बेगाना बजट, दीवानी जनता: दिल है कि मानता नहीं…

एक समय था जब आम बजट का भारतीयों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में महत्व होता था. अब ऐसा नहीं है. फिर भी, सिर्फ़ पुरानी आदत की वजह से हम हर बजट वाले दिन उत्साह से भर जाते हैं, भले ही असल में कुछ खास न हो.

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दशकों की एक पुरानी आदत की वजह से हर बार सरकार के बजट पर भारतीय झूमते नजर आते हैं. (Photo- ITG) दशकों की एक पुरानी आदत की वजह से हर बार सरकार के बजट पर भारतीय झूमते नजर आते हैं. (Photo- ITG)

कमलेश सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 01 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 6:44 PM IST

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना पुरानी कहावत है. फारूक हो या न हो, हम सब अब्दुल्ला हैं, शादी में ठुमके लगाते फिर रहे हैं, बुलाया हो चाहे नहीं बुलाया हो. बजट का दिन वही दावत का माहौल है. पहले तो हम पंडाल में घुसकर स्वादिष्ट व्यंजन चट कर लेते थे क्योंकि कुछ ना कुछ बुफे में हमारे लिए भी होता था. लेकिन ना वो गज़नवी में तड़प रही ना वो ख़म है ज़ुल्फ़ ए अयाज़ में. अब ना हम उस कदर भूखे रहे, ना ही खाने में कुछ लज़ीज़ रहा. बुरी आदत कोई भी हो बआसानी नहीं जाती. आदतन बैंड-बाजा देखते ही कंधे उचकने और पांव थिरकने लगते हैं.

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वित्त मंत्री देश के सामने एक लाल किताब निकाल कर पलटती हैं और हम टक लगाए देखते हैं कि सरकार इस साल कितना माल जमा करेगी, और उसे कहां उड़ा देगी. कितने कर्ज लेगी, कितने चुकाएगी भी. हम संसद में सबका खुलासा देखते हैं, फिर पूरे साल भर बस देखते रहते हैं कि जिनका भी जलवा है, क़ायम है. हमारा तो तलवा है कि जल रहा है.

पहले रेल मंत्री अलग से रेल बजट पेश करते थे. उसमें हमारी दिलचस्पी इसलिए थी क्योंकि रेल ही लंबी दूरी का एकमात्र भरोसेमंद रास्ता था. सड़कें अगर थीं तो बेहाल, उड़ान भरना अमीरों या दिखावे के शौकीनों का काम. इसलिए निकटतम स्टेशन से गुजरने वाली नई ट्रेन इस त्योहार का तोहफा लगती थी. रोजमर्रा की चीजों पर टैक्स बढ़ते-घटते हम उत्सुकता से देखते. उत्साह फूटता, निराशा छा जाती. लेकिन अब रेल बजट मुख्य बजट में समा गया. और ठीक भी है. जीएसटी ने वस्तु और सेवा के टैक्स समाहित कर लिए. अब बजट में वो पुरानी धड़कन बढ़ा देने वाली बात नहीं रही. नौकरीपेशा जनता पर टैक्स सिर्फ बढ़ते हैं, कभी-कभार चुनावी उपलक्ष्य में थोड़ा काट दिया जाता है तो ख़ुश हो लेते हैं.

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देखिए, हमारे पड़ोसी रज़ी साहब भी हर साल घर का बजट बनाते हैं. मैं, जिज्ञासु पड़ोसी, चुपके से झांकना चाहता हूं. लेकिन जल्दी ही आटा-दाल की एकरसता से झपकी आ जाती है. ठीक यही हाल आम आदमी का राष्ट्रीय बजट के साथ है. बजट उबाऊ नहीं हुआ; बस वैसा ही है जैसा होना चाहिए. अब वो डोपामाइन नहीं देता जो पहले देता था. क्योंकि हम आगे बढ़ चुके हैं, बजट के चंगुल से आज़ाद. ये भी ठीक है.

कुछ पवित्र आत्माएं अभी भी चिल्लाती हैं कि हमें हक है जानने का कि सरकार “हमारे” पैसे से क्या ऐश करती है. 'हमारे' पर विशेष जोर देकर. जैसे न देने का विकल्प हो. अरे भाई, टैक्स तो भरना पड़ता है; ये कोई स्वैच्छिक चंदा नहीं कि हिसाब मांगो और पूछो कि क्या और कैसे खर्च किए. जब डाकू लूट में तुम्हें लूट ले, तो बाद में उससे पूछते हो कि उसने वो पैसे कहाँ उड़ाए? आप कह सकते हो कि क्या बात कर रहे हो, टैक्स लेना कोई लूट नहीं है और देना हमारा कर्तव्य है, फलाना ढिमकाना, लेकिन सच्चाई यही है: एक बार दिया, तो गया. अब वो सरकार का माल है, जिसे वो जैसे चाहे सजे-संवारे. वोट तो तुम वित्तीय नीति के गुण-दोष पर देते नहीं, जाति-मजहब के मुद्दे महत्वपूर्ण होते हैं तब.

