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Valentine Week 2021: 40 साल के जिन्ना और 16 साल की गैर-मुस्लिम लड़की की दुखद प्रेम कहानी

aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 10 फरवरी 2021,
  • अपडेटेड 8:48 AM IST
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फरवरी को प्यार का महीना कहा जाता है. इस वैलेंटाइंस वीक में अगर प्रेम और प्रेम कहानियों पर बात ना हो तो बेकार है. कुछ प्रेम कहानियों का अंत सुखद होता है तो कुछ का दुखद लेकिन प्रेम करने वालों के लिए ये मायने नहीं रखता. पाकिस्तान के कायद-ए-आजम मोहम्मद अली जिन्ना और एक पारसी लड़की रतन बाई की प्रेम कहानी भी कुछ ऐसी ही है. पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना विभाजन के अलावा, अपनी लव स्टोरी और शादीशुदा जिंदगी में भी कैसे विलेन बन गए, उन्हें खुद इस बात का अंदाजा नहीं हुआ.

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साल 1892 में 15 साल की उम्र में जिन्ना की पहली शादी इमीबाई से हुई थी. उस समय इमीबाई की उम्र 14 साल की थी. शादी के एक साल बाद तक जिन्ना अपनी पढ़ाई और पिता के बिजनेस में व्यस्त रहे. फिर इसके बाद वो इंग्लैंड चले गए जहां वो 1896 तक रहे. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी दौरान कॉलरा से इमीबाई का निधन हो गया. इमीबाई के निधन के बाद जिन्ना के पिता ने उन्हें दूसरी शादी करने की सलाह दी लेकिन जिन्ना ने इससे इनकार कर दिया.  

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इसके बाद जिन्ना ने खुद को राजनीति में व्यस्त कर लिया. कुछ सालों बाद जिन्ना की मुलाकात एक युवा पारसी लड़की से हुई जिसका नाम रतनबाई पेटिट था. रतनबाई को रती के नाम से भी जाना जाता था. 16 साल की रती बॉम्बे के सबसे धनी व्यक्ति की इकलौती बेटी थीं. जिन्ना रती के पिता के दोस्त थे और उनसे मिलने अक्सर ही उनके घर जाते थे. जिन्ना की उम्र रती के पिता से सिर्फ तीन साल ही कम थी. रती बहुत अलहदा थीं. अपनी उम्र के दोस्तों के साथ घूमने के बजाय उन्हें किताबें पढ़ना, घर में आने वाले मेहमानों से मिलना और राजनीति के बारे में बात करना बहुत पसंद था. रती हर मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखती थीं.  

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बुद्धिमान और शिष्टाचारी के अलावा, रती बेहद खूबसूरत भी थीं. जो भी उनसे मिलता था, उनकी सुंदरता पर मोहित हो जाता था. 1916 में जिन्ना ने गर्मियों की छुट्टियों के दो महीने दार्जिलिंग के पेटिट समर निवास में बिताए. यहीं पर रती और जिन्ना के बीच प्यार की शुरूआत हुई. रती जिन्ना को प्यार से जे. बुलाती थीं. जिन्ना की रोमांटिक कविताएं और कहानियां रती को बहुत पसंद आती थीं. वहीं, जिन्ना को रती की खूबसूरती और बुद्धिमानी पसंद थी. रती से मिलने के बाद 40 वर्षीय जिन्ना शायद एक बार फिर अपनी गृहस्थी बसाने के लिए बेताब हो उठे थे.  

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छुट्टियों से लौटने के बाद, जिन्ना ने रती के पिता सर दिनशॉ से रती के साथ शादी करने की इजाजत मांगी. सर दिनशॉ जिन्ना के प्रस्ताव से आगबबूला हो गए और उन्होंने जिन्ना को वहां से तुरंत निकलने के लिए कह दिया. इसके बाद भी रती जिन्ना से हमेशा संपर्क में रहीं. इस बीच सर दिनशॉ ने नाबालिग होने की शर्त पर कोर्ट से ये ऑर्डर हासिल कर लिया कि जिन्ना रती से किसी भी तरह का संबंध नहीं रख सकते. बगावती रती कोर्ट के इस ऑर्डर को मानना नहीं चाहती थीं और जिन्ना से मुलाकात जारी रखना चाहती थीं लेकिन जिन्ना इसके लिए तैयार नहीं थे. जिन्ना ने 18 महीने तक रती से कोई संपर्क नहीं रखा.  

