भारत रहस्यों का देश है. यह विरोधाभासों की धरती भी है, जहां की कुछ बातें एक्सपर्ट्स को भी हैरान कर देती हैं. इंडिया टुडे के ताजा सी-वोटर 'मूड ऑफ द नेशन' (MoTN) सर्वे के नतीजे इन दोनों खूबियों को दिखाते हैं.
दुनिया भर के लोकतंत्रों में एक आम समझ यह है कि वोटर का बर्ताव सरकार के आर्थिक प्रदर्शन पर निर्भर करता है. अगर जनता को लगता है कि महंगाई काबू में है, नौकरियां मिल रही हैं और भविष्य के लिए अच्छे मौके हैं, तो वे मौजूदा सरकार को वोट देते हैं. इसके उलट होने पर सरकार बदल दी जाती है. पिछले 50-100 सालों से ज्यादातर लोकतंत्रों में यही होता आया है.
लेकिन भारत के मामले में एक बड़ा विरोधाभास दिखता है. सर्वे में ज्यादातर लोगों का मानना है कि उनके परिवार की आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं है. फिर भी, उन्हीं में से ज्यादातर लोग मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अच्छा काम किया है. उन्होंने कहा कि अगर आज चुनाव हुए तो वे फिर से इसी सरकार को वोट देंगे.
अर्थव्यवस्था से नाखुश लोग
जब सर्वे में पूछा गया कि एनडीए की आर्थिक नीतियों का सबसे ज्यादा फायदा किसे मिला, तो 53 प्रतिशत लोगों ने कहा कि इसका फायदा 'बड़े बिजनेस' को मिला है. शायद यह लोगों की अपनी सोच की वजह से हो सकता है.
लेकिन हकीकत क्या है? मोदी सरकार ने आम नागरिकों के लिए जो किया, उसकी एक लंबी लिस्ट है:
जन-धन योजना के तहत 55 करोड़ से ज्यादा नए बैंक खाते खुले, जिनमें जीरो बैलेंस की सुविधा है. जिन घरों में 2014 तक बिजली नहीं थी, उन्हें मुफ्त कनेक्शन दिए गए. गरीबों के लिए मेडिकल इंश्योरेंस योजना आई, जिसमें 50 करोड़ भारतीयों को 5 लाख रुपये तक का बीमा मिला. 70 साल से ऊपर के बुजुर्गों के लिए यह और भी बेहतर है.
लगभग हर घर को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिए गए. आज ज्यादातर भारतीय घर साफ ईंधन का इस्तेमाल कर रहे हैं. देश भर में 13 करोड़ से ज्यादा शौचालय बनाए गए. इससे महिलाओं को सम्मान मिला और अपराधों में कमी आई. किसानों को हर साल 6,000 रुपये दिए जा रहे हैं. इसके अलावा छोटे कारोबारियों के लिए मुद्रा लोन योजना भी है.
बाकी डेटा भी यही बताते हैं कि मोदी सरकार ने गरीबों और आम लोगों के लिए काफी काम किया है. वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ जैसे संस्थानों के मुताबिक भारत में गरीबी का अनुपात घटकर सिर्फ 2 प्रतिशत रह गया है. फिर भी, MoTN सर्वे में 53 प्रतिशत लोग मानते हैं कि सरकार की नीतियों का फायदा सिर्फ बड़े बिज़नेस को हुआ है.
अर्थव्यवस्था से जुड़े अन्य सवालों पर भी कई जवाब मिले. महंगाई और बेरोजगारी को इस सरकार की सबसे बड़ी नाकामी माना गया. वैसे बेरोजगारी और महंगाई भारत में पांच दशकों से बड़ी समस्या रही है. अगर आप पुरानी बॉलीवुड फिल्में देखें, तो 70 के दशक में मनोज कुमार की फिल्म 'रोटी, कपड़ा और मकान' में भी यही मुद्दे थे. इसलिए सिर्फ मोदी सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना थोड़ा नाइंसाफी होगी.
विरोधाभास
लेकिन असली अंतर कहीं और है. 31 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने कहा कि 2014 में मोदी के आने के बाद उनके परिवार की आर्थिक स्थिति और बिगड़ी है. 35 प्रतिशत ने कहा कि सुधार हुआ है और 30 प्रतिशत ने कहा कि स्थिति वैसी ही है.
इतनी सारी कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद, आम वोटर को आर्थिक दर्द क्यों महसूस हो रहा है?
एक और चिंताजनक डेटा है जो कोरोना के समय से बना हुआ है. सर्वे में 60 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने कहा कि घर का खर्च और बजट संभालना बहुत मुश्किल हो गया है. यह एक बहुत बड़ा आंकड़ा है.
तो ये कुछ ऐसी चिंताएं हैं जो आम भारतीय और उनके परिवारों के सामने खड़ी हैं. वे इसे लेकर बहुत उम्मीद में नहीं दिखते. लगभग एक-तिहाई लोगों को लगा कि अगले तीन से छह महीनों में स्थिति और खराब हो सकती है.
फिर भी, यहीं पर विरोधाभास आता है. जब प्रधानमंत्री और एनडीए सरकार के कामकाज की बात आई, तो उन्हें बहुत अच्छे नंबर दिए गए. सबसे बड़ी बात यह है कि जब पूछा गया कि आज चुनाव हुए तो किसे वोट देंगे, तो 47 प्रतिशत लोगों ने एनडीए का नाम लिया. वहीं इंडिया गठबंधन को सिर्फ 39 प्रतिशत वोट मिलने की बात कही गई.
ऐसा क्यों है?
एक तरफ लोग आर्थिक दर्द झेल रहे हैं. जीएसटी दरों में कमी से भी वे संतुष्ट नहीं दिखे. आधे लोगों ने कहा कि इससे कीमतों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा. फिर भी एनडीए को 47 प्रतिशत वोट मिल रहे हैं और आज चुनाव होने पर वह 350 से ज्यादा सीटें जीत सकता है. इसे कैसे समझा जाए?
लेखकों के मुताबिक, इसकी असली वजह उस कहावत में छिपी है कि 'अनजान दुश्मन से जाना-पहचाना दुश्मन बेहतर होता है'.
इसमें कोई शक नहीं कि वोटर नाखुश है. शायद इसी वजह से 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए की सीटें कम हुईं और बीजेपी बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गई.
लेकिन आर्थिक दर्द के बावजूद, वोटरों को लगता है कि दुनिया के हालात देखते हुए नरेंद्र मोदी ही सबसे सुरक्षित विकल्प हैं.
क्या मोदी के साथ सुरक्षित रहना किसी नई सरकार को आजमाने से बेहतर है? या भारत फिर से उसी दौर में है जिसे इंडिया टुडे मैगजीन के लिए डॉ. प्रणय रॉय ने 'TINA' (कोई विकल्प नहीं है) कहा था? शायद इस रहस्य की और भी परतें हैं. लेकिन फिलहाल हकीकत यही है कि एनडीए के लिए आर्थिक दर्द के बावजूद सियासी फायदा बना हुआ है.
यशवंत देशमुख / सुतानु गुरु