यही तो इश्क हैः पंकज सुबीर के नए ग़ज़ल संकलन में है सलाहियत का सलीका

हिंदी में ग़ज़ल की दुनिया दिनोंदिन परवान चढ़ रही है. यह पाठ्यक्रम में भी पढ़ाई जाने लगी है. हिंदुस्तानी जबान के साथ इन ग़ज़लों को पढ़ने का अपना आनंद पंकज सुबीर की ग़ज़लों पर एक नजर.

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पंकज सुबीर के ग़ज़ल संकलन 'यही तो इश्क है' का आवरण-चित्र पंकज सुबीर के ग़ज़ल संकलन 'यही तो इश्क है' का आवरण-चित्र

ओम निश्चल

  • नई दिल्ली,
  • 06 जुलाई 2021,
  • अपडेटेड 6:23 PM IST

'आने वाले कल की ये तैयारी है
शहर जले हैं अब कुछ की बारी है
कल इसकी लपटों में झुलसेंगे हम सब
मत सोचो ये छोटी सी चिंगारी है.
                     -पंकज सुबीर

मैं जानता था यह शख्स सिर्फ किस्से-कहानियों का नहीं है, यह गीतों और ग़ज़लों में भी उतनी ही आमदरफ्त रखता है. गद्य के किसी भी सांचे में इसका हाथ रवां है. कल तक यह शख्स अपनी पुस्तकों के लिए दूसरे प्रकाशकों पर निर्भर रहता था पर देखते ही देखते इसने मध्यप्रदेश के सीहोर कस्बे को प्रकाशन का एक केंद्र बना दिया. पंकज सुबीर के इस फन को सींचने में सिद्ध प्रवासी कथाकार सुधा ओम ढींगरा ने भरपूर सहयोग दिया. ईस्ट इंडिया कंपनी, गांधी एट यरवदा और महुआ घटवारिन और अन्य कहानियों से चर्चा में आए सुबीर ने 'अकाल में उत्सव' जैसा उपन्यास लिखा तो संजीव जैसे कथाकार के कथाशिल्प की याद ताजा हो आई.

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कहानियों और अपने औपन्यासिक लेखन के लिए कितने ही इनाम इकराम बटोरने वाला यह शख्स इतना सरल भी नहीं, बल्कि इसकी पेचीदा सरसता के भीतर अनेक घातों प्रतिघातों के निशानात भी हैं. लेकिन पंकज सुबीर ने कभी अपने दुख को परचम की तरह नहीं लहराया. उन पर तंज भी किए गए पर उन्होंने अपनी भलमनसाहत नहीं छोड़ी. बड़े प्रकाशकों की चिरौरी मिन्नत करने के बदले अपने ही जोखिम पर प्रकाशन खोल कर न केवल अपनी कृतियों का बल्कि दूसरे तमाम बड़े लेखकों की कृतियों का पथ-प्रशस्त किया तथा सीहोर में बैठे-बैठे शानदार पुस्तकों के प्रकाशन का रास्ता तैयार किया.

वे किस्सागो हैं और अपने ढंग की कहानियों के उस्ताद माने जाते हैं. औरों की तरह उनकी भी प्रतिभा को कथाकार रवींद्र कालिया और राजेंद्र यादव जैसे कथाकारों ने संवारा-सहेजा और कहानियों की दुनिया में एक नामचीन पहचान दिलाई. जब उन्होंने ख्यात व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ का ग़ज़ल संग्रह छापा तो कहीं न कहीं उनके भीतर एक शायर की मौजूदगी के कारण भी यह संभव हुआ. जब हाल ही में प्रकाशित उनका ग़ज़ल संग्रह सुधा ओम ढींगरा के एक बेहतरीन उपन्यास के साथ सामने आया तो उसे देखते ही मेरा शक यकीन में बदल गया. पंकज अब सिर्फ किस्सागो नहीं, एक शायर भी हैं. वह भी दुरुस्त काफिये रदीफ की बंदिशों को कामयाबी से साध लेने का हुनर रखने वाले हैं. उनकी ग़ज़लों का संग्रह पलटा तो पलटता ही रहा जब तक कि वह खत्म नहीं हो गया. पंकज के भीतर कविता और शायरी की ऐसी दुनिया मौजूद है यह देख कर चित्त प्रसन्न था. एक से बढ़ कर एक ग़ज़लें.
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यही तो इश्क है
'यही तो इश्क़ है' ऐसा संग्रह है जिसे कोरोना के भय से मुक्त होकर लिफाफा खोल कर देखा तो देर तक देखता-निहारता रहा. इतना सुंदर प्रोडक्शन जैसे किसी ने नोक पलक संवार कर उसे उपहार सदृश भेंट किया हो. ऐसा नहीं कि एक बार देखने के बाद मन भर गया हो. उसे बार-बार हाथ में लेकर उसके पन्ने पलट कर देखता रहा और मन ही मन जायज़ा लेता रहा कि इस वक्त आई शायरों की बाढ़ में सुबीर ने ग़ज़लों से कैसा सुलूक किया है. लगा कि इसे जितनी बार देखो इसका नयापन बरकरार रहने वाला है. बतर्ज विज्ञानव्रत: तुमसे जितनी बार मिला हूं. पहली पहली बार मिला हूं. पहले लगा कि संग्रह का नाम 'यही तो इश्क़ है' कुछ इश्कपरस्त लगता है पर भीतर झांकने पर पाया कि इश्क़ है तो यहां 'धूप दीप नैवेद्य' की तरह किन्तु ये ग़ज़लें ज़दीद शायरी का एक नमूना भी हैं. इनमें भीतर आज के समय का चेहरा दिखता है. यहां तंज है, तल्खी है, व्यं‍ग्य़ है, विट है, मलाल है, क्षोभ है, दुख है, संत्रास है, जीवन जीने का अहसास है और इश्क का भीगा-भीगा पर्यावरण भी जिसके बिना शायरी कुछ फीकी-फीकी सी लगती है.

