26 मई 1896 को रूस के अंतिम जार निकोलस द्वितीय का राज्याभिषेक मॉस्को के पुराने ओस्पेंस्की कैथेड्रल में हुआ. रूस के शासक के रूप में, निकोलस ने सुधारों की मांगों का विरोध किया और जारशाही निरंकुशता को बनाए रखने का प्रयास किया. निकोलस को न तो शासन करने का प्रशिक्षण मिला था और न ही उनकी इसमें रुचि थी. इससे उस निरंकुशता को बनाए रखने में कोई मदद नहीं मिली. निकोलस की कमजोरी की वजह से ही रूसी क्रांति का जन्म हुआ और जारशाही हमेशा के लिए खत्म हो गई.
1868 में जन्मे निकोलस ने नवंबर 1894 में अपने पिता, जार अलेक्जेंडर तृतीय की मृत्यु के बाद रूसी सिंहासन संभाला. उसी महीने में ही नए जार ने जर्मन मूल की राजकुमारी एलेक्जेंड्रा से विवाह किया. इनका अपने पति पर काफी प्रभाव था. अपने पिता के निधन पर शोक की अवधि के बाद, निकोलस और एलेक्जेंड्रा को मई 1896 में जार और जारिना के रूप में ताज पहनाया गया.
रूस के शासक के रूप में, निकोलस ने सुधारों की मांगों का विरोध किया और जारशाही निरंकुशता को बनाए रखने का प्रयास किया. हालांकि, इस कार्य के लिए उनमें आवश्यक दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव था. रूस-जापान युद्ध के विनाशकारी परिणाम ने 1905 की रूसी क्रांति को जन्म दिया. जिसे निकोलस ने प्रतिनिधि सभा - ड्यूमा - को मंजूरी देकर और संवैधानिक सुधारों का वादा करके शांत किया.
जार ने जल्द ही इन रियायतों को वापस ले लिया और बार-बार ड्यूमा को भंग किया, जिससे बोल्शेविकों और अन्य क्रांतिकारी समूहों को मिलने वाला जनसमर्थन और भी बढ़ गया. 1914 में, निकोलस ने अपने देश को एक और भीषण युद्ध—प्रथम विश्व युद्ध—में धकेल दिया. जैसे-जैसे भोजन की कमी होती गई, सैनिक युद्ध से ऊबते गए, और जर्मनी के हाथों मिली विनाशकारी पराजय ने निकोलस के नेतृत्व में रूस की अक्षमता को उजागर किया.
जार के प्रति लोगों का असंतोष बढ़ता गया. 1915 में, जार ने स्वयं सेना की कमान संभाल ली और घर पर सत्ता की बागडोर महारानी एलेक्जेंड्रा के हाथों में छोड़ दी. उनके अलोकप्रिय दरबार पर रूसी रहस्यवादी रासपुतिन का वर्चस्व था, जिन्होंने जार के सक्षम मंत्रियों और अधिकारियों को संदिग्ध उम्मीदवारों से बदल दिया.
मार्च 1917 में, पेट्रोग्राद में सेना की चौकी ने समाजवादी सुधारों की मांग करते हुए हड़ताली श्रमिकों का साथ दिया और निकोलस द्वितीय को पद छोड़ने के लिए कहा गया. 15 मार्च को, उन्होंने अपने भाई माइकल के पक्ष में सिंहासन त्याग दिया, जिसके द्वारा ताज को अस्वीकार करने से रूस में जारशाही निरंकुशता का अंत हो गया.
निकोलस, उनकी पत्नी और बच्चों को रूस की प्रांतीय सरकार द्वारा जारस्कोये सेलो महल में रखा गया और अगस्त में पेट्रोग्राद सोवियत के दबाव में पश्चिमी साइबेरिया के टोबोल्स्क में स्थानांतरित कर दिया गया. पेट्रोग्राद सोवियत सैनिकों और श्रमिकों की परिषदों का एक शक्तिशाली गठबंधन था जिसने रूसी क्रांति के पहले चरण में प्रांतीय सरकार के साथ सत्ता साझा की थी.
नवंबर 1917 में, व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों ने रूस में सत्ता पर कब्जा कर लिया और दुनिया का पहला कम्युनिस्ट राज्य स्थापित करने का प्रयास शुरू किया. अप्रैल 1918 में, निकोलस और उनके परिवार को यूराल पर्वतमाला में स्थित येकातेरिनबर्ग भेज दिया गया, जिसने उनके अंत को निश्चित कर दिया.
जून 1918 में रूस में गृहयुद्ध छिड़ गया, और जुलाई में बोल्शेविक विरोधी "श्वेत" रूसी सेनाओं ने बोल्शेविक सेनाओं के खिलाफ अभियान के दौरान येकातेरिनबर्ग पर आक्रमण किया। स्थानीय अधिकारियों को रोमानोव परिवार को बचाने से रोकने का आदेश दिया गया था, और येकातेरिनबर्ग सोवियत की एक गुप्त बैठक के बाद, शाही परिवार को मृत्युदंड दिया गया.
17 जुलाई की आधी रात के ठीक बाद, निकोलस, एलेक्जेंड्रा, उनके पांच बच्चों और परिवार के चार नौकरों को जल्दी से कपड़े पहनने और उस घर के तहखाने में जाने का आदेश दिया गया जहां उन्हें बंदी बनाया गया था. वहां, परिवार और नौकरों को दो पंक्तियों में खड़ा किया गया ताकि उनकी तस्वीर ली जा सके. उन्हें बताया गया कि यह तस्वीर उनके भाग जाने की अफवाहों को दबाने के लिए ली जा रही है.
अचानक, एक दर्जन हथियारबंद लोग कमरे में घुस आए और गोलियों की बौछार से शाही परिवार को मार डाला. 1991 में येकातेरिनबर्ग के पास एक जंगल में निकोलस, एलेक्जेंड्रा और उनके तीन बच्चों के अवशेष मिले थे, जिनकी दो साल बाद माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए फिंगरप्रिंटिंग के ज़रिए पहचान की पुष्टि हुई.
युवराज एलेक्सी और रोमानोव परिवार की एक बेटी का कोई पता नहीं चला, जिससे यह अफवाह फैलती रही कि रोमानोव परिवार की सबसे छोटी बेटी अनास्तासिया अपने परिवार के नरसंहार से बच गई थी. रूसी क्रांति के बाद के दशक में यूरोप में कई "अनास्तासिया" के नाम सामने आए, जिनमें से 1984 में संयुक्त राज्य अमेरिका में मरने वाली अन्ना एंडरसन सबसे विश्वसनीय थीं.
हालांकि, 1994 में वैज्ञानिकों ने माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए का उपयोग करके यह साबित कर दिया कि अन्ना एंडरसन अनास्तासिया नहीं बल्कि फ्रांज़िस्का शांज़कोव्स्का नाम की एक पोलिश महिला थीं.
aajtak.in