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20 फरवरी 1918 को रती 18 साल की हो गईं. बालिग होने के साथ ही कोर्ट का आदेश उनके लिए अमान्य हो गया. इसके बाद रती और जिन्ना की मुलाकातों का सिलसिला एक बार फिर शुरू हो गया. दोनों भविष्य की योजनाएं बनाने लगे. 18 अप्रैल को रती ने अपना घर छोड़ दिया और जिन्ना के साथ जामिया मस्जिद गईं. यहां उन्होंने मौलाना नजफी के सामने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया और अगले दिन ही जिन्ना से निकाह कर लिया. रती के पारसी धर्म छोड़ इस्लाम कबूल करने को लेकर पूरे देश में काफी हंगामा हुआ.  

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उस समय की रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिन्ना और रती की शादीशुदा जिंदगी परियों की कहानी की तरह थी. जो भी उन्हें जानता था वो यही कहता था कि दोनों एक-दूसरे को कितना प्यार करते हैं. शादी के बाद जिन्ना ने उस क्लब की सदस्यता छोड़ दी जहां वो हर शाम शतरंज और बिलियर्ड्स खेलने जाते थे. अब वो काम के बाद सीधा घर आते थे और बगीचे में अपनी पत्नी के साथ बातें करते हुए पूरी शाम गुजारते थे.   

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रती को महंगे कपड़े खरीदने और घर सजाने का बहुत शौक था. जिन्ना फालतू के खर्च नहीं करते थे लेकिन वो रती के ये सारे खर्चे खुशी-खुशी उठाते थे. रती अकेली ऐसी महिला थीं जिनके लिए जिन्ना के दिल में प्यार के जज्बात उमड़े थे. जिन्ना जहां भी जाते थे, रती उनके साथ जाती थीं. वो पूरी तरह से जिन्ना की राजनीति से जुड़ चुकी थीं. कई लोगों का कहना था कि रती के उग्र राष्ट्रवाद ने ही जिन्ना को एक क्रांतिकारी के रूप में बदल दिया था.   

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14 अगस्त, 1919 की रात को जिन्ना और रती की बेटी दीना ने जन्म लिया. संयोग की बात ये है कि 28 साल बाद इसी तारीख पर पाकिस्तान का भी जन्म हुआ. बेटी के जन्म के बाद जिन्ना और रती का प्यार पहले की तरह नहीं रहा. 1921 की शुरूआत में उनकी शादी में दिक्कतें आनी शुरू हो गईं. जनवरी 1921 में 'ऑल इंडिया कांग्रेस' और मुस्लिम लीग ने नागपुर में एक वार्षिक संयुक्त सत्र का आयोजन किया गया था. इस आयोजन से अलग रखे जाने की वजह से जिन्ना परेशान हो गए.   

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राजनीति में एक वक्त ऐसा भी आया जब हिंदू और मुसलमान दोनों ने जिन्ना को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया. इन सब बातों की वजह से जिन्ना अक्सर निराश और नाराज रहते थे जिसका असर उनकी शादीशुदा जिंदगी पर भी पड़ने लगा. रती के साथ उनकी अक्सर बहस हो जाती थी. राजनीति से जिन्ना की दूरी का असर रती की जिंदगी पर भी पड़ रहा था. रती को लोगों से मिलना-जुलना पसंद था लेकिन जिन्ना अकेले रहना चाहते थे. जैसे-जैसे समय बीतता गया, उनके बीच उम्र के मतभेद और बढ़ते गए. रती हमेशा दुखी और परेशान रहने लगीं.  

