हैं और निराकार रूप वाले भी.

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इसी वजह से उन्हें फक्कड़, औघड़, औढरदानी और महादेव कहा जाता है. शिव सिर्फ संहार के देवता नहीं हैं, बल्कि उनके रूप में भी कई रहस्य हैं. हर रहस्य से दुनिया की भलाई का ही एक नया रास्ता निकलता है.  शिव रूप अनेकों प्रतीकों का योग है. उनके आस-पास जो वस्तुएं हैं, आभूषण हैं उनसे वह शक्ति ग्रहण करते हैं.

जहर भी बन गया शिवजी का शृंगार
शिव मंगल के प्रतीक हैं. संस्कृति हैं, शाश्वत हैं, सनातन हैं. शिव साकार और निराकार भी हैं. इसीलिए शिव ही सृष्टि के मूल और आधार हैं. उनके रूप और शृंगार में ये स्पष्ट भी होता है.  सागर मंथन में निकले 14 रत्नों में से सबसे पहले जहर निकला. ये जहर कोई नहीं पीना चाहता था. इसलिए शिवजी ने आगे बढ़कर इस जहर को पी लिया. इस जहर को पीने के कारण ही शिव को विष बसन और विषभोजी नाम मिला. यानी वह व्यक्ति जो जहर ही पहनता-खाता हो.

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शिवजी के गले में सर्प लिपटे होने का रहस्य
इसीलिए शिव शृंगार में सांप का स्थान है. वह उनका कंठहार है. जिसे शिवजी गले में लपेटे रहते हैं. यह उनके योगीश्वर रूप का प्रतीक है. सांप न तो इकट्ठा करता है और न ही अपने रहने के लिए घर बनाता है. वह स्वतंत्र रूप से वनों में, पर्वतों में घूमा करता है. शिव के गले में सांप तीन फेरों में लिपटा हुआ है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य का प्रतीक हैं. शक्ति की कल्पना कुंडली जैसी आकृति होने के कारण इसे कुंडलिनी कहते हैं. शिव कुंडलिनी जागरण की प्रेरणा देने वाले महागुरु भी हैं.

धतूरे और मदार के फूल क्यों है पसंद
धतूरे और आक यानी मदार के फूलों की माला महादेव को बहुत प्रिय है. विष को देवताओं और राक्षसों ने जब ग्रहण नहीं किया तो संसार को विनाश से बचाने के लिए शिवजी ने उस विष को पीकर अपने गले में रोक लिया. संसार जिसे जहर मानकर नहीं अपनाता है, शिव उसे औषधि के रूप में स्वीकार करते हैं. वह बताते हैं कि कोई भी वस्तु जहर तब है जब उसका प्रयोग गलत तरीके से किया जाए.

चंद्रमा को सिर पर क्यों सजाया है?
उनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है. वह चंद्रमा पूर्णिमा का पूरी तरह खिला और चांदनी बिखेरता चंद्रमा नहीं है, बल्कि वह शापित है. जिसे त्याग दिया गया है, जिसका तेज, जिसकी रोशनी और ऊर्जा भी छीन ली गई है. जो देवता होने के अपने पद से गिरा दिया गया है ऐसा चंद्रमा है वह. जिसका भाग्य भी उसका साथ नहीं दे रहा है. शिवजी ने उस त्यागे हुए, शापित चंद्रमा को अपने शीष पर शृंगार बनाकर सजा लिया है. यही चंद्रमा उनका मुकुट है. जहां और देवी-देवता सोने के मुकुट पहनते हैं, शिवजी चंद्रमुकुट पहनते हैं और शशिधर कहलाते हैं. 

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शिव का यह शृंगार बताता है कि संसार में कुछ भी त्याग देने के लिए नहीं है और जिसे छोड़ दिया जाता है, त्याग दिया जाता है शिव उसे भी अपना लेते हैं और वो भी पूरे सम्मान के साथ. इसके लिए जरूरी है कि समर्पित भाव से शिव की शरण में जाया जाए. फिर देखिए शिव कैसे आपको उठाकर गले से लगा लेते हैं.

