खिचड़ी मांगते हुए हिमाचल से गोरखपुर आ गए थे बाबा गोरखनाथ... मकर संक्रांति का प्रतीक कैसे बन गया ये मंदिर

खिचड़ी न केवल एक साधारण भोजन है, बल्कि इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता भी है. गोरखनाथ मंदिर में सदियों से खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है, जो नेपाल के राजपरिवार तक फैली हुई है.

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गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर का इतिहास खिचड़ी से ही जुड़ा हुआ है गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर का इतिहास खिचड़ी से ही जुड़ा हुआ है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 15 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 7:27 AM IST

खिचड़ी एक महिमा अनेक. यह कभी सरल भोजन है, कभी रोगी को दिया जाने वाला आहार, कभी जल्दीबाजी में बना झटपट भोजन तो कभी इतना पवित्र कि भगवान का भोग. ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर में भगवान को खिचड़ी का भोग लगता है. वहीं उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, हिमाचल के ज्वाला देवी, झारखंड के अंबाजी मंदिर और बिहार के कई शक्तिपीठों में बलि के अलावा खिचड़ी न सिर्फ प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती है, बल्कि बड़े पैमाने पर खिचड़ी प्रसाद रूप में ही बांटी भी जाती है.

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गोरखपुर में लगता है खिचड़ी का मेला
खिचड़ी की बात हो तो याद आता है गोरखनाथ का खिचड़ी का मेला. यूपी के सीएम महंत योगी आदित्यनाथ गोरखपुर की राजनीति से निकलकर सूबे के मुखिया बने हैं. गोरखनाथ मंदिर सियासत की अहम धुरी रहा है. यहां पर सदियों से चली आ रही खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा दुनिया भर में फेमस है.

यह मंदिर नाथ संप्रदाय के योगी बाबा गोरखनाथ की तपस्थली रहा है. वहां उन्हीं को खिचड़ी समर्पित की जाती है. बाबा गोरखनाथ का प्रभाव नेपाल के राजवंश तक रहा है और नेपाल के राजपरिवार से यहां लगातार खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा रही है. इसी गोरखनाथ मंदिर का सीधा संबंध यहां से लगभग 1200 किमी दूर हिमाचल में स्थित मां ज्वाला जी के मंदिर से है. 

ज्वालाजी में उबल रहा है खिचड़ी के लिए जल
कहते हैं कि गोरखनाथ मंदिर, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) में जो सदियों से (समय को और बड़ा करके देखें तो दो युगों से) खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है, उसी खिचड़ी के लिए ज्वालाजी मंदिर के पास स्थित एक कुंड में पानी उबल रहा है. इस पानी को उबालने के लिए किसी और नहीं खुद देवी मां ने रखा है. वह अपने भक्त बाबा गोरखनाथ की राह देख रही हैं कि एक दिन वह खिचड़ी के लिए दाल-चावल लेकर आएंगे और तब वह खिचड़ी बनाकर उन्हें भोजन कराएंगी

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कथा कुछ ऐसी है कि बाबा गोरखनाथ हिमाचल में मां ज्वाला धाम पहुंचे. मां ज्वाला (दुर्गाजी का ही एक रूप) ने पुत्र से भोजन करने को कहा. तब ज्वाला मां बलि स्वीकार करती थीं. गोरखबाबा ने कहा कि माता आपको प्रसाद में बलि का भोग लगता है, लेकिन मैं तो सात्विक भोजन करता हूं. तब माता ने कहा कि अच्छा चलो तुम दाल-चावल ले आओ, मैं खिचड़ी  बनाने के लिए पानी गर्म होने रखती हूं. बाबा ने कहा- ठीक है मां मैं खिचड़ी मांग कर लाता हूं.

आज भी अपने पुत्र का इंतजार कर रही हैं माता ज्वाला
इस तरह बाबा हर जगह खिचड़ी मांगते हुए घूमते रहे. मांगते-मांगते वह गोरक्षपुरी (गोरखपुर) आए और यहां समाधि में बैठ गए. उन्होंने अपना खप्पर वहीं रख दिया, जिसमें लोग खिचड़ी चढ़ाते थे. मान्यता है कि बाबा का खप्पर आज तक नहीं भरा है. वहीं हिमाचल के ज्वाला जी में स्थित गोरखडिब्बी में पानी आज तक गर्म हो रहा है. माता अपने भक्त, अपने पुत्र बाबा गोरखनाथ की आज भी प्रतीक्षा कर रही हैं. 

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