हर दिन भारतीय रेलवे से लाखों लोग सफर करते हैं. कई बार लोगों को अचानक यात्रा करनी पड़ती है, लेकिन ट्रेन में सीट उपलब्ध नहीं होती. त्योहारों, छुट्टियों और शादी के सीजन में तो कन्फर्म टिकट मिलना और भी मुश्किल हो जाता है. ऐसे समय में रेलवे के पास एक खास व्यवस्था होती है, जिसे इमरजेंसी कोटा कहा जाता है. इसी कोटे के जरिए जरूरत पड़ने पर कुछ लोगों को आखिरी समय में भी सीट मिल जाती है.
क्या होता है इमरजेंसी कोटा?
रेलवे के नियमों के अनुसार, ट्रेन में कुछ सीटें इमरजेंसी कोटा के लिए रिजर्व रखी जाती हैं. इन सीटों का इस्तेमाल खास परिस्थितियों और जरूरी यात्राओं के लिए किया जाता है. आमतौर पर लोग इसे वीआईपी कोटा भी कह देते हैं, लेकिन इसका इस्तेमाल सिर्फ नेताओं के लिए नहीं होता. कई बार गंभीर बीमारी, सरकारी ड्यूटी, परिवार में मौत या नौकरी इंटरव्यू जैसी जरूरी परिस्थितियों में भी यात्रियों को इस कोटे से सीट दी जाती है.
किन लोगों को मिलती है प्राथमिकता?
रेलवे द्वारा जारी जानकारी के मुताबिक, जब ट्रेन में सीटों का आवंटन किया जाता है, तो सबसे पहले इमरजेंसी कोटा कुछ खास श्रेणी के लोगों के लिए रखा जाता है. इसमें हाई ऑफिसियल रैंक वाले अधिकारी, सांसद (MP), मंत्रालय से जुड़े लोग और दूसरे महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग शामिल होते हैं. सीट देने की प्राथमिकता उनके सरकारी प्रोटोकॉल और पद के हिसाब से तय होती है.
कैसे तय होता है सीट अलॉटमेंट?
इसके बाद बाकी बची सीटों पर अलग-अलग जगहों से आई रिक्वेस्ट पर विचार किया जाता है. रेलवे यात्री की स्थिति और यात्रा की वजह को देखकर फैसला लेता है. अगर कोई व्यक्ति सरकारी काम से यात्रा कर रहा हो, किसी परिवार में अचानक मौत हो गई हो, कोई गंभीर रूप से बीमार हो या किसी जरूरी इंटरव्यू के लिए जाना हो, तो ऐसे मामलों को प्राथमिकता मिल सकती है.
हर दिन आती हैं हजारों रिक्वेस्ट
रेलवे अधिकारियों का कहना है कि हर दिन अलग-अलग स्तरों से बड़ी संख्या में इमरजेंसी कोटा की मांग आती है. कई बार सांसदों और अधिकारियों के जरिए भी यात्रियों की सिफारिशें भेजी जाती हैं. इन सभी रिक्वेस्ट्स की जांच रेलवे अधिकारी करते हैं और फिर उपलब्ध सीटों के आधार पर फैसला लिया जाता है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर रिक्वेस्ट मंजूर हो जाती है. सीटों की संख्या सीमित होती है और मांग बहुत ज्यादा रहती है. इसलिए रेलवे सिर्फ जरूरी मामलों में ही सीट आवंटित करता है. रेलवे यह भी साफ करता है कि इमरजेंसी कोटा का इस्तेमाल नियमों के तहत ही किया जाता है.
चार्ट बनने के बाद भी कैसे मिल जाती है सीट?
कई लोगों को यह जानकर हैरानी होती है कि ट्रेन के चार्ट बनने के बाद भी कभी-कभी सीटें खाली दिखाई देती हैं. दरअसल, इनमें से कुछ सीटें इमरजेंसी कोटा के तहत रिजर्व रहती हैं. अगर जरूरत न हो तो बाद में इन्हें सामान्य यात्रियों के लिए जारी कर दिया जाता है. रेलवे इस प्रक्रिया की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं करता. अधिकारियों के मुताबिक, इमरजेंसी कोटा से जुड़ी रिक्वेस्ट्स और यात्रियों की जानकारी नियमों के अनुसार सुरक्षित रखी जाती है. यही वजह है कि आम लोगों को इसकी पूरी प्रक्रिया के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती.
भारतीय रेलवे का कहना है कि इमरजेंसी कोटा का मुख्य उद्देश्य जरूरतमंद लोगों की मदद करना है. अचानक आई मुश्किल परिस्थितियों में यात्रियों को राहत देने के लिए यह व्यवस्था बनाई गई है. हालांकि, बढ़ती मांग और सीमित सीटों की वजह से हर किसी को इसका फायदा नहीं मिल पाता. इसी कारण कई बार आखिरी समय में कुछ यात्रियों का टिकट कन्फर्म हो जाता है, जबकि लंबे समय से वेटिंग में चल रहे लोगों को सीट नहीं मिलती. इसके पीछे अक्सर इमरजेंसी कोटा की व्यवस्था काम करती है.
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