यूपी में SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) के बाद चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट रोल प्रकाशित कर दिया है. उत्तर प्रदेश के सभी जिलों के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि विपक्ष के सारे संदेह गलत साबित हुए हैं. आम तौर पर विपक्ष पूरे देश में जहां पर भी एसआईआर प्रक्रिया शुरू हुई थी वहां उसे एनआरसी की तरह ले रही थी.
एक तरह का हौव्वा क्रिएट किया गया कि अल्पसंख्यकों , पिछड़े और दलितों के नाम हटाने के साजिश के तहत एसआईआर लाया गया है. पर जब हम उत्तर प्रदेश के जिलों का जिलावार आंकड़े देखते मुस्लिम बहुल जिलों में सबसे कम नाम कटते हुए दिख रहा है. नाम कटने का परसेंटेज हिंदू बहुल जिलों के मुक़ाबले मुस्लिम बहुल जिलों में बहुत ही कम है. विपक्ष के SIR के ज़रिए NRC का हौव्वा खड़ा करना हवा हवाई हो गया. दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा है कि एसआईआर की प्रक्रिया से सबसे अधिक नुकसान यूपी में सत्ताधारी पार्टी बीजेपी का ही हो रहा है.
यूपी में SIR प्रक्रिया के तहत ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल में 2.89 करोड़ नाम डिलीट हुए हैं, जो कुल वोटर्स (15.44 करोड़) का करीब 18.70% है. मुख्य कारण मौत (46.23 लाख), स्थायी माइग्रेशन या अनुपलब्धता (2.17 करोड़) और डुप्लीकेट रजिस्ट्रेशन (25.47 लाख) बताए गए हैं. यह ड्राफ्ट रोल 6 जनवरी 2026 को जारी हुआ, और क्लेम/ऑब्जेक्शन की आखिरी तारीख 6 फरवरी 2026 है.
मुस्लिम बहुल vs हिंदू बहुल जिलों में नाम कटने का प्रतिशत
मुस्लिम बहुल जिलों में नाम कटने का प्रतिशत हिंदू बहुल जिलों से कम है. फिलहाल उपलब्ध डेटा से यह काफी हद तक सही लगता है. यद्यपि कोई आधिकारिक जिला-वार ब्रेकडाउन (मुस्लिम vs हिंदू) नहीं दिया गया है. हालांकि यह जरूर कहा जा रहा है कि मुस्लिम वोटर्स ने citizenship और वेलफेयर स्कीम्स के छिन जाने के डर से SIR फॉर्म जल्दी भरे, जबकि हिंदू (मुख्य रूप से BJP सपोर्टर्स) में लापरवाही रही.
पर नगरीय क्षेत्रों से आंकड़े आए हैं उन्हें देखकर यह सही लग रहा है . जैसे लखनऊ-30%, गाजियाबाद-28%, गौतम बुद्ध नगर-23.7% में वोटर डिलीट ज्यादा हुए हैं. गौरतलब है कि इन इलाकों में BJP का स्ट्रॉन्गहोल्ड है. मुस्लिम बहुल ग्रामीण इलाकों में रिस्पॉन्स बेहतर रहा, इसलिए उनके वोट डिलीट कम हुए हैं. इससे विपक्ष (SP, कांग्रेस) का NRC/CAA का हौवा कमजोर पड़ गया, क्योंकि SIR को मिनी-NRC बताकर डर फैलाया जा रहा था. नीचे कुछ मुस्लिम बहुल जिलों में कितने परसेंट वोट डिलिट हुए हैं उनके आंकड़े इस तरह हैं.
सहारनपुर-16.37 परसेंट
मुजफ्फरनगर-16.29 प्रतिशत
बुलंदशहर-(15.14 प्रतिशत
अलीगढ़-18.60 प्रतिशत
मुरादाबाद-15.76 प्रतिशत
रामपुर-18.29 प्रतिशत
बिजनौर-15.53 प्रतिशत
अमरोहा-13.22 प्रतिशत
आजमगढ़-15.25 प्रतिशत
मऊ-17.52 प्रतिशत
सिद्धार्थनगर 20.33 प्रतिशत
साफ दिख रहा है मुस्लिम बहुल जिलों में वोटर डिलिशन का आंकड़ा बहुत कम है.
क्या SIR से BJP को यूपी में ज्यादा नुकसान होगा?
SIR की प्रक्रिया शुरू होने के बाद से ही उत्तर प्रदेश में BJP नेता 2027 विधानसभा चुनावों में संभावित नुकसान का आंकलन कर रहे थे. यह काफी हद तक सही साबित हुआ है. लखनऊ में करीब 30 प्रतिशत वोट डिलिट हुए हैं. जाहिर है कि यह BJP के लिए चिंता का विषय हो सकता है. CM योगी आदित्यनाथ ने खुद कहा था कि 4 करोड़ मिसिंग वोटर्स में 85-90% BJP सपोर्टर्स हैं.योगी ने वर्कर्स को ग्राउंड लेवल पर जाकर अपने समर्थक वोटर्स का नाम वोटर लिस्ट में हर हाल में जुड़ सके इसके लिए काम करने को कहा था.इसके लिए बीजेपी ने एसआईआर प्रॉसेस के लिए डेडलाइन भी बढ़ाने की मांग की थी.
