Natural Cooling Tips: गर्मी ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं और कई राज्यों में सुबह से ही तेज गर्मी पड़ने लगी है. जैसे-जैसे पारा बढ़ रहा है, वैसे-वैसे लोगों के घरों में भी गर्मी बढ़ने लगी है. कई बार उमस इतनी तेज हो जाती है कि घरों के एसी और कूलर भी जवाब देने लगते हैं. अब ऐसे में भारत की एक प्राचीन इंजीनियरिंग तकनीक 'टेराकोटा कूलिंग' वरदान साबित हो सकती है. साइंटिफिक अमेरिकन मैग्जीन में पब्लिश हुई रिसर्च के मुताबिक, यह तकनीक 3000 वर्ष से भी अधिक पुरानी है, जिसकी जड़ें कांस्य युग की सिंधु घाटी सभ्यता तक जाती हैं.
बताया जाता है कि उस काल में टेराकोटा के बर्तनों का उपयोग पानी इकट्ठा करने के लिए किया जाता था और यह प्रथा आज भी कई ग्रामीण घरों में जारी है. इससे बिजली पर निर्भर हुए बिना प्राकृतिक रूप से पानी को ठंडा करते हैं. यह तकनीक घर के तापमान को बाहर के मुकाबले कई बार 50 प्रतिशत तक की कमी देखी गई है. यह तकनीक क्या है और कैसे काम करती है, इस बारे में जान लीजिए ताकि आने वाले समय में आप भी इस प्राकृतिक तरीके से अपने घर को ठंडा रख सकें.
टेराकोटा, मिट्टी से बने बर्तनों की एक केटेगरी होती है जिसे प्राकृतिक मिट्टी से तैयार किया जाता है. इसे बनाने के लिए मिट्टी को सांचे में ढालकर फिर अपेक्षाकृत कम तापमान पर पकाकर सख्त किया जाता है. इसका नाम इतालवी भाषा से आया है और इसका अर्थ है पकी हुई मिट्टी, जो इसे बनाने की प्रक्रिया को दर्शाता है.
टेराकोटा का रंग आमतौर पर लाल या भूरा होता है जो मिट्टी में मौजूद लोहे के कारण होता है.
इसकी खासियत इसकी बारीक-बारीक छेद वाली बनावट है यानी कि यह नमी को अवशोषित कर सकती है और धीरे-धीरे छोड़ सकती है. इसी गुण के कारण टेराकोटा का उपयोग गर्मी में पानी रखने के लिए भी किया जाता है जो उसे प्राकृतिक रूप से ठंडा रखती है.
जब बाहर पारा 45 डिग्री पार करता है तो घर में सबसे अधिक गर्माहट घर की छत से आती है. टेराकोटा कूलिंग तकनीक में छत ढालते समय कंक्रीट के बीच मिट्टी के खाली घड़ों को उल्टा करके रखा जाता है. जब छत पूरी तरह तैयार हो जाती है तो ये घड़े स्लैब के अंदर एक 'हलो स्पेस' यानी खाली जगह बना देते हैं. यह खाली जगह इंसुलेशन का काम करती है जो सूरज की तपिश को नीचे कमरों तक पहुंचने से पहले ही रोक देती है.
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट आदित्य प्रद्युम्न के अनुसार, टेराकोटा या मिट्टी की तासीर ही इसकी सबसे बड़ी खूबी है. मिट्टी में बेहद सूक्ष्म छेद होते हैं. जब इन घड़ों के संपर्क में नमी आती है तो वह धीरे-धीरे सतह पर पहुंचती है. जैसे ही यह नमी वाष्पित होती है, यह आसपास की गर्मी को सोख लेती है. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे हमारे शरीर को ठंडा रखने के लिए पसीना निकलता है.
आधुनिक आर्किटेक्ट अब बड़े ऑफिसों और घरों के डिजाइन में इस पारंपरिक तरीके को जगह दे रहे हैं. रिसर्च कहती हैं कि यह तकनीक गर्मी को 50 प्रतिशत तक कम करने की क्षमता रखती है.
जहां एक तरफ एसी चलाने से बाहर का माहौल गर्म हो जाता है, वहीं टेराकोटा कूलिंग तकनीक आसपास के माहौल को भी सही रखती है. इसे पैसिव कूलिंग कहते हैं. कम खर्च और जीरो कार्बन पैदा करने के कारण यह मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए अच्छा ऑपशंस है.
वैज्ञानिकों का मानना है कि जंगल की जगह कंक्रीट की रोड बन गई हैं. अब ऐसे में शहरों को बचाने के लिए हमें अपनी मूल जड़ की ओर लौटना होगा. यह प्राचीन भारतीय तकनीक बताती है कि हमारे पूर्वजों के पास बिना किसी आधुनिक मशीनरी के भी वो प्रकृति के साथ तालमेल बिठा लेते थे.
यदि इसे बड़े पैमाने पर अपनाया जाए, तो हम न केवल बिजली बचा पाएंगे, बल्कि धरती के बढ़ते तापमान को रोकने में भी अपना योगदान दे सकेंगे. अब समय आ गया है कि हम फ्रिज और एसी के बजाय इन प्राकृतिक तरीकों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं.
आजतक लाइफस्टाइल डेस्क