साहित्य आजतक: स्वानंद किरकिरे बोले- अभिनय के लिए सबसे अच्छा दौर

बॉलीवुड के मशहूर गीतकार स्क्रिप्ट और राइटर स्वानंद किरकिरे ने साहित्य आजतक के मंच पर कई बेहतरीन बातें साझा कीं.

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स्वानंद किरकिरे स्वानंद किरकिरे

मोहित पारीक

  • नई दिल्ली,
  • 17 नवंबर 2018,
  • अपडेटेड 7:02 PM IST

साहित्य आजतक 2018 के मंच पर प्रसिद्ध गीतकार, लेखक, कथाकार स्वानंद किरकिरे ने सेशन 'बहती हवा सा था वो' में शिरकत की. इस दौरान उन्होंने अपने करियर को लेकर बात की और कई गाने भी गाए. अपनी बहुमुखी प्रतिभा को लेकर उन्होंने कहा कि मैं आज जो भी कर पाया हूं वो नाटक की वजह से ही कर पाया हूं. उन्होंने ये भी बताया कि अलग-अलग चीजें करने से आदमी बोर नहीं होता है और अलग-अलग विधा में काम करने से व्यक्ति कुछ कर पाता है.

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मुझे डर नहीं लगता

एनएसडी से पढ़ाई करने वाले किरकिरे ने बताया कि मेरे लिए दिल्ली महत्वपूर्ण अहम पड़ाव रहा और यहां से बहुत कुछ सीखने लगा. मैंने यहां बहुत कुछ सीखा और मुंबई में उन्हें बेचने चला गया. वहीं अपनी सफलता को लेकर किरकिरे का कहना है कि एक जुनून होना आवश्यक है और मुझे कोई चीज करने से डर नहीं लगता है.

अभिनय का सबसे अच्छा दौर है

किरकिरे ने वर्तमान सिनेमा की परिस्थितियों को लेकर कहा कि यह अभिनय का सबसे अच्छा दौर है. साथ ही यह एक्टिंग, स्क्रिप्ट, कला और गीत आदि का सबसे अच्छा दौर है. उन्होंने कहा, 'मैं खुशनसीब हूं कि मैं इसमें इस दौर में काम कर रहा हूं.'

फिल्म की मांग से दबाव बनता है

उन्होंने एक गीतकार की आजादी को लेकर कहा कि जब आप एक विचारधारा के साथ काम करने की सोच को लेकर काम शुरू करते हैं, लेकिन बाद में आपको पता चलता है कि यह एक बाजार है. आप पर फिल्म को लेकर दबाव होता है. आपसे कई अपेक्षाएं की जाती है और शिकंजे कसे जाने लगते हैं.

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उस दौरान लगता है कि मुझे लिखने की आजादी होनी चाहिए, लेकिन सिनेमा की भी कई दिक्कतें होती हैं. तो आप किताब आदि के माध्यम से वो सब लिखते हैं, जो आप लिखना चाहते हैं. उसके बाद इस किताब में से ही कई गीत निकलते हैं और उसे फिल्म में शामिल किया जाता है. जैसे पीके फिल्म भी 'हाथों में हाथ लिए' गाना निकला था.

गुलजार से हैं प्रेरित

किरकिरे ने बताया, ' मैं गुलजार से प्रेरित रहा हूं और उनकी वजह से गीतों की तरह आकर्षित हुआ. गुलजार के बिना मैं नहीं होता. मैं खुशनसीब हूं कि उन तक पहुंचा और उनके साथ काम करने की मौका मिला.

वैक्यूम क्लिनर भी बेचे

फिल्मों की तरह अपने झुकाव और इस मुकाम तक पहुंचने से पहले के संघर्ष को लेकर उन्होंने कहा, 'मैं स्कूल से भागकर फिल्म देखता था. मैंने हर रोज एक फिल्म देखी थी और एक फिल्म को एक से ज्यादा बार देखता था. मेरी मां को अभी भी लगता है कि मैं गलत लाइन में हूं और उसका मानना है कि मैं अभी भी नौकरी करुंगा.

उन्होंने बताया, 'जब मेरा एडमिशन हुआ था तो मैं वैक्यूम क्लिनर बेचता था और वहां लोगों को डेमो भी देना होता था. उस दौरान भी एक तरह का एक्ट करना होता था. उस दौरान कई लोग घंटी बजाने पर अपने कुत्ते पीछे लगा देते थे. वो दौर बहुत सीखाता है. हालांकि आप हुनर पर काम कर लेते हैं तो समाज में आपको जरूर ढूंग निकाल लिया जाएगा.

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मुंबई में मिस करता हूं इंदौर

"मुझे बहुत एक्साइटमेंट है. तीन राज्यों में चुनाव है. उसके बाद आम चुनाव होने हैं. इस वक्त एमपी में लोग चाय पर चाय पी रहे होंगे, खा रहे होंगे. चुनाव की चर्चाएं और बेफिक्री होगी. मैं इंदौर से हूं. हम इंदौरी लोगों को एक ही बात का घमंड है. वो है खाना. मैं मुंबई में इंदौर के खाने को बहुत ज्यादा मिस करता हूं."

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