संसार का निर्माण और विनाश के मूल में समय ही प्रमुख है. शिव अपने तन पर विभूति भस्म रमाते हैं. वह अपना शृंगार श्मशान की राख से करते हैं. उनका एक रूप सर्व शक्तिमान महाकाल का भी है. वह जीवन, मृत्यु के चक्र पर भी नियंत्रण रखते हैं. 

शिवजी के हाथों में डमरू क्यों है?
शिव के हाथों में विद्यमान डमरू नाद ब्रह्म का प्रतीक है जब वह बजता है तब आकाश, पाताल एवं पृथ्वी एक लय में बंध जाते हैं. यही नाद सृष्टि सृजन का मूल बिंदू हैं. उनके धारण किए तीन नेत्र सृष्टि के सृजन पालन एवं संहार का केंद्र बिंदू है. एक नेत्र ब्रह्मा, दूसरा विष्णु तथा तीसरा खुद शिव स्वरूप माना गया है. दूसरी तरह से देखें तो पहला नेत्र धरती, दूसरा आकाश और तीसरा नेत्र है बुद्धि के देव सूर्य की ज्योति से मिली ज्ञान की अग्रि का. यही ज्ञान अग्रि का नेत्र जब खुला तो कामदेव भस्म हुआ.

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शिव और शक्ति एक-दूसरे के पर्याय हैं. शिव के तीनों नेत्र शिवा के ही प्रतीक हैं जो गौरी के रूप में जीव को मातृत्व व स्नेह देते हैं, लक्ष्मी के रूप में उसका पोषण करते हैं और काली के रूप में उसकी आंतरिक तथा बाहरी बुराइयों का नाश करते हैं. शिव के ललाट पर सुशोभित तीसरा नेत्र असल में मुक्ति का द्वार है.

शिव के हाथ में त्रिशूल उनकी तीन मूल भूत शक्तियों इच्छाशक्ति, क्रिया शक्ति और ज्ञान का प्रतीक है. इसी त्रिशूल से शिव प्राणी मात्र के दैहिक, दैविक एवं भौतिक तीनों प्रकार के शूलों का शमन करते हैं. इसी त्रिशूल से वह सत्व, रज और तम तीन गुणों तथा उनके कार्यरूप स्थूल, सूक्ष्म और कारण नामक देहत्रय का विनाश करते हैं.

जटाओं में गंगा क्यों समाई हैं?
शिव के शीश में गंगा नदी समाई हैं. यदि शिव जटाजूट में गंगा को नहीं थामते तो वह धरती को तहस-नहस कर विनाश मचाती. उन्होंने गंगा को अपने शीश पर धारण कर गंगा माता की केवल एक धारा को ही प्रवाहित किया. शिव के शीश की जटाओं को प्राचीन वट वृक्ष की संज्ञा दी जाती है जो समस्त प्राणियों का विश्राम स्थल है, वेदांत सांख्य और योग उस वृक्ष की शाखाएं हैं. कहा जाता है कि उनकी जटाओं में वायु का वेग भी समाया हुआ है. 

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वृष यानी बैल अथाह शक्ति का परिचायक है, वृष काम-वासना का प्रतीक भी है. संसार के पुरुषों पर बैल रूपी कामनाएं सवारी करती हैं और शिव खुद उसी बैल को नियंत्रण में करके उस पर सवारी करते हैं.

शरीर पर भस्म क्यों मलते हैं महादेव?
शिव ने मदन यानी कामदेव को भस्म कर दिया. यानी जो कामदेव, संसार भर को अपनी काम-वासना की आग में जलाता है, शिव ने उसे ही राख में बदल दिया. वह जितेंद्रिय हैं यदि मनुष्य अपने पेट और रसों की इंद्रियों पर विजय पा ले तो वह इतना शक्तिमान बन सकता है कि अगर वह चाहे तो सारे विश्व को जीत ले. 

शिवजी का हर शृंगार जीवन की प्रेरणा है जो यह बताता है कि जीव को कर्म करने की स्वतंत्रता है अगर वह अपने अंदर की बुराइयों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) पर अपने तीसरे नेत्र का अंकुश रखे तो वह सदैव सुखी रहेगा. यदि वह इन पर अंकुश नहीं रखता तो यही उसका विनाश कर देती है.

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