जलियांवाला बाग नरसंहार पर लिखी नानक सिंह की कविता 'खूनी बैसाखी' 99 साल बाद फिर छपेगी

जलियांवाला बाग की घटना 13 अप्रैल 1919 को हुई थी. उस वक्त नानक सिंह वहीं मौजूद थे. वहां के दर्दनाक अनुभवों पर सिंह ने 'खूनी बैसाखी' नाम से एक लंबी कविता लिखी थी, जिसे अंग्रेजों ने बैन कर दिया था. अब 99 साल बाद वह कविता फिर प्रकाशित होने जा रही है

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फाइल फोटो फाइल फोटो

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 14 फरवरी 2019,
  • अपडेटेड 5:43 PM IST

नई दिल्लीः पंजाब के जलियांवाला बाग में निहत्थे भारतीयों पर किया गया नरसंहार अंग्रेजी हुकूमत पर एक ऐसा धब्बा है, जो बीतते वक्त के साथ भी धुंधला नहीं होता. मशहूर पंजाबी लेखक नानक सिंह ने उसी दौर में एक कविता लिखी थी. पर 1920 में इसके प्रकाशन के बाद अंग्रेजों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था. अब इस कविता का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है. जलियांवाला बाग नरसंहार के शताब्दी वर्ष पर इसे अगले महीने हार्पर कॉलिन्स इंडिया द्वारा प्रकाशित किया जाएगा.

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दरअसल, जलियांवाला बाग की यह घटना 13 अप्रैल 1919 को हुई थी. उस वक्त नानक सिंह वहीं मौजूद थे. हुआ यह था कि ब्रिटिश सैनिकों ने रॉलेट अधिनियम का विरोध कर रहे निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई थी, जिसमें सैंकड़ों लोग मारे गए थे. नानक सिंह तब बेहोश हो गए थे. उनकी उम्र तब 22 साल थी.

घटना के दौरान के दर्दनाक अनुभवों पर सिंह ने 'खूनी बैसाखी' नाम से एक लंबी कविता लिखी थी. इसमें नरसंहार के पहले और बाद की राजनीतिक घटनाओं का जिक्र किया गया था. इस कविता में ब्रिटिश हुकूमत की तीखी आलोचना की गई थी, जिसके चलते इसके प्रकाशित होने के कुछ ही समय बाद इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था.

कहते हैं, गुलामी के उस दौर में इसकी पांडुलिपि भी कहीं खो गई थी. हालांकि लंबे समय बाद, यह कविता ढूंढ़ ली गई. अब नानक सिंह के पोते एवं राजनयिक नवदीप सूरी ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया है.

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खास बात यह कि यह कविता द्विभाषी रूप में मूल कविता के साथ छपेगी, जिसमें नवदीप सूरी के अलावा एच एस भाटिया और जस्टिन रौलट के लेख भी शामिल होंगे. याद रहे कि जस्टिन रौलट के परदादा सर सिडनी आर्थर टेलर रौलट ने ही रौलट कमेटी की अगुआई कर रौलट एक्ट ड्राफ्ट किया था, जिसके विरोध में यह नरसंहार हुआ.

गौरतलब रहे कि नानक सिंह (1897-1971) को पंजाबी उपन्यास का जनक माना जाता है. हालांकि उन्होंने केवल चौथी कक्षा तक की शिक्षा हासिल की थी, पर इसके बावजूद उन्होंने 59 पुस्तकों की रचना की और 1962 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित भी हुए थे.

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