History of Nalli Nihari: पुरानी दिल्ली की तंग गलियां और मसालों की वो खास खुशबू, जो किसी को भी अपनी ओर खींच ले. अगर आप फूडी हैं, तो आपने 'नल्ली निहारी' का नाम जरूर सुना होगा. यह सिर्फ एक डिश नहीं, बल्कि मुगलों के दौर से चली आ रही एक विरासत है. सुबह की पहली किरण के साथ जब जामा मस्जिद के पास देग खुलती है, तो उसकी महक बता देती है कि नल्ली निहारी तैयार है. 300 साल पुरानी यह शाही रेसिपी कभी राजा-महाराजाओं के नाश्ते की मेज की शोभा बढ़ाती थी, लेकिन आज यह आम लोगों की थाली तक पहुंच चुकी है. तो आइए जानते हैं, ये डिश आम लोगों तक कैसे पहुंची और इसे बनाने की विधि क्या है?
निहारी धीमी आंच पर घंटों पकाई जानी वाली डिश है जबकि नल्ली निहारी में हड्डी समेत मांस को पकाया जाता है जिससे स्वाद अधिक आता है.
'द हिंदू' के फूड कॉलम और फूड हिस्टोरियन के.टी. अचार्या के मुताबिक, नरम नल्ली और मसालेदार ग्रेवी वाली नल्ली निहारी की खासियत इसके पकने का तरीका है क्योंकि इसे बनाने के लिए काफी सारे मसालों का इस्तेमाल होता है. इसे बनाने के लिए मांस के हड्डी वाले हिस्से (Shank) का इस्तेमाल होता है जिसे घंटों तक या फिर रात भर धीमी आंच पर गलने के लिए छोड़ दिया जाता है.
इस डिश का इसली स्वाद 'नल्ली' यानी बोन मैरो में होता है. पकाने के दौरान हड्डियों का जो अर्क (तेल) निकलता है, वही इस ग्रेवी को वह मखमली बनावट और गाढ़ापन देता है.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि निहारी शब्द अरबी के 'नहार' (Nahar) से निकला है, जिसका अर्थ होता है 'सुबह'. इतिहासकारों और फूड एक्सपर्ट्स के मुताबिक, निहारी की शुरुआत 18वीं शताब्दी के अंत में मुगल काल के दौरान पुरानी दिल्ली (शाहजहांनाबाद) में हुई थी. नमाज के बाद लोग इसका सेवन करते थे ताकि वो दिनभर एनर्जेटिक महसूस करते थे. लेकिन जैसे-जैसे इसकी ताकत और स्वाद के चर्चे होना शुरू हुए, वैसे-वैसे मजदूरों और सिपाहियों ने भी इसे खाना शुरू कर दिया.
ये प्रोटीन से भरपूर थी जो शरीर को काफी एनर्जी देती थी. इसे खाने के बाद काफी देर तक भूख नहीं लगती थी.
निहारी की उत्पत्ति को लेकर बहस तेज हो जाती है, क्योंकि दिल्ली और लखनऊ दोनों के ही कुछ लोग इसे सबसे बेहतरीन व्यंजन मानने को होड़ में लगे रहते हैं. राइटर अनुथी विशा के अनुसार, काली मिर्च और इतिहास से भरपूर यह व्यंजन सबसे पहले शाहजहानाबाद (पुरानी दिल्ली) की गलियों में यमुना के ठंडे पानी से होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए बनाया जाता था.
वहीं, लखनऊ की गलियों में प्रचलित कहानी कहती है कि निहारी को अवध के नवाब आसफ-उद-दौला द्वारा 1784 में इमामबाड़ा परिसर के निर्माण के दौरान बनाया गया था. इसका सीधा सा मतलब है कि दोनों उत्पत्ति कहानियों में 145 साल का अंतर है.
शेफ कुणाल कपूर ने निहारी के बारे में बताया है कि निहारी को असल में नाश्ते में खाने के लिए 'एनर्जी बूस्टर' के तौर पर तैयार किया गया था लेकिन धीरे-धीरे लोग इसे लंच और डिनर में भी खाने लगे.
