Sahitya Aajtak Lucknow: 'सिर्फ नवाब और कबाब तक महदूद नहीं ...', अवध की संस्कृति पर बोले - लेखक और साहित्यकार

साहित्य आजतक लखनऊ के स्टेज टू पर 'दास्तान-ए-अवध : कल और आज' में वहां के लेखकों और साहित्यकारों ने अवध की विविध संस्कृतियों, परंपराओं, नजाकत, नफासत, कबाब और नवाब से लेकर स्वतंत्रता संग्राम में अवध क्षेत्र के योगदान पर अपनी-अपनी बातें रखी.

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साहित्य आजतक लखनऊ में दास्तान-ए-अवध - कल और आज में बोले लेखक और कवि साहित्य आजतक लखनऊ में दास्तान-ए-अवध - कल और आज में बोले लेखक और कवि

aajtak.in

  • लखनऊ,
  • 14 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 6:34 PM IST

लखनऊ में साहित्य आजतक के मंच पर पहले दिन 'दास्तान-ए-अवध : कल और आज' सत्र का आयोजन किया गया. इसमें अवध क्षेत्र के जाने माने लेखकों और साहित्यकार शामिल हुए और उन्होंने अवध क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत पर चर्चा की. लेखकों मे एक स्वर से ये बात कही कि आज लखनऊ को सिर्फ नवाब और कबाब के लिए जाना जाता है, जबकि यहां इससे कहीं ज्यादा है.   

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चर्चा की शुरुआत करते हुए युवा साहित्यकार और लेखक भगवंत अनमोल  ने कहा कि  जो लेखक साहित्य के बारे में नहीं सोचता है तो वो लेखक नहीं है. अवध ने पूरे देश में क्रांति लाने का काम किया. रानी लक्ष्मी बाई, नाना राव पेशवा और तीसरे मंगल पांडेय मेरठ से. अवध में और भी बहुत सारी जानें गईं, जिनके बारे में लोगों को पता नहीं है. 

बाउनी इमली, जहां 52 लोगों को दी गई थी फांसी
उन्होंने बताया कि फतेहपुर में एक पेड़ है इमली का बाउनी इमली, वहां 1857 में 52 लोगों को फांसी दे दी गई थी. फांसी ही नहीं दे दी गई थी, साथ में ब्रिटिश अफसरों ने कहा था कि कोई भी ये शव को नहीं उतारा जाएगा और इसका दाह संस्कार नहीं किया जाएगा. 37 दिनों तक शव पेड़ से लटके हुए. उसमें कीड़े पड़ने लगे तब उसका संस्कार हुआ. कहने का मतलब है कि लाखों लोगों की जान गई तब जाकर आजादी मिली. इसलिए हम आज किसी मंच पर बैठकर किसी को गाली भी दे सकते हैं. अवध में आल्हा बहुत सुना जाता था दो मोटिवेशनल स्पीकर का ही काम करता था. आल्हा अवध का ही है. ये लखनऊ का ही है.

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वहीं लेखिका और कवियत्री सबाहत आफरीन ने शुरुआत अपने नाम से की. उन्होंने बताया कि कैसे उनका नाम सबाहत पड़ा. उन्होंने  कहा कि मेरी मां पढ़ाई लिखाई की शौकीन थी और मेरे नाना की लाइब्रेरी में वो पढ़ती थीं. उन्होंने एक नॉवेल पढ़ी उसमें एक नायिका था उसका नाम सबाहत था. तब मेरी मां ने सोची थी कि अगर मेरी बेटी हुई तो उसका नाम सबाहत रखूंगी. सबाहत का मतलब खूबसूरत होता है. 

अवध का मतलब सिर्फ कबाब और नवाब नहीं...
आगे उन्होंने कहा कि अवध का मतलब  सिर्फ कबाब और नवाब से नहीं है. देश से बाहर भी लोग लखनऊ को जानते हैं. इसक मतलब है कि इसका इतिहास काफी समृद्ध रहा है. इसलिए मुझे लगता है कि क्यों इसे सिर्फ कबाब और नबाब से जोड़ दिया गया है. 1857 की जो विद्रोह की लड़ाई थी वो सिर्फ एक साल तक लखनऊ में ही चली. चाहे वह बेगम हजरत महल हों या दूसरे लोग. यहां बेगम आलिया की बनवाई हुई मंदिर भी है, अलीगंज की चार सितारा मंदिर. सुनकर कितना सुंदर लगता है कि आज से 200 साल पहले बेगम आलिया ने हनुमान जी का मंदिर बनवाया था, क्योंकि उन्हें उनके दर्शन हुए थे. 