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दिसंबर 1927 में, रती मुस्लिम लीग के कलकत्ता अधिवेशन में जिन्ना के साथ गईं लेकिन जब वो जनवरी में वापस लौटे तो घर जाने की बजाय रती ताज होटल में चली गईं. इसके पीछे क्या कारण था, ये स्पष्ट रूप से कोई नहीं जानता था. उस समय जिन्ना के एक दोस्त ने उन्हें समझाने की कोशिश की थी लेकिन उन्होंने इसे निजी मामला बताते हुए बात करने से इनकार कर दिया. जिन्ना और रती के बीच ये गतिरोध जारी रहा.   

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जिन्ना अपने राजनीतिक जीवन में बेहद व्यस्त हो गए और उधर रती की सेहत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी. अप्रैल 1928 में रती अपने इलाज के लिए मां के साथ पैरिस गईं. वहां वो इलाज के दौरान कोमा में चली गईं. जिन्ना उस समय डबलिन के दौरे पर थे. उन्हें जब ये खबर मिली तो वो सब कुछ छोड़ कर पेरिस चले गए और वहां रती की पूरी देखभाल की. एक महीने तक जिन्ना ने पूरा समय रती के साथ बिताया और कई डॉक्टरों से उनका इलाज करवाया. हालांकि, रती की बीमारी सही से किसी डॉक्टर को समझ नहीं आ रही थी. कोई नर्वस सिस्टम की तो कोई  कोलाइटिस की समस्या बता रहा था.  

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इस समय जिन्ना की भी सेहत कुछ खराब रहने लगी. वहीं आराम के बाद रती धीरे-धीरे बेहतर होने लगी थीं. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके कॉमन फ्रेंड चिमनलाल ने पैरिस में दोनों को इस समय खुश देखा था और वो साथ में कनाडा जाने वाले थे. चिमनलाल कुछ समय के लिए पैरिस से बाहर चले गए लेकिन जब वो वापस लौटे तो उन्होंने जिन्ना को अकेला पाया. जिन्ना ने उन्हें बताया कि उनका रती से झगड़ा हुआ था और रती उन्हें छोड़कर बॉम्बे चली गई. बॉम्बे आने के बाद रती ताज होटल में गईं और फिर से बीमार पड़ गईं. कुछ दिनों बाद जिन्ना भी पैरिस से लौट आए पर अब वो साथ नहीं रहते थे. हालांकि, जब भी वो बॉम्बे में होते थे, रती से मिलने जाते थे.  

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28 जनवरी 1929 को जिन्ना विधानसभा के बजट सत्र में भाग लेने के लिए दिल्ली रवाना हुए. 18 फरवरी को रती फिर कोमा में चली गईं, लेकिन इस बार वो इससे बाहर नहीं आ सकीं. 20 फरवरी, 1929 को रती का निधन हो गया, इसी दिन उनका 29वां जन्मदिन था. जिन्ना को ये खबर उनके ससुर ने टेलीफोन पर दी. जिन्ना 22 फरवरी की सुबह बॉम्बे पहुंचे. कर्नल सोखी और उनकी पत्नी जिन्ना को स्टेशन पर लेने आए.   

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जिन्ना के सचिव रहे और बाद में भारत के विदेश मंत्री बने मोहम्मद करीम छागला अपनी आत्मकथा 'रोजेज इन दिसंबर' में लिखा है कि रती के शव को जब कब्र में दफनाने के लिए रखा गया तो जिन्ना से शव पर पहली मिट्टी डालने को कहा गया. कब्र पर मिट्टी डालते ही वो जोर-जोर से रोने लगे. बहुत देर तक रोने के बाद उन्होंने खुद अपने आंसू पोछे और कार की तरफ चले गए. अगले दिन रती के सबसे करीबी दोस्त दवारकदास जिन्ना से मिलने गए. जिन्ना उनके सामने भी फूट-फूटकर रोए. जिन्ना रती की मौत के लिए खुद को दोषी मान रहे थे. उनका कहना था कि वो अपना रिश्ता निभाने में असफल रहे और वो इससे कभी उबर नहीं पाएंगे.

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जिन्ना और रती की कहानी इस बात का बेहतर उदाहरण है कि दो लोगों को एक साथ रखने के लिए सिर्फ प्यार काफी नहीं होता है. हालांकि, परिस्थितियां कैसी भी रहीं हों, दोनों ने कभी एक-दूसरे को प्यार करना कम नहीं किया.

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