UGC ने कैंपसों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए जो सख्त नियम-कानून लागू किए हैं, उस सख्ती की हवा आंकड़े खोल रहे हैं. कहा गया है कि 2024-25 में देश की 704 यूनिवर्सिटी से 378 शिकायतें आई हैं. लेकिन, इस जानकारी के साथ यह नहीं बताया जा रहा है कि इन युनिवर्सिटी में करीब 4 करोड़ से ज्यादा छात्र पढ़ते हैं. यानी, शिकायतों का अनुपात है- 1 लाख 5 हजार छात्रों पर एक शिकायत. कुल स्टूडेंट स्ट्रेंथ का 0.00000945 प्रतिशत. ऐसे में UGC की सख्ती समाज में आ रहे बदलाव को अनदेखा कर रही है. दुनिया की जानी मानी सर्वे एजेंसी Pew रिसर्च ने 2019-20 में भारत में जातिगत भेदभाव पर बारीक अध्ययन किया था. जो इशारा करता है कि भारतीय समाज का ये जख्म अब काफी हद तक ठीक हो चुका है. इसमें सबसे ज्यादा चमकदार और उम्मीद भरे रुझान कॉलेज कैंपसों से मिले थे. इस सर्वे को सामने रखकर देखें, तो UGC रेगुलेशन 2026 को लेकर उठ रहा विवाद सिर्फ कानूनी नहीं, वैचारिक भी लगता है.
Pew Research Center के 2019-20 के सर्वे में एक सीधा-सा सवाल पूछा गया था कि पिछले 12 महीनों में क्या आपने खुद जाति के आधार पर भेदभाव महसूस किया? जवाब चौंकाने वाला है. कुल मिलाकर सिर्फ 14% भारतीयों ने 'हां' कहा, जबकि 82% ने साफ तौर पर 'नहीं' कहा. यह आंकड़ा न सिर्फ सामान्य वर्ग के लोगों में, बल्कि अनुसूचित जाति-जनजाति में 17% और OBC में भी 13% ही है. यहां तक कि धार्मिक अल्पसंख्यकों में भी यह आंकड़ा लगभग इसी दायरे में घूमता है. अगर जातिगत भेदभाव सचमुच इतना व्यापक और रोजमर्रा का अनुभव होता, तो यह 'भेदभाव' का प्रतिशत कहीं ज्यादा होना चाहिए था.
यहां एक अहम फर्क समझना जरूरी है. सिस्टम की असमानता और व्यक्तिगत अनुभव का फर्क. यह माना गया है कि भारत में जाति के कारण ऐतिहासिक अन्याय रहा है. इसमें कोई विवाद नहीं. लेकिन Pew का डेटा यह संकेत देता है कि शहरीकरण, शिक्षा, मिश्रित पेशे, और कानूनों के चलते सामाजिक व्यवहार के स्तर पर यह जख्म धीरे-धीरे भर रहा था. खासकर कॉलेज ग्रेजुएट्स में 'भेदभाव महसूस करने' वालों का प्रतिशत और कम है. सिर्फ दस प्रतिशत. यानी जहां शिक्षा और इंस्टीट्यूशनल माहौल मजबूत है, वहां जाति की दीवारें कमजोर पड़ी हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर समाज का एक बड़ा हिस्सा कह रहा है कि उसने व्यक्तिगत स्तर पर भेदभाव महसूस नहीं किया, तो UGC रेगुलेशन 2026 जैसी सख्त व्यवस्था की जरूरत किस आधार पर पड़ी? क्या यह किसी मौजूदा बढ़ते संकट का जवाब है, या फिर किसी खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है?
UGC रेगुलेशन 2026 का विरोध यहीं से शुरू हुआ है. आलोचकों का कहना है कि यह नियम इलाज से ज्यादा टकराव की राजनीति करता है. एक ऐसा जख्म, जो धीरे-धीरे भर रहा था, उसे बार-बार कुरेदकर 'स्थायी समस्या' बनाया जा रहा है. विश्वविद्यालयों को 'भेदभाव के अड्डे' की तरह ट्रीट करना, फैकल्टी और छात्रों के बीच अविश्वास का माहौल बनाता है. जब हर प्रशासनिक फैसला जाति के चश्मे से देखा जाएगा, तो मेरिट, एकेडमिक फ्रीडम और संवाद का स्पेस सिकुड़ेगा.
