फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की वे 5 ग़ज़लें, जिनके चलते वे आज भी याद किए जाते हैं

हमारे दौर के मशहूर नगमानिगार फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एक बेमिसाल शायर थे. उनकी शायरी में अहसास, बदलाव, प्रेम और सुकुन सबकुछ था. साहित्य आजतक के पाठकों के लिए उनकी 5 कभी न भूलने वाली ग़ज़लें

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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (फेस बुक से साभार) फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (फेस बुक से साभार)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 13 फरवरी 2019,
  • अपडेटेड 11:58 AM IST

हमारे दौर के मशहूर नगमानिगार फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एक बेमिसाल शायर थे. उनकी शायरी में अहसास, बदलाव, प्रेम और सुकुन सब कुछ था. साहित्य आजतक के पाठकों के लिए उनकी 5 कभी न भूलने वाली ग़ज़लें-

ग़ज़ल

1.

आप की याद आती रही रात भर'

चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर

गाह जलती हुई गाह बुझती हुई

शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर

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कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन

कोई तस्वीर गाती रही रात भर

फिर सबा साया-ए-शाख़-ए-गुल के तले

कोई क़िस्सा सुनाती रही रात भर

जो न आया उसे कोई ज़ंजीर-ए-दर

हर सदा पर बुलाती रही रात भर

एक उम्मीद से दिल बहलता रहा

इक तमन्ना सताती रही रात भर

2.

क़र्ज़-ए-निगाह-ए-यार अदा कर चुके हैं हम

सब कुछ निसार-ए-राह-ए-वफ़ा कर चुके हैं हम

कुछ इम्तिहान-ए-दस्त-ए-जफ़ा कर चुके हैं हम

कुछ उन की दस्तरस का पता कर चुके हैं हम

अब एहतियात की कोई सूरत नहीं रही

क़ातिल से रस्म-ओ-राह सिवा कर चुके हैं हम

देखें है कौन कौन ज़रूरत नहीं रही

कू-ए-सितम में सब को ख़फ़ा कर चुके हैं हम

अब अपना इख़्तियार है चाहे जहाँ चलें

रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम

उन की नज़र में क्या करें फीका है अब भी रंग

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जितना लहू था सर्फ़-ए-क़बा कर चुके हैं हम

कुछ अपने दिल की ख़ू का भी शुक्राना चाहिए

सौ बार उन की ख़ू का गिला कर चुके हैं हम

3.

कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी

सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी

कब जान लहू होगी कब अश्क गुहर होगा

किस दिन तिरी सुनवाई ऐ दीदा-ए-तर होगी

कब महकेगी फ़स्ल-ए-गुल कब बहकेगा मय-ख़ाना

कब सुब्ह-ए-सुख़न होगी कब शाम-ए-नज़र होगी

वाइ'ज़ है न ज़ाहिद है नासेह है न क़ातिल है

अब शहर में यारों की किस तरह बसर होगी

कब तक अभी रह देखें ऐ क़ामत-ए-जानाना

कब हश्र मुअ'य्यन है तुझ को तो ख़बर होगी

4.

तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं

किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं

हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैं

तो हर हरीम में गेसू सँवरने लगते हैं

हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है

जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं

सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन

तो चश्म-ए-सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं

वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ ओ लब की बख़िया-गरी

फ़ज़ा में और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं

दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती है

तो 'फ़ैज़' दिल में सितारे उतरने लगते हैं

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5.

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही

नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

न तन में ख़ून फ़राहम न अश्क आँखों में

नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब है बे-वज़ू ही सही

किसी तरह तो जमे बज़्म मय-कदे वालो

नहीं जो बादा-ओ-साग़र तो हाव-हू ही सही

गर इंतिज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल

किसी के वादा-ए-फ़र्दा की गुफ़्तुगू ही सही

दयार-ए-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोई

तो 'फ़ैज़' ज़िक्र-ए-वतन अपने रू-ब-रू ही सही.   ( रेख़्ता से साभार)

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