‘साहित्य आजतक’ के दूसरे दिन ’कविता आज कल’ के सत्र में समकालीन हिंदी कविता के तीन बड़े नाम अशोक वाजपेयी, लीलाधर मंडलोई और अनामिका ने अपने विचार रखे और अपनी चुनिंदा कविताएं पेश कीं. इस दौरान सत्र की मॉडरेटर अंजना ओम कश्यप के सवाल पर वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी ने कहा कि असहिष्णुता के विरोध में कवियों, साहित्यकारों का अवॉर्ड वापसी अभियान वास्तव में अपने लक्ष्य में सफल रहा है.
असहिष्णुता के बारे में अशोक वाजपेयी ने कहा, हम असहिष्णुता के खिलाफ लगातार बोल रहे थे, हमें तो ये तक कहा गया कि 'जूते मारों सालों को', ये नेताओं ने कहा. हमारा काम है सच बताना, कौन क्या कहता है इससे हमें फर्क नहीं पढ़ता..
उन्होंने कहा, 'हममें से कुछ लोगों को लगा कि पुरस्कार वापसी कर कुछ नाटकीय अभिव्यक्ति हो सकती है. जहां तक मेरी बात है, मुझे लगा कि मेरी अभिव्यक्ति सफल हुई. पहली बार हम पहले पेज पर थे, सभी न्यूज चैनल पर थे. हमारी बात को गंभीरता से सुना गया, जबकि वैसे कवियों को कोई नहीं पूछता.'
कविता अगर सच नहीं बताती, तो कवि ये क्यों सोचता है कि वो पुरस्कार लौटा कर सच बता देगा? आपको या कई कवियों को क्यों लगा कि पुरस्कार लौटाकर आप सच बता पाएंगे, क्या आपकी लेखनी कमजोर पड़ गई?
इस सवाल पर अशोक वाजपेयी ने कहा, ‘असल में बहुत से लोगों ने हमारा लिखा, पढ़ा ही नहीं है. हमारी 50-60 साल की कविता प्रश्नवाचक और विरोध की रही है. दुष्यंत से पहले भी. दूसरी बात, हिंदी समाज ऐसा समाज नहीं है, जिसमें लेखकों, कवियों की बात सुनी जाए.'
क्या आज के कवि खुलकर व्यवस्था के खिलाफ लिख रहे हैं? इस सवाल पर अशोक वाजपेयी ने कहा कि हिंदी कविता असल में राजनीति का एकमात्र प्रतिपक्ष है. हम सांप्रदायिकता, जातिवाद, धर्मांधता के पक्ष में हिंदी कविता को नहीं खड़ा कर सकते. हिंदी की अपनी तेजस्विता बरकरार है. वो सवाल पूछती है. हबीब तनवीर ने कहा था कि हम सत्यनाम के व्यापारी हैं. आजकल तो असत्य नाम के व्यापारी ज्यादा हैं. अब तो असहिष्णुता इतनी बढ़ गई है कि लगता है कि हमने जो कुछ किया वो छोटा उद्यम था.
उन्होंने कहा, 'हिंदी कविता इस महत्वपूर्ण मुकाम पर भी सत्ता के विरोध में है. ऐसी चीज सत्ता को पसंद नहीं आती. हमारा काम सत्ता का न समर्थन करना, न विरोध करना है. हमारा काम जो सच है उसे कहना है.'
वरिष्ठ कवयित्री अनामिका ने कहा, ‘सूरज ये सोचकर नहीं उगता कि कलियां खिल जाएंगी. नदियां ये सोचकर नहीं बहतीं कि उनके किनारे सभ्यता बस जाएगी. इसी तरह कवि भी होता है. कभी-कभी जब संकट होता है तो थोड़ी से नाट्य अभिव्यक्ति होती है. गांधी ने यही किया था. जब सुनी नहीं जाती तो गांधीवादी तरीका अपनाना पड़ता है.’
कवि लीलाधर मंडलोई ने कहा, मैं एक बात अपने अनुभव से बताना चाहता हूं. चाहे मीडिया हो, धर्म या सत्ता सबकी विश्वसनीयता पर एक प्रश्न हमेशा लगा रहता है. इस तरह की सत्ताएं हमेशा विश्वसनीयता अर्जित करने की कोशिश करती रहती हैं. लेकिन कविता में ऐसा नहीं होता. कविता विश्वसनीय तरीके से आती है, उस पर कोई संदेह नहीं करता. आप जो पढ़ते हैं, उस पर संदेह नहीं करते.’
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दिनेश अग्रहरि