शेफ रणवीर बरार ने अपने एक वीडियो में बताया, सर्दियों में निहारी कोल्ड, राइनोरिया और फीवर का घरेलू नुस्खा था. दरअसल, इसका सेवन न केवल दिल्ली की सर्दियों में साइनस, सर्दी-जुकाम और बुखार से बचाव करता था बल्कि कम तापमान में शरीर को गर्म रखने वाले भोजन के रूप में भी लोकप्रिय हुआ.
राइटर सादिया देहलवी का कहना था, 'दिल्ली का खाना सल्तनत से मिक्स था लेकिन मुगलों ने इसे रिफाइन किया. फारसी टच के साथ इंडियन फ्लेवर्स ने जादू कर दिया. नवाब इतना भरपेट खाते कि दोपहर तक सो जाते थे. निहारी एनर्जी से भरपूर थी. सर्दियों में सेना भी इसे खाना पसंद करती थी.'
'निहारी हमेशा से सर्दियों से जुड़ी रही है, और इसे खाली पेट यानी निहार मुंह खाया जाता था. सर्दियों में, घर पर हर रविवार 'निहारी दिवस' होता था. हम इसे सुबह के नाश्ते में खाते थे. अब लोग निहारी साल भर खाते हैं और आमतौर पर दोपहर या रात के खाने में खाते हैं. इसे परंपरागत रूप से गरीब आदमी का खाना कहा जाता था, और शादियों में कभी नहीं परोसा जाता था. अब निहारी त्योहारों के पकवानों का हिस्सा है, यहां तक कि हम दिल्ली वालों के लिए भी.'
दिल्ली पवेलियन के एग्जीक्यूटिव सॉस शेफ कुशा माथुर ने इंटरव्यू के दौरान बताया था, निहारी मसालों का खेल है. लखनऊ की निहारी हल्की पीली होती है लेकिन पुरानी दिल्ली वाली लाल-नारंगी रंग के साथ अधिक स्पाइसी होती है. ये सालों का इवॉल्यूशन है.
शेफ रणवीर बरार के अनुसार, असली निहारी टफ मटन कट्स से बनी जो 6-8 घंटे पकती है. नरम होने पर ही परफेक्ट स्वाद देती है.
शेफ कुणाल कपूर ने दिल्ली की फेमस नल्ली निहारी बनाने की काफी आसान विधि बताई है. उन्होंने बताया, 'दिल्ली की खास नल्ली निहारी बनाने के लिए, एक बड़े बर्तन में पतले कटे प्याज को सुनहरा भूरा होने तक भूनें और एक प्लेट में निकाल कर अलग रख दें.
फिर उसी बर्तन में मटन के टुकड़े, अदरक-लहसुन का पेस्ट डालें और थोड़ी देर पकाने के बाद, ताजा टमाटर प्यूरी, नमक, निहारी मसाला, लाल मिर्च पाउडर डालें और तब तक पकाएं जब तक तेल ऊपर न आने लगे.
फिर भुने हुए प्याज को मसलकर डालें, खूब सारा पानी, सौंफ पाउडर और अदरक पाउडर डालें. बर्तन को ढक दें और लगभग 3 घंटे तक धीमी आंच पकने दें. यदि आपके पास समय है तो आप इसे 6 घंटे तक भी धीमी आंच पर पकने दे सकते हैं.
ढक्कन हटाकर, करछी से निहारी के ऊपर तैरते तेल को निकाल लें. मैदे और पानी का घोल बनाकर धीरे-धीरे निहारी में मिलाते हुए हिलाते रहें, फिर से ढककर 10 मिनट तक पकाएं.
ढक्कन हटाकर खमीरी रोटी के साथ परोसें, और आपको ऐसा लगेगा जैसे आप जामा मस्जिद की गलियों में खाना खा रहे हैं.
आजतक लाइफस्टाइल डेस्क