Pew के आंकड़े एक और बात बताते हैं. भेदभाव का अनुभव क्षेत्रीय और आर्थिक हालात से ज्यादा जुड़ा दिखता है. उत्तर-पूर्व में 24% है, और आर्थिक परेशानियों से गुजरे लोग 20% ज्यादा भेदभाव महसूस करते हैं. यानी समस्या सिर्फ 'जाति' की नहीं, बल्कि आर्थिक असुरक्षा और क्षेत्रीय तौर पर हाशिये पर धकेलन की भी है. लेकिन UGC रेगुलेशन का फोकस लगभग पूरी तरह जाति-आधारित फ्रेम पर टिक गया है, मानो बाकी कारण मायने ही नहीं रखते हों.
यहां असली खतरा यह है कि समस्या को सुलझाने के बजाय UGC के नए नियम उसे नए ढंग से परिभाषित कर देते हैं. जब आप बार-बार छात्रों से कहते हैं कि वे एक भेदभावग्रस्त हैं, तो आप अनजाने में उसी पहचान को उनकी मुख्य सामाजिक सच्चाई बना देते हैं. समाजशास्त्र में इसे 'self-fulfilling prophecy' कहा जाता है. जिस भेदभाव को खत्म करना है, वही रोजमर्रा की चेतना में और पक्का हो जाता है.
इसका मतलब यह नहीं कि जातिगत भेदभाव खत्म हो चुका है या उस पर बात नहीं होनी चाहिए. लेकिन सवाल तरीका और अनुपात का है. डेटा-ड्रिवन, टार्गेटेड इंटरवेंशन और ओवर-रेगुलेशन में फर्क होता है. अगर समस्या सीमित और विशिष्ट जगहों पर है, तो समाधान भी वहीं फोकस्ड होना चाहिए. पूरे उच्च शिक्षा तंत्र को एक ही ब्रश से रंग देना, न तो न्यायपूर्ण है और न ही प्रभावी.
विडंबना यह है कि UGC रेगुलेशन 2026 ऐसे वक्त आया है, जब सामाजिक व्यवहार के स्तर पर जाति की पकड़ कमजोर पड़ रही थी. खासकर युवा पीढ़ी में. Pew का सर्वे बताता है कि 18-34 आयु वर्ग और 35+ में भेदभाव महसूस करने का प्रतिशत लगभग समान और कम है. यानी नई पीढ़ी कोई 'नया जातिगत विस्फोट' महसूस नहीं कर रही. फिर नीति का यह आपातकालीन स्वर क्यों?
इसलिए जब कहा जा रहा है कि UGC ने एक भरते जख्म को फिर से हरा कर दिया, तो वह सिर्फ इमोशनल आरोप नहीं है. यह उस आशंका का बयान है कि कहीं पहचान-आधारित नीति-निर्माण, सामाजिक सुधार की जगह सामाजिक ध्रुवीकरण का औजार न बन जाए. जाति के खिलाफ लड़ाई जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम उसे समाज में कम कर रहे हैं, या कागजों और नियमों के जरिए रोज-रोज याद दिलाकर और मजबूत कर रहे हैं?
अंत में बात इतनी-सी है- नीति का मकसद घाव गिनना नहीं, घाव भरना होना चाहिए. अगर डेटा कह रहा है कि समाज का बड़ा हिस्सा राहत की दिशा में बढ़ रहा है, तो नीति को उस प्रक्रिया को मजबूत करना चाहिए. न कि उसे शक, डर और सजा की भाषा में वापस खींच लेना. यह जरूरी है कि कैंपसों में ऐसे इंतेजाम और वातावरण हो कि कोई छात्र रोहित वेमूला और पायल तड़वी जैसी स्थिति में न पहुंचे. समरसता ऐसी हो कि छात्र अपनी जातियों से नहीं, बल्कि देश की तरक्की में अपने योगदान को पहचान बनाएं. UGC को कैंपसों में टीम बिल्डिंग के उपाय करने चाहिये थे. जातिगत सरहदों से खाई पटेगी नहीं, और चौड़ी होगी.
धीरेंद्र राय