वो मंदिर जहां होती है धनतेरस की पूजा, दूर-दूर से आते हैं लोग, मंदिर के देव कहे जाते हैं 'जज'

अलवर के मुंशी बाजार में स्थित भगवान चित्रगुप्त के इस अनोखे मंदिर में धनतेरस के दिन विशेष पूजा की जाती है. मान्यता है कि भगवान चित्रगुप्त हर व्यक्ति के कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं, इसलिए उन्हें ‘जज’ भी कहा जाता है. यह मंदिर करीब 175 साल पुराना है, इसे अलवर के तीसरे शासक महाराज शिवदान सिंह के मुंशी श्योराज बिहारी ने बनवाया था.

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 धर्मराज स्वरूप चित्रगुप्त का मंदिर धर्मराज स्वरूप चित्रगुप्त का मंदिर

हिमांशु शर्मा

  • अलवर ,
  • 29 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 12:53 PM IST

राजस्थान के अलवर में स्थित भगवान चित्रगुप्त का मंदिर अपनी विशेषता के लिए प्रसिद्ध है. इसे प्रदेश का इकलौता धर्मराज मंदिर कहा जाता है, जहां केवल धनतेरस के दिन विशेष पूजा होती है. मान्यता है कि भगवान चित्रगुप्त के पास हर व्यक्ति के जीवन का लेखा-जोखा होता है और वो हर व्यक्ति के कर्मों के आधार पर उसके जीवन और मृत्यु का निर्धारण करते हैं. इस मंदिर में खास पूजा करने के लिए दूर-दूर से महिलाएं आती हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार दान करती हैं.

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200 साल पुराना है मंदिर का इतिहास

यह मंदिर अलवर के तीसरे शासक महाराज शवदाह सिंह के कार्यकाल (1857-1874) में बनवाया गया था. मथुरा से खास मूर्ति बनवाकर यहां स्थापित की गई थी. भगवान चित्रगुप्त के हाथ में कलम और बही है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वो हर व्यक्ति के कर्मों का हिसाब रखते हैं. पूजा के दौरान महिलाएं यहां 13 जगहों पर मिठाई की प्लेटें चढ़ाती हैं और अन्य सामग्रियां जैसे चाकू, कॉपी, पेन, टॉर्च आदि दान करती हैं.

मंदिर के ट्रस्टी और पुजारी कृष्ण दत्त शर्मा ने बताया कि महिलाएं 3 साल तक लगातार मंदिर में आती हैं. एक पत्ते की प्लेट में लड्डू, जलेबी या अन्य मिठाई रखकर भगवान को अर्पित करती हैं. 13 जगह पर अलग-अलग प्लेट लगाई जाती है. सबसे पहले प्लेट भगवान को चढ़ती है और उसके बाद अन्य प्लेट दान में दी जाती है. 

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175 साल पुराना है यह मंदिर

इसके अलावा मंदिर में महिलाएं पत्तल के रूप में मिठाई के साथ चाकू, कॉपी, पेन, टॉर्च, छाता, कपड़े, चने की दाल सोने चांद के आभूषण भी चढ़ते हैं. 175 साल पुराना यह मंदिर  साल के 365 दिन सुबह-शाम खुला रहता है. दीपोत्सव के पांच दिवस पर यहां बड़ी संख्या में महिलाओं का तांता लगा रहता है.

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