मध्य प्रदेश के मंडला जिले स्थित कान्हा टाइगर रिजर्व से एक नर बाघ को वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व (नौरादेही) सुरक्षित रूप से भेजा गया है. यह ट्रांसलोकेशन वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है. संबंधित अधिकारियों के मुताबिक, बाघ पूरी तरह स्वस्थ है और जंगल में स्वतंत्र जीवन के लिए सक्षम पाया गया है, इसी कारण उसे नए क्षेत्र में छोड़े जाने का निर्णय लिया गया.
दरअसल, यह नर बाघ मूल रूप से पेंच टाइगर रिजर्व के रूखड़ परिक्षेत्र, सिवनी से रेस्क्यू किया गया था. उस समय बाघ शावक की उम्र महज 4 से 5 माह थी. अनाथ अवस्था में मिलने के बाद उसे सुरक्षित तरीके से कान्हा टाइगर रिजर्व लाया गया, जहां उसके पुनर्वास और प्रशिक्षण की पूरी व्यवस्था की गई.ॉ
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घोरेला रिवाइल्डिंग सेंटर में हुआ पालन-पोषण
कान्हा टाइगर रिजर्व पहुंचने के बाद इस बाघ शावक को मुक्की स्थित घोरेला रिवाइल्डिंग बाड़े में रखा गया. यहां उसका पालन-पोषण पूरी सावधानी के साथ किया गया. साथ ही, उसे प्राकृतिक तरीके से शिकार करने और बिना मानवीय हस्तक्षेप के जंगल में विचरण करने का प्रशिक्षण दिया गया.
वर्तमान में इस नर बाघ की उम्र करीब 33 से 35 माह बताई जा रही है. विशेषज्ञों की टीम ने आकलन किया कि बाघ अब पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुका है. इसी आधार पर उसे ऐसे टाइगर रिजर्व में भेजने का फैसला किया गया, जहां बाघों की संख्या कम है लेकिन रहने के लिए पर्याप्त जंगल और संसाधन मौजूद हैं.
तय प्रोटोकॉल के तहत किया गया ट्रांसलोकेशन
बाघ को स्थानांतरित करने से पहले वन प्राणी चिकित्सकों और वैज्ञानिकों की टीम ने उसे ट्रेंकुलाइज किया. इसके बाद उसके सभी जरूरी जैविक मापदंड रिकॉर्ड किए गए. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 11(1)(ए) के तहत सक्षम प्राधिकारी से अनुमति ली गई.
पूरी प्रक्रिया तय मानक प्रोटोकॉल के अनुसार की गई. बाघ को सेटेलाइट रेडियो कॉलर पहनाकर विशेषज्ञों की निगरानी में वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व (नौरादेही) भेजा गया, ताकि उसकी गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा सके.
15 बाघों को जंगल में नया जीवन
कान्हा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर रविंद्र मणि त्रिपाठी ने बताया कि घोरेला रिवाइल्डिंग सेंटर से अब तक 15 बाघ शावकों को सफलतापूर्वक प्रशिक्षित कर जंगल में छोड़ा जा चुका है. यह प्रयोग अपने आप में अनोखा और बेहद सफल रहा है.
उन्होंने बताया कि अनाथ बाघ शावकों को पहले क्वारंटीन में रखा जाता है, फिर चरणबद्ध तरीके से उन्हें शिकार और स्वतंत्र जीवन के लिए तैयार किया जाता है. फील्ड डायरेक्टर के अनुसार, घोरेला से छोड़े गए बाघों ने अलग-अलग टाइगर रिजर्व में जाकर अपने कुनबे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है. यह प्रयास वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है.
सैयद जावेद अली