अवध की संस्कृति की पहचान रहे लखनऊ की शाम ने शनिवार को अपनी उसी पारंपरिक और खांटी मिजाज की बतकही का रस महसूस किया. सूरज ढल रहा था और पश्चिम की लालिमा के साथ पूरब के जो रंग साहित्य आजतक लखनऊ-2026 के मंच पर उतरने लगे, उसने हर अवधी को अवध की याद दिला दी. मौका था खास सेशन 'काशी, प्रयाग और अवध में बसंत और फाग' का. इस दौरान कवि यश मालवीय ने न सिर्फ अपनी कविताएं पेश की, बल्कि कई यादगार किस्से भी सुनाए.
उन्होंने अवध की बातों का जिक्र करते हुए और इस फगुआए मौसम के मिजाज को समझते हुए, एक प्रेम भरी कविता सुनाई.
आइने में जो दिखा वो कोई सपना तो नहीं
देखकर भी न देखे जो कोई अपना तो नहीं
छाए हैं याद के बादल न ही बरसे न छंटे
बस के दिल में ये भुलाना कोई बसना तो नहीं
भर नज़र देख लिया लग गई नज़र मेरी
हाय सज के ये संवरना कोई सजना तो नहीं
हम तो लिखते थे, लिख रहे हैं, लिखे जाएंगे
जब तलक तू न सुने ये कोई रचना तो नहीं।
कवि यश मालवीय कहते हैं कि अवध की संस्कृति साझा संस्कृति है. हम आपसे में मिल-बांटकर जीते हैं. वह कहते हैं कि दो पड़ोसनें तो अपना दुख-सुख सब बांट लेती हैं. ऐसी ही एक पड़ोसन थी, कभी नमक मांग ले, कभी तेल मांग ले... तो एक दिन उसकी पड़ोसन ने उससे कहा-
नून देबें मंगनी, हम तेल देबे मंगनी
सैंया न देब मंगनी
सैंया हमारे फूलवा के जोखल
घट जइहैं त केकरा से लेब
कवि यश मालवीय कहते हैं कि बनारस से अवध तक का हाल ऐसा है कि ये झूमता ही रहता है, और बसंत आ जाए और फाग गाने लगें तो कैसे अवध न झूमें. उधर काशी में खेले मसाने में होली का राग छिड़ता है तो इधर अवध नें रघुबीरा होली खेलते हैं.
कवि यश मालवीय ने कवियत्री महादेवी वर्मा और उनके आंगन की होली को याद किया. वह बताते हैं कि महादेवी हर आने जाने वाले की नजर उतारते थे. राई-नमक से उनकी बलाएं हरती थीं. अपने हाथ से गुजिया, पापड़ और भी पकवान खिलाती थीं. जितनी बड़ी कवियत्री थीं, उतनी बड़ी घरैतिन भी थीं, महादेवी वर्मा.
कवि यश मालवीय ने इस वाकये का जिक्र करते हुए कहा, महादेवी वर्मा उनसे इतना स्नेह करती थीं कि उनकी शादी का कार्ड भी उन्होंने ही लिखा था. जब मैंने होली के दिन उनके आंगन में हुड़दंग की तो वह कहकहा लगाकर हंसी और कहने लगीं कि अगर जानते तो क्यों अपनी बिटिया का ब्याह तुमसे कराते. महादेवी वर्मा का आंगन होली के दिन न सिर्फ रंगों से बल्कि बड़े-बड़े कवियों की रंग-बिरंगी कविताओं से भी गुलजार रहता था.
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