ईश्वर तुम शब्द हो कि वाक्य हो?
अर्द्धविराम हो या पूर्णविराम?
संबोधन हो या प्रश्नचिह्न?
न्याय हो या न्यायशास्त्री?
जन्म हो कि मृत्यु
या तुम बीच की उलझन में निरा संभोग हो... हमारे समय के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक लीलाधर जगूड़ी अपनी कविता 'ईश्वर का प्रश्न' में इस तरह के सवालों से दो-चार होते हुए अंततः इन पंक्तियों पर पहुंचते हैं कि-
हे ईश्वर तुम इंद्रियों के आचरण में हो या मन के उच्चारण में?
हे ईश्वर तुम सदियों से यहां क्यों नहीं हो
जहां तुम्हारी सबसे ज्यादा और प्रत्यक्ष जरूरत है.... लीलाधर जगूड़ी की साक्षात्कार आधारित पुस्तक 'प्रश्नब्यूह में प्रज्ञा' उनके कवि, रचनाकार के साथ ही चिंतक रूप को सामने लाती है. पुस्तक बताती है कि अपनी कविताओं से हमेशा यथार्थ को संपूर्णता में ढूंढने वाला एक समर्थ कवि अपने समय की चुनौतियों को लेकर न केवल जागरूक है, बल्कि वह भाषा, साहित्य और समाज को लेकर भी उसकी दृष्टि बहुत व्यापक है.
जगूड़ी अपनी कविताओं में अनुभव के अनेक आयामों के साथ हमेशा चकित करते रहे हैं. इस पुस्तक से भी वे अपने पाठकों में न केवल रोमांच भरते हैं, बल्कि अपने प्रश्नों से उसे विचार की दिशा में ले जाने तक विचलित करते हैं. उनकी कविताओं की तरह ही इन साक्षात्कारों में अपने समय का यथार्थ तो है, पर न तो उसका उत्सव है और न ही विलाप. इनमें यथार्थ की ऐसी आलोचना है, जिसमें हमारे साहित्य और साहित्यकारों के साथ ही समाज और समय के भी नए और अनजाने पहलू भी प्रकट होते चलते हैं. जगूड़ी भाषा और शिल्प के महारथी हैं. जीवन की विविधताओं और अनुभवों ने उन्हें गढ़ा है. उनके लिए जीवन, साहित्य कविता और भाषा में से कोई भी चीज आसान नहीं हैं. उनकी आलोचनात्मक दृष्टि लोकगीतों और मिथकों के मनुष्य से लेकर आज के आर्थिक मनुष्य तक के संकटों से जूझती है और जगूड़ी अपने समय के भौतिक और नैतिक संकटों को कविता में दर्ज करते हैं और सवाल उठाते चलते हैं.
जगूड़ी अपनी कविताओं की तरह ही नए तरह के गद्य का निर्माण कर रहे हैं. उनके लिए कहा जाता है कि वे गद्य में कविता नहीं करते बल्कि कविता के लिए नया गद्य गढ़ते हैं. आप समझ सकते हैं कि ऐसे कवि का गद्य कितना सरस होगा. जगूड़ी कहते हैं, "कहानी तो नाटक में भी होती है पर वह कहानी जैसी नहीं होती. अपनी वर्णनात्मकता के लिए प्रसिद्ध वक्तव्य या निबन्ध, नाटक में भी होते हैं पर उनमें नाट्य तत्त्व गुंथा हुआ होता है. वे वहां नाट्य विधा के अनुरूप ढले हुए होते हैं. कविता में भी गद्य को कविता के लिए ढालना इसलिए चुनौती है क्योंकि 'तुक' को छन्द अब नहीं समझा जाता. आज कविता को गद्य की जिस लय और श्वासानुक्रम की जरूरत है, वही उसका छन्द है. तुलसी ने कविता को 'भाषा निबन्धमतिमंजुलमातनोति' कहा है. अर्थात भाषा को नए ढंग से बांधने का उपक्रम कर रहा हूं. बोली जानेवाली भाषा भी श्वासाधारित है. अतः भाषा बांधना भी हवा बांधने की तरह का ही मुश्किल काम है."
लीलाधर जगूड़ी के समस्त लेखन की यह भी विशेषता है कि वे जीवनानुभव को उसकी समष्टि के साथ स्वीकारते हैं. इनमें सुख, दुःख, आशा, निराशा, व्यथा और घटनाएं आत्मकथा की सदृश सामने आती हैं. जो कवि हमेशा यह कहता हो कि 'कविता का जन्म ही कथा कहने के लिए और भाषा में जीवन नाट्य रचने के लिए हुआ है.' या कि 'कविता जैसी कविता से बचो,' उसे अगर गद्य लिखने का अवसर मिले, तो वह कथा के मोह से बचेगा कैसे? 24 वर्ष की उम्र में उनका पहला कविता संग्रह आ गया था. 1960 से यानी कि 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध से 21वीं सदी के दूसरे दशक में भी उनकी कविता का गद्य समकालीन साहित्य की दुनिया में किसी न किसी नए संस्पर्श के लिए प्रतीक्षित रहता है और पढ़ा जाता है. उनके कविता संग्रहों के प्रायः नए संस्करण आते रहते हैं. कविता संग्रह के नहीं बिकने और नहीं पढ़े जाने वाले बदनाम काल में बिना किसी आत्मप्रचार के लीलाधर जगूड़ी के कविता-संग्रह अपने पाठकों का निर्माण करती चलती हैं.
