सिनेमा के एक सीन तक क्यों सिमट जाती है मंच के महान अभिनेताओं की पहचान?

81 वर्ष की उम्र में अभिनेता विजय कृष्णा का निधन हो गया. वे शेक्सपियर के किरदारों और महेश दत्तानी के नाटक 'Dance Like a Man' में अपनी भूमिका के लिए प्रसिद्ध थे. हालांकि फिल्मों में उनकी पहचान शाहरूख खान की फिल्म 'देवदास' के पिता के किरदार तक सीमित रही, लेकिन उनका असली योगदान रंगमंच में रहा.

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मशहूर थिएटर आर्टिस्ट और अभिनेता विजय कृष्णा का निधन हो गया है मशहूर थिएटर आर्टिस्ट और अभिनेता विजय कृष्णा का निधन हो गया है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 05 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 6:24 PM IST

एक्टर विजय कृष्णा (Vijay Crishna) नहीं रहे. बुधवार को 81 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. तमाम मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए ये खबर सब तक पहुंची. लेकिन इस खबर ने अद्भुत प्रतिभा के धनी, अभिनय के एक उम्दा सितारे और थिएटर के नामी कलाकार की पहचान को बहुत समेट सा दिया. क्योंकि तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स में उनकी पहचान 'शाहरूख खान की फिल्म देवदास में उनके पिता का किरदार निभाने वाले एक्टर की बताई गई'.

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81 वर्ष का एक अभिनेता जिसने मंच पर परदे के उठते ही कई किरदारों को गढ़ा और उन्हें जीवंत किया. जीवन से जब उसकी विदाई हुई तो उसका परिचय एक बड़े स्टार की फिल्म में निभाए गए महज कुछ मिनट के सीन तक सीमित रह गया.

स्टारडम की चमक में छिपती असली प्रतिभा
कला की दुनिया में ये एक बड़ी विडंबना है. यहां चमक-चकाचौंध इतनी है कि दुनिया कभी ये जान ही नहीं पाती कि इस चमक के पीछे की आग में कौन तप रहा है. एक्टर विजय कृष्णा जैसे कलाकार सिर्फ मौजूद नहीं रहते, बल्कि अपनी मौजूदगी से पूरे माहौल का तापमान बदल देते हैं. वे मंच पर आते हैं और किरदार में इस तरह उतर जाते हैं जैसे सांस शरीर में उतरती है, चुपचाप, लेकिन जीवन से भर देने वाली.

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विजय कृष्णा ने फिल्मों में काम किया क्योंकि ये एक्टिंग की दुनिया का सबसे पॉपुलर मीडियम है, लेकिन इस पॉपुलर मीडियम की एक खामी ये है कि यहां स्टारडम ऐसी शर्त बन जाता है कि असल प्रतिभा कहीं छिप जाती है. विजय कृष्णा के साथ भी ऐसा ही रहा. उनकी असली दुनिया रंगमंच थी. उन्होंने लगभग छह दशकों तक थिएटर किया और दिल्ली-मुंबई के रंगमंच पर उनकी एक सशक्त मौजूदगी बनी रही. 

महेश दत्तानी के मशहूर नाटक 'Dance Like a Man' में उनकी ‘जयराज’ की भूमिका भारतीय अंग्रेज़ी थिएटर की चर्चित भूमिकाओं में गिना जाता है. उन्होंने इसे 25 वर्षों तक निभाया. इसी नाटक पर आधारित फिल्म में भी विजय कृष्णा इसी किरदार में नजर आए थे.  

शेक्सपीयर के किरदारों को किया जीवंत
विजय कृष्णा के लिए थिएटर एक्टिंग की एक लैब की तरह रहा. वे दिखावे या सजावट वाले अभिनय में विश्वास नहीं करते थे. उन्होंने शेक्सपियर के किरदारों को जिस आत्मविश्वास के साथ जिया, वही भूमिकाएं उन्हें खास बनाती हैं. खासकर 'ओथेलो' में उनका इयागो का किरदार थिएटर की दुनिया में निभाए उनके सबसे यादगार किरदारों में से एक है. इस भूमिका की सराहना 'सर इयान मैककेलन' और केनेथ ब्राना' के निभाए किरदार के बराबर की गई. 

जैसे 'डांस लाइक अ मैन' को ही लीजिए. इसमें वह प्रतिभाशाली लेकिन हताश भरतनाट्यम नर्तक की भूमिका निभाते हैं. यानी मंच पर ऐसी जिंदगी जीना, जो नाराज़गी, समझौते और नाज़ुक मर्दानगी से भरी हुई हो. विजय कृष्णा ने उस कड़वाहट को बिना किसी अति के निभाया और एक नर्तक के भीतर की संवेदनशीलता को सामने रखा.  'गांधी' फिल्म में उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना के ड्राइवर का छोटा-सा किरदार निभाया था.

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उनके निधन के बाद सोशल मीडिया पर कई पोस्ट्स में उन्हें सिर्फ 'देवदास में शाहरुख के पिता' के रूप में याद किया जाना वाकई उनके काम और उनकी संजीदगी को अनदेखा करना है.

मशहूर अभिनेता गिरीश कर्नाड को भी नहीं मिला उचित सम्मान
और ऐसा पहली बार हुआ हो यह भी नहीं है. जब मशहूर अभिनेता गिरीश कर्नाड का निधन हुआ था, तब भी ऐसी ही बातें देखने को मिली थीं. जबकि कर्नाड सिर्फ फिल्मों में चरित्र किरदार निभाने वाले या साइड आर्टिस्ट नहीं थे. वे भारतीय रंगमंच के बड़े नाटककारों में से एक थे. उन्होंने तुगलक जैसा ऐतिहासिक नाटक लिखा जिसने भारतीय थिएटर में बड़ी प्रसिद्धि पाई. उन्होंने 'हयवदन', 'नागमंडल' और कई अन्य नाटकों के गुलदस्ते से थिएटर को सजाया. उनकी रचनाएं भारतीय रंगमंच को नई बौद्धिक गहराई देने वाली रहीं, लेकिन उनके जाने के बाद कई जगह उनकी पहचान सिमटकर फिल्म 'एक था टाइगर' के एक छोटे से किरदार तक रह गई.

विक्रम गोखले की पहचान भी सिर्फ हिट फिल्में
नामों की इस लिस्ट में अभिनेता विक्रम गोखले भी शामिल हैं. रंगमंच और सिनेमा दोनों में अपनी गहरी छाप छोड़ने वाले गोखले संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हैं. लेकिन जब उनका निधन हुआ तो उनकी पहचान सिर्फ फिल्म 'हम दिल दे चुके सनम' तक रह गई. 

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क्या किसी की कला को याद करने का हमारा पैटर्न सच में इतना सिकुड़ा हुआ है? ये सारे तरीके भले ही किसी को इंस्टैंट तरीके से याद करने के लिए आसान हों लेकिन कहीं न कहीं ये हमारी कल्चरल मेमोरी भी बनती जा रही है. ये तरीका कहीं न कहीं एक कलाकार की जीवन भर की मेहनत को अनदेखा करने का जरिया बन रहा है. हम कला के साथ सबसे बड़ा अन्याय कर रहे हैं.

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