Dhar Bhojshala Row: मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित 11वीं सदी के विवादित भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर में शुक्रवार को बसंत पंचमी की पूजा भारी सुरक्षा के बीच शुरू हो गई है. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए पूजा और नमाज के लिए समय निर्धारित किया है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने आदेश दिया कि हिंदू समुदाय को सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा करने की अनुमति होगी, जबकि मुस्लिम समुदाय के लोग दोपहर 1:00 बजे से 3:00 बजे के बीच नमाज अदा कर सकेंगे.
प्रशासन ने मौके पर सुरक्षा के लिए पुलिस, आरएएफ और सीआरपीएफ सहित करीब 8,000 जवानों को तैनात किया है. पूरे परिसर की निगरानी 200 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरों और 10 ड्रोनों के जरिए की जा रही है. शांति बनाए रखने के लिए नमाजियों की लिस्ट पहले ही प्रशासन को सौंप दी गई है. एजेंसी के मुताबिक, कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने बताया कि दोनों समुदायों के लिए अलग-अलग प्रवेश और निकास द्वार बनाए गए हैं और वे इस व्यवस्था पर सहमत हैं.
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भोजशाला ASI द्वारा संरक्षित एक स्मारक है, जिसके बारे में माना जाता है कि यह परमार राजा भोज के वक्त से है. इस जगह पर हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय अपना दावा करते हैं. मुस्लिम मान्यता: मुस्लिम समुदाय इस संरचना को सूफी संत कमालुद्दीन के नाम पर कमल मौला मस्जिद मानता है और दावा करता है कि वहां सदियों से लगातार नमाज़ पढ़ी जा रही है और इस दावे का खंडन करता है कि यह मूल रूप से एक हिंदू मंदिर था. हिंदू मान्यता: हिंदू भोजशाला को देवी वाग्देवी (सरस्वती) को समर्पित मंदिर मानते हैं, जिसके लिए वे संस्कृत शिलालेखों, मंदिर जैसी मूर्तियों और वास्तुकला की विशेषताओं का हवाला देते हैं और दावा करते हैं कि यहां बहुत पहले से मंदिर थी. यह विवाद सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक भी है, जिसमें विरासत, पुरातत्व और पूजा की निरंतरता की अलग-अलग व्याख्याएं शामिल हैं.
भोजशाला में सुबह से ही पूजा पाठ जारी है. इस बीच अब नमाज भी शुरू हो गई है. 10 साल बाद ऐसा हो रहा है कि पूजा-पाठ और नमाज एक साथ एक ही दिन हो रही है. इसके लिए 8000 पुलिसकर्मी तैनात हैं और ड्रोन कैमरों से निगरानी की जा रही है.
हिंदू संगठनों द्वारा निकाला गया एक जुलूस भोजशाला पहुंचा, जहां सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बसंत पंचमी पर पूजा-अर्चना की जा रही है.
सुप्रीम कोर्ट ने धार भोजशाला से जुड़े मूल विवाद को भी मध्य प्रदेश हाई कोर्ट भेज दिया और उसकी डिवीज़न बेंच को इस मामले पर तेज़ी से सुनवाई करने का निर्देश दिया. दायर याचिका का निपटारा करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने एचसी से दो हफ़्ते के अंदर मूल विवाद की सुनवाई करने को कहा.
इसने यह भी निर्देश दिया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा सौंपी गई सीलबंद रिपोर्ट को खुली अदालत में खोला जाए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "हम हाई कोर्ट से गुजारिश करते हैं कि ASI की सीलबंद रिपोर्ट को खुली अदालत में खोला जाए" और इसके साथ ही यह भी निर्देश दिया कि रिपोर्ट की कॉपी दोनों पक्षों को दी जाएं. इसके बाद दोनों पक्षों को दो हफ़्ते के अंदर ASI रिपोर्ट पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराने की अनुमति होगी.
अदालत ने यह भी आदेश दिया कि जब तक हाई कोर्ट इस मामले पर सुनवाई नहीं करता, तब तक विवादित जगह पर यथास्थिति बनाए रखी जाए.
प्रशासनिक तौर पर, शुक्रवार को कड़ी सुरक्षा और सख्त निगरानी में मैनेज किए जाने की उम्मीद है. बड़ी तादाद में पुलिस की तैनाती, निगरानी के उपाय और प्रेयर्स के लिए तय वक्त से पता चलता है कि फोकस टकराव के बजाय स्थिति को कंट्रोल करने पर है.
गुरुवार को, सुप्रीम कोर्ट ने दोनों समुदायों को शुक्रवार को अपनी-अपनी प्रार्थना करने की इजाज़त दी. इसके साथ ही, सख्त नियमों पर भी ज़ोर दिया.
शुक्रवार की नमाज़ मस्जिद के अंदर एक तय जगह पर दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच होगी, और नमाज़ के तुरंत बाद लोग वहां से चले जाएंगे.
सरस्वती पूजा के इंतज़ाम अलग से किए जाएंगे, जिससे कोई टकराव या भीड़ से जुड़ी कोई दिक्कत न हो.
ज़ोर इस बात पर है कि लोगों की आवाजाही कंट्रोल में रहे, पूजा-पाठ तय समय पर हो और किसी भी तरह से कानून-व्यवस्था न खराब हो.