प्रयोग और प्रगति के पक्षधर लीलाधर जगूड़ी अपने विषय-वस्तु और लेखन को लेकर अद्वितीय हैं. उनके साक्षात्कारों में साहित्य और समाज की गलबहियां बिना किसी को बेचैन किए भी सोचने पर बाध्य करती हैं. अपने काव्य-वैविध्य, भाषिक प्रयोगशीलता के कारण जगूड़ी की कविता हमेशा अपने समय में उपस्थित रही है और उसमें समकालीनता का इतिहास दर्ज होता दिखता है. समय और समकाल, भौतिक और आधिभौतिक, प्रकृति और बाज़ार, मिथक और टेक्नोलाजी, दृश्य और अदृश्य, पृथ्वी और उसमें मौजूद कीड़े तक का अस्तित्व उनकी कविताओं में परस्पर आते-जाते, हस्तक्षेप करते, खलबली मचाते, उलट-पुलट करते एक ऐसे विस्मयकारी लोक की रचना करते हैं, जिसे देखकर आश्चर्य तो यही होता है कि कहां कितने स्तरों पर कैसा जीवन संभव है, उसमें कितने ही आयाम हैं.
जगूड़ी की कविता हो या गद्य उनका लेखन यह बतलाता है कि अनुभवों की ही तरह भाषा भी एक अनंत उपस्थिति है. इसीलिए उनके कविता संग्रहों का शीर्षक देख लीजिए, भाषा का अद्भुत विन्यास यहां दिखता है. 'शंखमुखी शिखरों पर', 'नाटक जारी है', 'इस यात्रा में', 'रात अब भी मौजूद है', 'बची हुई पृथ्वी', 'घबराए हुए शब्द', 'भय भी शक्ति देता है', 'अनुभव के आकाश में चाँद', 'महाकाव्य के बिना', 'ईश्वर की अध्यक्षता में', 'ख़बर का मुँह विज्ञापन से ढका है' और 'जितने लोग उतने प्रेम' जैसे कविता संग्रहों से होते हुए यह यात्रा 'प्रश्नब्यूह में प्रज्ञा' तक और भी मुखरित होती है. कहते हैं कि साठ के बाद की हिंदी कविता में धूमिल के बाद जगूड़ी की रचनाशीलता ने एक नया प्रस्थान और परिवर्तन का बिंदु बनाया था. उनकी कविता आधुनिक समय की जटिलता के बीचोबीच परंपरा की अनुगूंजों, स्मृतियों और स्वप्नों को भी संभव करती चलती है. जगूड़ी की पहचान सबसे पहले अपने समय और परिवेश को पैनी निगाह से देखने वाले कवि के रूप में रही है. उन्होंने गद्य कम लिखा पर उनमें भी काव्य-प्रवाह स्पष्ट परिलक्षित होता है.
अपने समकालीनों से हमेशा सराहे जाने वाले जगूड़ी 83 वर्ष की उम्र में भी सजग हैं. वे कविता के लिए व्यास सम्मान, साहित्य अकादेमी पुरस्कार, पद्मश्री आदि से सम्मानित हैं, पर उनके रास्ते में और भी सम्मान अभी शेष हैं. कभी कुँवर नारायण ने कहा था- "जगूड़ी उन थोड़े से कवियों में हैं, जो धूमिल के साथ हिन्दी कविता के परिदृश्य में आये, पर उनकी कविताएं बिल्कुल अलग ढंग से अपनी पहचान बनाती हैं. यथार्थ के चटक बिम्बों का कल्पनाशील संयोजन उनके रचना-कौशल का एक प्रमुख गुण है. उनमें एक सुपरिचित जीवन दृष्टि का स्थायित्व है. साथ ही नये अनुभवों को कई तरह से प्रस्तुत करने की चेष्टा." केदारनाथ सिंह ने इसे और भी शिद्दत से दर्ज किया था कि- "लीलाधर जगूड़ी की कविताओं की विकास यात्रा को गौर से देखें तो पता चलता है कि उनकी कविता पर हिन्दी आलोचना ने काम नहीं किया है. हालाँकि आलोचना का पूरा परिदृश्य ही ऐसा है कि वहाँ इस दिशा में कोई उल्लेखनीय काम न तो हुआ है, न हो रहा है. काफ़ी अलग और लगातार लिखना जगूड़ी की बड़ी विशेषता है. वे कई मायने में विरल कवि हैं." पर इस बार बात उनके गद्य की. चिंतन, व्यक्तित्व और साक्षात्कारों पर आधारित 'प्रश्नब्यूह में प्रज्ञा' की. प्रश्न, प्रश्नों की रणनीति और प्रज्ञा के परस्पर चिंतन का यह आयाम निश्चित रूप से जगूड़ी के प्रशंसकों, पाठकों के साथ ही हिंदी साहित्य जगत के लिए भी संतोषजनक है.
साहित्य तक के बुक कैफे के 'एक दिन एक किताब' कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश पाण्डेय ने लीलाधर जगूड़ी की इसी महत्त्वपूर्ण पुस्तक 'प्रश्नब्यूह में प्रज्ञा' पर चर्चा की है. वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस साक्षात्कार पुस्तक में कुल 247 पृष्ठ हैं और इस पुस्तक के हार्डबाउंड संस्करण का मूल्य 695 रुपए है.
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# लीलाधर जगूड़ी की पुस्तक 'प्रश्नब्यूह में प्रज्ञा' के प्रकाशक हैं वाणी प्रकाशन. 247 पृष्ठ की इस पुस्तक के हार्डबाउंड संस्करण का मूल्य 695 रुपए है.
जय प्रकाश पाण्डेय