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हां, हमारी दिलचस्पी है. बेशक, किसी भी चीज़ में कुछ दिलचस्पी पैदा हो सकती है. फुटपाथ से पर्चा उठाओ, उसमें भी कोई न कोई मतलब और काम का कुछ न कुछ निकाल ही लेगा. लेकिन भारत में बजट की जो सालाना आग लगती है, वैसी दीवानगी कहीं और नहीं मिलती. कल अखबार लगभग हर पन्ने पर इसकी भारी-भरकम बातें छापेंगे. तुलना करो ब्रिटेन से, जहाँ से हमने ये रिवाज चुराया, वित्तीय वर्ष तक. मार्च में कौन सा साल शुरू होता है भाई. दुनिया भर के लोग अपने घर के बजट की ज्यादा फिक्र करते हैं, सरकार के स्प्रेडशीट की नहीं. सिर्फ बड़े उद्योगपति और पढ़े-लिखे अकादमिक लोग वहां उतना जोश दिखाते हैं जितना एक आम भारतीय दिखाता है.

अच्छी बात है कि अब ज्यादातर भारतीय बजट की लुभावनी लटों पर लटके नहीं हैं. पहले हमारी जिंदगी उसी दस्तावेज़ पर टिकी थी. अर्थव्यवस्था बंद थी. हर आर्थिक कदम पर बड़े ऑफ़िस की निगरानी होती थी. जमाना बदल गया. उदारीकरण की छलांग ने उसकी चमक छीन ली. अर्थव्यवस्था खुल गई तो हवा भी थोड़ी बदल गई. अभी भी इस एक घटना में ताक़त है कि हमारी ज़िंदगी बदल डाले पर वैसा कुछ होता नहीं है. पहले जैसा न ही उछल पड़ते हैं ना ही गुस्से से लाल होते हैं हम. जो थोड़ा बहुत उत्तेजना होती है शाम की चाय तक खत्म हो जाती है.

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आज का ही देखिए. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर घोषित करती हैं. यह वंदे भारत को किसी और नाम से पुकारने से ज्यादा और क्या है. बुलेट तो नहीं घोषित हुआ. लेकिन सेकंड क्लास में मुर्गों की तरह ठुंसे यात्री के लिए ये भी दूर का ढोल है, रोज का सुख नहीं. कैपेक्स 12.2 लाख करोड़ तक चढ़ता है, तरक्की का वादा, मगर मध्यम वर्ग टैक्स स्लैब न बदलने पर कराहता है. स्टैंडर्ड डिडक्शन में मामूली छूट जिससे बमुश्किल एक बिरयानी आ जाए. एआई को ‘ग्रोथ मल्टीप्लायर’ का ताज पहनाया, युवा शक्ति को हीरो बताया, लेकिन युवा बेरोजगारी पर खामोशी, लाखों बेकार बैठे लोगों के लिए तिल है जिसका ताड़ बनेगा. क्रिएटर स्कीम आएंगी, रील्स ज्यादा बनेंगी, रीयल में क्या होगा? कैंसर की दवाएं सस्ती होंगी, हवा-पानी-मिट्टी के बढ़ते कैंसरकारक के साथ तालमेल बिठाए रखने को. 

बजट भाषण खत्म, मज़ा हज़म. मंत्रालय को खुश करने वाले एक्सपर्ट्स कह रहे हैं टू थम्स अप. आम आदमी कहता है, 'मेरे लिए कुछ नया नहीं.' विपक्ष इसे गरीब-विरोधी, अल्पसंख्यक-विरोधी, ओबीसी-विरोधी, दलित-विरोधी, महिला-विरोधी, बच्चे-विरोधी, सब-विरोधी ठहरा रहा है. एनडीए वाले गरीब-समर्थक, अल्पसंख्यक-समर्थक, ओबीसी-समर्थक, दलित-समर्थक, महिला-समर्थक, बच्चे-समर्थक, सब-समर्थक बता रहे हैं. पूर्व निर्धारित कथानक, पूर्वनिर्धारित प्रतिक्रिया. कल फिर सूरज निकलेगा. कल फिर से हम काम में लग जाएंगे. निर्मला अपने दफ़्तर जाएंगीं, आप अपने कारखाने. झोली में नहीं दाने, अम्मा चलीं भुनाने.

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