लिहाजा पंकज सुबीर की शायरी एक सिद्ध शायर के पैग़ाम जैसी लगती है. इश्क की पारिभाषिकी के लिए ही कभी ग़ज़ल जैसी सिन्फ सामने आई थी. क्या है इश्क? यह एक शाश्वत सवाल है. हर आने वाली पीढ़ी अपने आइने में इसका हल ढूंढ़ती है. वे लिखते हैं-
नहीं सोया है तू कल से, यही तो इश्क़ है
ज़माना सोए तू जागे, यही तो इश्क़ है

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तू उसको भूलना चाहे मगर हर बार बस
अलावा उसके सब भूले यही तो इश्क है

इश्क पर एक ग़ज़ल का यह शेर भी मानीखेज़ है-

इश्क में दरिया पार नहीं उतरा जाता
इश्क में दरिया का रुख मोड़ा करते हैं

ग़ज़ल अपने सुंदर मतले से पहचानी जाती है. देखता हूं कि पंकज के यहां एक से एक बेहतरीन उन्वान हैं ग़ज़लों के. मैंने विट की बात की थी. पंकज की एक ग़ज़ल में यह विट देखें-
जवानी को यूं ही खाली बिताना भी समस्या है
लगा लो दिल अगर तो दिल लगाना भी समस्या है

हैं किस्से बन गए कितने ज़रा से मुस्कराने पर
तुम्हारे शहर में तो मुस्कुराना भी समस्या है

यानी जिसे हिंदुस्तानी जबान में हिंदी ग़ज़ल कहने का चलन है, उस पायदार और मेयार पर सुबीर की ये ग़ज़लें स्वयंसिद्ध हैं. इनमें बोलचाल वाला लहजा है, मुहावरेबाजी है, जिन्दगी के अवसर हैं, अनुभवों की तल्ख सचाइयां और प्रेम की झीनी-झीनी खुशबू भी है. लफ़्ज ऐसे कि कहीं भी कोश या अर्थ देखने की जहमत न उठानी पड़े.  
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सलाहियत का सलीका
पंकज की ग़ज़लें सलाहियत का सलीका भी रखती हैं. यो तो हर शायर कवि पग-पग पर अपने अनुभवों के बीज बिखेरता चलता है. पंकज ने यह सलीका अपनी ग़ज़लों में बरकरार रखा है. किसी सुभाषित, किसी सूक्त, किसी मंत्र की तरह. तभी तो कवि सदियों से एक बेहतर दुनिया रचने को अपना लक्ष्य मानता रहा है. देखें पंकज सुबीर क्या कहते हैं-
कोई रिश्ता बनाओ तो निभाना भी जरा सीखो
कभी तो दूसरों के काम आना भी ज़रा सीखो

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तुम्हारे सर पे ही इल्जाम आएगा अंधेरों का
बुझाए दीप हैं तो अब जलाना भी ज़रा सीखो

'इश्क़' जब शीर्षक में ही झिलमिला रहा है तो इश्क पर बात न हो तो अचरज सा लगेगा. इश्क़ के छींटें यों तो तमाम ग़ज़लों पर पड़े हैं. पर कुछ उदाहरण देखिए-

उसके चेहरे पर जब इक हंसी खिल उठी
हमको ऐसा लगा जिन्दगी खिल उठी

थी उदासी में डूबी हुई कल तलक
बादलों ने छुआ तो नदी खिल उठी (पृष्ठ- 42)

बड़ी गहरी उदासी छा रही है
न जाने याद किसकी आ रही है

है राहत हिज्र की इस दोपहर में
कोई कोयल कहीं जो गा रही है

कैसे वे एक बड़ी बात एक ग़ज़ल के कुछ ही शेर में सहेज लेते हैं, यह उनकी ग़ज़ल़ें बताती हैं.