एक तराइन का मस्जिद है, एक झाऊ लाल का बनवाया हुआ इमामबाड़ा है. यह सिर्फ हमारे यहां ही मिलेगी. इसे सिर्फ कबाब और नबाब से जोड़कर नहीं देख सकते हैं. पिछले साल अलविदा जुमे की नमाज और होली दोनों एक साथ पड़ी. होली में हम मानकर चलते हैं कि कुछ हुड़दंगी भी होते हैं, वहीं दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं, जिनपर नमाज के दौरान रंग नहीं पड़ना चाहिए. तब दोनों तरफ से मिलकर यह तय किया गया कि होली का जुलूस दोपहर 12 बजे तक खत्म हो जाएगा और अलविदा की जो नमाज है वो देर से शुरू होगी. इसलिए अवध का ये संगम बहुत ही खूबसूरत है.

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लखनऊ में संस्कृति मरती नहीं है. यहां आधुनिक चीजों के साथ सारी पुरानी चीजे भी हैं. आप यहां जो देखना चाहते हैं, वो यहां मिलेंगी. निर्भर इस पर करता है कि हम चुन क्या रहे हैं. यहां मॉल भी है और लाइब्रेरी भी है. 

यहां फैली हैं नवाबों की कई कहानियां 
वहीं 'बादशाह सलामत हाजिर हो' उपन्यास के लेखक बालेंदु द्विवेदी ने कहा कि 'बादशाह सलामत हाजिर हो' जो मेरी उपन्यास है एक नवाब के चरित्र पर पर केंद्रित है. अगर हम कहें कि यह किसी खास चरित्र पर फोकस है तो इस उपन्यास की कहानी या टाइटल के साथ न्याय नहीं होगा. कहानी एक ऐसे नवाब के इर्द-गिर्द है जो वहशी मिजाज है और ढेर सारे अनाप-शनाप फैसले लेता है. वर्तमान समय में भी इतिहास में भी इसकी प्रासंगिकता है कि ऐसा कोई नवाब जो होता होगा जो अतार्किक ढंग से वहशी फैसले ले तो प्रजा को क्या-क्या परेशानियां होती हैं, उसे दिखाने की कोशिश की गई है. मैंने इसे लिखने से पहले अवध के ढेर सारे नवाबों की कहानियां पढ़ी और उसका निचोड़ इसमें डालने की कोशिश की. इसका जो मुख्य पात्र है नकबुल्ला नवाब की कहानी बनी.

क्योंकि इतिहास को हम सीधे साहित्य में लेकर आए तो ऐतिहासिक साहित्य कहा जाएगा, लेकिन हम इसे सीधे नहीं लाकर फिक्शन के साथ लाते हैं तो इसमें पाठक को एक रस मिलता है. 

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लेखिका  रजनी गुप्त ने बताया कि  मैं 1990 में इस शहर में आई और मैंने जितना सुना था, नजाकत, नफासत, तहजीब, जीवनशैली और जितनी खूबसूरती से लोककथाएं, किंवदंतियां, जन श्रुतियां अवध क्षेत्र के बारे में बचपन से लेकर अब तक सुनी थी. जैसे जायसी ने, प्रेम चंद ने या प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई. ये सारी चीजें लखनऊ की नजाकत, नफासत, वास्तुकला, कत्थक, साहित्य, संस्कृति और जीवन शैली आज के संदर्भ में सिर्फ इतिहास की थाती बनकर रह जाएंगी. लखनऊ का मतलब होता है पहले आप. मैं झांसी से आई थी, जो अपने खुरदरे पन के लिए जाना जाता है. जब यहां आई तो कुछ चीजें बची हुई थी. 

वैसे अब भी कुछ बचा हुआ है, इसमें कबाब और नवाब और यहां की गंगा-जमुनी तहजीब जैसी चीजें बची हुई हैं और आगे भी रहेगी. अवध में एक तरफ पूरा अयोध्या और रामायण है और दूसरी तरफ जायसी का पद्मावत है. जहां तक स्त्रियों की जीवनशैली की बात करती हैं तो अवध की संस्कृति महिलाओं के जीवनशैली में वो नजाकत, नफासत और लिहाज अभी भी देखने को मिलेगा. जो चीजें दिल्ली या दूसरे शहरों में तो देखने को नहीं ही मिलती है.

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