2016 में भी ऐसी ही स्थिति बनी थी, जब बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ी थी, जिससे धार में उसी जगह पर प्रेयर के वक्त को लेकर विरोध प्रदर्शन और झड़पें हुई थीं. वह घटना प्रशासन और अदालतों के लिए एक अहम संदर्भ बिंदु बनी हुई है.
कोर्ट के आदेश पर हुए साइंटिफिक सर्वे के बाद विवाद और बढ़ गया. मार्च 2024 में, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ASI को साइट के असली स्वरूप की साइंटिफिक जांच करने का निर्देश दिया.
ASI ने जुलाई 2024 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें कथित तौर पर पहले से मौजूद मंदिर के ढांचों के सबूत मिले, जिसमें संस्कृत शिलालेख और खंडित हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां शामिल थीं.
हालांकि, इन नतीजों से सार्वजनिक चर्चा में हिंदुओं के दावों को मज़बूती मिली है, लेकिन इस रिपोर्ट से अभी तक मालिकाना हक या धार्मिक स्थिति के बारे में कोई आखिरी न्यायिक फैसला नहीं आया है.
पिछले 23 सालों से एक एडमिनिस्ट्रेटिव व्यवस्था लागू है, जिसके तहत हिंदुओं को मंगलवार को भोजशाला में पूजा करने की इजाज़त है. मुसलमानों को साइट पर शुक्रवार की नमाज़ पढ़ने की इजाज़त है. इस सिस्टम ने काफी हद तक रोज़ाना के झगड़ों को रोका है, लेकिन जब बड़े हिंदू त्योहार शुक्रवार को पड़ते हैं, तो परेशानियां सामने आती हैं.
भोजशाला ASI द्वारा संरक्षित एक स्मारक है, जिसके बारे में माना जाता है कि यह परमार राजा भोज के वक्त से है. इस जगह पर हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय अपना दावा करते हैं.
मुस्लिम मान्यता: मुस्लिम समुदाय इस संरचना को सूफी संत कमालुद्दीन के नाम पर कमल मौला मस्जिद मानता है और दावा करता है कि वहां सदियों से लगातार नमाज़ पढ़ी जा रही है और इस दावे का खंडन करता है कि यह मूल रूप से एक हिंदू मंदिर था.
हिंदू मान्यता: हिंदू भोजशाला को देवी वाग्देवी (सरस्वती) को समर्पित मंदिर मानते हैं, जिसके लिए वे संस्कृत शिलालेखों, मंदिर जैसी मूर्तियों और वास्तुकला की विशेषताओं का हवाला देते हैं और दावा करते हैं कि यहां बहुत पहले से मंदिर थी.
यह विवाद सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक भी है, जिसमें विरासत, पुरातत्व और पूजा की निरंतरता की अलग-अलग व्याख्याएं शामिल हैं.
पिछले 23 साल से चले आ रहे एक इंतज़ाम के तहत, ASI हिंदुओं को मंगलवार को भोजशाला में पूजा करने की इजाज़त देता है, जबकि मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज़ पढ़ने की इजाज़त है.
साल 2016 में भी ऐसी ही स्थिति बनी थी, जब बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ी थी, जिससे विवादित जगह पर नमाज़ के वक्त को लेकर धार में विरोध प्रदर्शन और झड़पें हुई थीं.
भोज उत्सव समिति ने 23 जनवरी को पूरे दिन सरस्वती पूजा करने के लिए अधिकारियों से इजाज़त मांगी थी, जबकि मुस्लिम समुदाय ने दिन के महत्व का हवाला देते हुए दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक जुमे की नमाज़ पढ़ने की मंज़ूरी के लिए एक ज्ञापन सौंपा था.
भोजशाला मुक्ति यज्ञ समिति ने कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि वे सूर्योदय से सूर्यास्त तक निरंतर पूजा जारी रखेंगे. वहीं, कमल मौला नमाज इंतजामिया कमेटी के जल्फिकार पठान ने भी शांति बनाए रखने की अपील करते हुए फैसले को सर्वसम्मति से स्वीकार किया है. पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस संतुलित फैसले का स्वागत किया है. एएसआई की 2003 की व्यवस्था के मुताबिक, यहां मंगलवार को हिंदू पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम नमाज अदा करते आए हैं.
एसपी मनीष अवस्थी ने बताया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए 8,000 सुरक्षाकर्मी तैनात हैं, जिनमें महिला पुलिस इकाइयां भी शामिल हैं. भोजशाला की ओर जाने वाली सड़कों पर बैरिकेडिंग की गई है और हर वाहन की बारीकी से जांच हो रही है. सोशल मीडिया पर भी चौबीसों घंटे निगरानी रखी जा रही है, जिससे कोई अफवाह न फैले. परिसर के अंदर सरस्वती पूजा के लिए भगवा झंडों और रंगोली से सजावट की गई है.
हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पांचोली की बेंच ने आपसी सम्मान बनाए रखने की अपील की. कोर्ट ने साफ किया कि एक ही परिसर के अंदर नमाज के लिए एक अलग और विशेष जगह आवंटित की जाएगी, जिससे दोनों धार्मिक गतिविधियां बिना किसी टकराव के संपन्न हो सकें. कोर्ट ने 7 अप्रैल 2003 के एएसआई (ASI) के आदेश को ध्यान में रखते हुए यह व्यवस्था दी है.