दरअसल प्रदेश की राजधानी लखनऊ और शहरों में बहुत से ऐसे लोगों ने अपना आशियाना बना लिया जिनका एक घर कहीं गांव में है. ऐसे लोग अपने गांव में जमान जायदाद की सुरक्षा हो सके इसके लिए चुनाव आयोग को अपना मूल पता गांव का ही दिया. अगर प्रति विधानसभा सीट पर 61,000 से 84,000 वोट्स का नुकसान हो सकता है, जो BJP के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है.
पूर्वांचल के जिलों में जैसे वाराणसी, गाजीपुर, बलिया, जौनपुर आदि के लोग दूसरे राज्यों में काम काज की तलाश में बसे हुए हैं. विपक्ष का दावा है कि मुंबई, दिल्ली, सूरत में काम करने वाले कई प्रवासी वोटर्स के नाम SIR की ड्राफ्ट सूची से काटे गए हैं. पर इसमें भी नुकसान बीजेपी को ही होता दिख रहा है. बिहार में जैसा देखा गया कि ज्यादातर प्रवासी वोटर्स ने एनडीए को वोट दिया है. यह ट्रेंड बताता है कि यूपी में भी दूसरे राज्यों में काम काम के लिए गए ज्यादातर लोग बीजेपी को ही वोट देते.
इसी तरह अवध क्षेत्र (लखनऊ, बाराबंकी, अयोध्या, रायबरेली) के शहरी इलाकों मे डुप्लीकेट एंट्री ज्यादा मिले हैं. जाहिर है इनमें बहुतेरे लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपने गांव और शहर में स्थाई निवास दोनों ही जगहों से वोटर आईडी बनवा रखी थी. जिसमें एक उन्हें छोड़नी पड़ी है. इसमें भी अधिकतर बीजेपी के ही वोटर्स हैं.
दूसरे राज्यों के भी आंकड़े देखिए क्या कहते हैं?
12 राज्यों में वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने के लिए 28 अक्टूबर, 2025 से शुरू हुई चुनाव आयोग की मुहिम 2 महीने 11 दिन चलने के बाद अब स्पेशल इंटेसिव रिवीजन का पहला फेज खत्म हो चुका है. चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेसिव रिवीजन से पहले इन 12 राज्यों में 50.97 करोड़ मतदाता थे. वैरिफिकेशन के बाद 44.38 करोड़ रह गए. मतलब करीब 6.59 करोड़ मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हट गए हैं. यह 12 राज्यों के कुल मतदाताओं का 12.93% है. यानी हर 100 वोटर्स पर करीब 13 नाम कट हैं.
अगर हम देश के दूसरे राज्यों की तुलना उत्तर प्रदेश से करते हैं तो साफ दिखता है कि सबसे ज्यादा नाम उत्तर प्रदेश में कटे हैं. यहां हर 100 में से 19 वोटर्स के नाम कटे हैं, यूपी में 2.89 करोड़ (18 फीसदी) नाम कट गए हैं. इनमें 46.23 लाख मृत, 2.17 करोड़ लोग शिफ्टेड और 25.47 लाख डुप्लीकेट वोटर शामिल हैं. राज्य में पहले 15.44 करोड़ वोटर थे, अब 12.55 करोड़ मतदाता बचे हैं. मतलब हर पांचवां वोटर लिस्ट से बाहर हो गया है.
अब दूसरे राज्यों के आंकड़े देखिए. पश्चिम बंगाल में हर 100 में से 8 वोटर्स का ही नाम डिलिट हुए हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि जैसा उम्मीद किया जा रहा था कि बंगाल में बड़े पैमाने पर वोटर्स का नाम डिलिट होगा वैसा नहीं हुआ. गुजरात में हर 100 में से 15, छत्तीसगढ़ में हर 100 में से 13 के नाम लिस्ट से हट गए. मध्य प्रदेश-राजस्थान में लगभग 7.5 प्रतिशत लोगों के नाम कटे हैं, यानी हर 13वां नाम वोटर लिस्ट से बाहर हो गया है. हालांकि ये फाइनल लिस्ट नहीं है, जिन लोगों के नाम कटे हैं, वे दावे-आपत्तियां कर सकते हैं. यह आंकड़े साफ कर रहे हैं कि जिस तरह विपक्ष ने दलित-पिछड़े- अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच उनका नाम कटने का हौव्वा खड़ा किया गया था वो सरासर गलत था.
संयम श्रीवास्तव