है मगर तुम पर मुझे इतना भरोसा भी नहीं
तुम अगर क़ातिल नहीं हो तो मसीहा भी नहीं

खैर मैं जैसा भी हूं हंस के गले मिलता तो हूं
माफ़ करना आपको इतना सलीका भी नहीं (पृष्‍ठ- 56)

इस दौर के तल्ख अहसासात भी उनकी ग़ज़लों में दिखते हैं. कैसा यह लोकतंत्र है. कैसी जनता है. कैसी सरकार. कैसी व्यवस्था. कैसे लोग. कैसा भेड़िया धसान? पंकज इसे अपनी ग़ज़लों में लाने की पूरी चेष्टा करते हैं.
गूंगी बहरी अंधी जनता
कायर और निकम्मी जनता
लोकतंत्र का मतलब है ये
जिसकी लाठी उसकी जनता

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सियासत के इस दौर पर भी उन्होंने कलम चलाई है-
कुछ का मंहगा कुछ का सस्ता बिकता है
आखिर में तो ईमां सबका बिकता है

बाजे बैंड बराती शहनाई घोड़ी
कितने तामझाम से बेटा बिकता है

ये सुबीर संसद है अपने भारत की
इस मंडी में आकर नेता बिकता है (पृष्ठ- 78)

आपके भाषण सुनेंगे कब तलक हम कब तलक
अब ये जनता थक चुकी है कीजिए कुछ कीजिए

आपने बादल समंदर ताल नदियां बेच दीं
आग अब घर में लगी है कीजिए कुछ कीजिए
***

गांवों की बदहाली
शहर आबाद होते गए तो गांवों की दुर्दशा होती गयी. वहां लहलहाती हुई फसलें तो दिखती हैं पर गांव के गांव खाली हो रहे हैं. कोई जमीनें जोतने बोने वाला नहीं है. अक्सर घरों में बूढ़ी माएं अपने बच्चों की बाट जोहती दरवाजे पर बैठी रहती हैं. इस गांव को भी पंकज सुबीर ने समझा है. एक ऐसी ही ग़ज़ल के चंद अशआर देखें-

इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गांव में
इसलिए पुरवाई चलती है अभी तक गांव में

शहर में रहते हैं बेटे कोठियों में और यहां
बूढ़ी मां छप्पर में बैठी है अभी तक गांव में

उसकी खुशियां भी हैं छोटी और छोटे ही हैं ग़म
ज़िन्दगी मासूम बच्ची है अभी तक गांव में  

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अब न घर अपना वहां और अब ज़मीनें भी नहीं
हां मगर पुरखों की मिट्टी है अभी तक गांव में

ग़ज़ल में पंकज का चेहरा बहुत ही पाक साफ दिखता है. यह जैसे उनकी मासूमियत का दर्पण हो. आज ग़ज़ल का हर तरफ बोलबाला है. हिंदी ग़ज़ल के पाठ्यक्रम बन रहे हैं. उसने यथार्थ की बारीकियों के साथ समय की पीठ पर निशान दर्ज किए हैं. पंकज ने छोटी बड़ी दोनों तरह की बहर ग़ज़लों में आजमाई है और उन्हें कहने में कामयाबी पाई है. एक संयम और सामर्थ्य  यह भी कि उनकी हर ग़ज़ल यहां लगभग सात सात अशआर की हैं. यानी काफिये रदीफ पर मास्टरी इस कदर कि कोई भी शेर एक दूसरे से उन्नीस न हो. अब तक कहानी उपन्यास यात्रा संस्मरण और संपादन में बेहतरीन मुकाम हासिल करने वाले पंकज शायरी में उतरे हैं तो भी जैसे पूरी तरह डूब कर. बोलचाल की जबान में रवां पंकज की ये ग़ज़लें अपने कथ्य में नहीं, अंदाजेबयां में भी उम्दा हैं तथा एक ग़ज़ल पढ़ते हुए दूसरी पढ़ने की ललक पैदा करती हैं.
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पुस्तकः यही तो इश्क है
रचनाकार: पंकज सुबीर
विधाः ग़ज़ल संग्रह
भाषाः हिंदी
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सीहोर, मध्य प्रदेश पृष्ठ संख्याः 120
मूल्यः 100 रुपए

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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

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