'Gen-Z को हिंदी बोलने में शर्म आती है', जाने-माने लेखकों को नई पीढ़ी से क्या शिकायत? दी ये सलाह

साहित्य आजतक 2025 के एक सत्र में क्षेत्रीय भाषाओं, हिंदी और नई पीढ़ी के बीच संबंधों पर चर्चा हुई. लेखक एस आर हरनोट, उपन्यासकार उर्मिला शिरीष और पत्रकार विकास झा ने भाषाई विविधता और साहित्य के संरक्षण पर जोर दिया. उन्होंने नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने और लोक बोलियों को सीखने की सलाह दी.

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साहित्य आजतक 2025 के मंच पर लेखक साहित्य आजतक 2025 के मंच पर लेखक

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 21 नवंबर 2025,
  • अपडेटेड 10:43 PM IST

Sahitya Aajtak 2025: राजधानी दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में साहित्य आजतक 2025 की शानदार शुरुआत हो चुकी है. साहित्य आजतक 21 से 23 नवंबर 2025 तक चलेगा जहां कला और साहित्य जगत के नामी-गिरामी कलाकार शिरकत कर रहे हैं. साहित्य आजतक के पहले दिन तीन जाने-माने लेखकों ने 'भाषा और साहित्य के क्षेत्रीय सवाल' सत्र में क्षेत्रीय भाषाओं, हिंदी, नई पीढ़ी समेत कई मुद्दों पर बात की.

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सत्र में कवि और लेखक एस. आर.हरनोट, शिक्षाविद् और उपन्यासकार उर्मिला शिरीष, पत्रकार और लेखक विकास झा शामिल हुए. इस दौरान विकास झा ने कहा, 'आइंस्टीन ने कहा था कि अगर मधुमक्खियां खत्म हो जाएं तो इंसान 4 महीनों में खत्म हो जाएगा. क्षेत्रीय भाषाएं मधुमक्खियां हैं जो लुप्त हुईं तो संसार का साहित्य भी 4 महीने में ही लुप्त हो जाएगा. क्षेत्रीय भाषाओं के दम पर ही हिंदी साहित्य टिका हुआ है.'

साहित्य और भाषा के साथ नई पीढ़ी के संबंधों पर बात करते हुए विकास झा ने कहा कि जेन जी ने हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के दूर अपनी एक अलग भाषा बना ली है.

उन्होंने कहा, 'जेन जी ने अपनी अलग भाषा बना ली है. ये सब नए भाषाविज्ञानी हैं जिन्होंने भाषा को छोटा कर दिया है. लेकिन हम भी अपने समय में इन्हीं की तरह थे. हमारे पिताजी की बातों पर हम क्रांतिकारी मूड में रहते हैं. आज जब पिता की उम्र में आए हैं तो लगता है कि पिता जी सही कहते थे. नई पीढ़ी भी जब हमारे जैसी होगी तो उसे सब अपनेआप समझ आएगा.'

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Gen-Z को हिंदी बोलने में शर्म आ रही?

इसी दौरान सत्र के मॉडरेटर, आजतक के एग्जिक्यूटिव एडिटर और एंकर सईद अंसारी ने पूछा कि आजकल के बच्चों को हिंदी बोलने में शर्म आती है...वो हिंदी ठीक ढंग से नहीं बोल पाते. क्या अंग्रेजी उन पर हावी हो रही है?  

एस. आर.हरनोट ने जवाब देते हुए कहा, 'हम लोकबोलियों, किताबों, अखबारों के साथ बड़े हुए, नई पीढ़ी मोबाइल के साथ. दुख होता है कि नई पीढ़ी अपनी भाषा नहीं जानती. गांव के बच्चे अपनी बोलियां नहीं जानते. लोक बोलियों में मिठास, अपनापन है... अगर आपको गांव से होते हुए भी वहां की बोली नहीं जानते तो आप अपनी संस्कृति से अनभिज्ञ हैं.'

उन्होंने आगे कहा, 'आज हिंदी को बिगाड़ा जा रहा है. हमारी अगली पीढ़ी को लोक बोलियां छोड़िए, हिंदी भी ढंग से नहीं आ रही है.' 

उन्होंने जेन जी को सलाह देते हुए कहा कि वो मोबाइल के साथ एक किताब भी रखें. बुजुर्गों से लोक बोलियों के शब्द जानें, घर में किताबों के लिए जगह बनाएं.

Gen-Z को लेखकों की सलाह

लेखक विकास झा ने इसमें जोड़ते हुए कहा, 'जेन जी कोई भी भाषा बोले लेकिन गांव जरूर जाए. वो जहां से हैं, वहां जाएं, अपनी जड़ों की तरफ जाएं. मुझे बुरा लगता है कि आजकल के बच्चे अपने यहां के अनाज नहीं जानते. इसके बारे में जाने. गांव देहात के बच्चे भाग्यशाली हैं क्योंकि वो ये सब जानते हैं.

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लेखिका उर्मिला शिरीष ने कहा कि 'हमारा दायित्व है कि हम जेन जी को आकर्षित करने के लिए साहित्यिक कार्यक्रम करें, उन्हें लिखने-पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें.'

सत्र के दौरान उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता संस्कृति, लोक कला, क्षेत्रीय बोलियों में समाहित है. उन्होंने कहा, 'साहित्य का ज्यादा- से ज्यादा प्रचार करना आज की जरूरत है. नई पीढ़ी तक बात पहुंचे इसलिए हम बार-बार भाषा और क्षेत्रीयता की बात करते हैं.'

साहित्य पर बाजारवाद हावी

उर्मिला शिरीष ने कहा कि आज साहित्य पर बाजारवाद हावी है और आर्थिक पहलू को देखते हुए साहित्य लिखा जा रहा है. उन्होंने कहा, 'कौन सी चीज किस तरह से बिकती है, किस तरह ज्यादा बिकेगी, हम उस पर ध्यान देते हैं. साहित्य में किसानों, आदिवासियों, गांववालों की बातों, बोलियों को नई पीढ़ी के सामने लाना जरूरी है.'
 
उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दौर ने नई पीढ़ी जानना नहीं चाहती कि उनकी जड़ें गावों में है, लोकभाषाओं में हैं. अंग्रेजी के प्रभाव पर बात करते हुए उन्होंने कहा, 'समझिए कि जब हिंदी के लिए हमें इतना लड़ना पड़ रहा है, तो क्षेत्रीय बोलियों की दिक्कतें कितनी होंगी. लेकिन अब भी कुछ लोग हैं जो क्षेत्रीय बोलियों को साहित्य के जरिए बचाए हुए हैं.

हिमाचल प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले लेखक एस. आर. भनोट ने सत्र में अपने साहित्य में क्षेत्रीय बोलियों के इस्तेमाल और पहाड़ की समस्याओं पर भी बात की.

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उन्होंने कहा, 'पहाड़ों की समस्याएं मैदानी इलाकों से अलग हैं. वहां बहुत लेखक हैं जो हिंदी में लिखते हैं. पहले वहां 30 बोलियां थीं आज 3-4 बची हैं. हिमाचल में अलग-अलग बोली, लिपि थी... सरकार की कोशिश के बावजूद, ये खत्म होती जा रही है. हम साहित्य के जरिए कोशिश कर रहे हैं कि ये बची रहें.'

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