जब पहली बार हुआ टॉरपीडो का इस्तेमाल, नौसैनिक जंग को मिला था नया हथियार

आज के दिन ही पहली बार नेवल वॉरफेयर में नए हथियार का इस्तेमाल हुआ था. इसके बाद से यह हथियार किसी भी देश की नेवी के लिए एक जरूरत बन गया.

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पहली बार किसी नौसैनिक युद्ध में टॉरपीडो का इस्तेमाल किया गया था (Photo - Pexels) पहली बार किसी नौसैनिक युद्ध में टॉरपीडो का इस्तेमाल किया गया था (Photo - Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 25 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 6:39 AM IST

25 मार्च 1941  इटली ने क्रेते के सूडा खाड़ी में ब्रिटिश बेड़े पर हमला किया और ब्रिटिश क्रूजर को डुबोने के लिए एक नए हथियार का इस्तेमाल किया था. नौसैनिक युद्ध में मानवयुक्त टॉरपीडो का यह पहला प्रयोग था. इसके बाद से ही विश्व की नौसेनाओं के शस्त्रागार में एक नया हथियार जुड़ गया.

मानवयुक्त टॉरपीडो, जिसे चेरियट के नाम से भी जाना जाता था, लक्ष्य को भेदने के लिए एक सटीक हथियार था. मुख्य रूप से बंदरगाह में मौजूद दुश्मन के जहाजों पर हमला करने के लिए इस्तेमाल होने वाले इन चेरियट को अपने लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए पायलट की आवश्यकता होती थी. दोनों को ले जाने वाले वाहन पर टॉरपीडो के ऊपर बैठकर, पायलट मिसाइल को लक्ष्य के जितना संभव हो सके करीब ले जाता था, फिर वाहन से वापस, आमतौर पर पनडुब्बी तक, लौट आता था. 

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उस वक्त चेरियट बहुत घातक हथियार था. इसके विकास से पहले चेरियट के सबसे करीब का हथियार जापानी काइटेन था. लेकिन, इसमें मानवयुक्त टॉरपीडो से कुछ कमियां थीं. चैरियट का पहला सफल प्रयोग इतालवी नौसेना द्वारा किया गया था, हालांकि उन्होंने अपने संस्करण को मैयाली कहा था.

 26 मार्च को, इतालवी नौसेना कमांडर लेफ्टिनेंट लुइगी फागियोनी के नेतृत्व में छह इतालवी मोटरबोट क्रीट के सूडा खाड़ी में दाखिल हुईं और वहां बंदरगाह में मौजूद एक ब्रिटिश काफिले के पास अपना मैयाली बम गिरा दिया. विस्फोट से क्रूजर यॉर्क इतना बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया कि उसे किनारे पर लाना पड़ा.

मानवयुक्त टॉरपीडो इतालवी नौसेना के शस्त्रागार में सबसे प्रभावी हथियार साबित हुआ, जिसका दिसंबर 1941 में मिस्र के अलेक्जेंड्रिया में अंग्रेजों के खिलाफ सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया गया. इतालवी टॉरपीडो ने ब्रिटिश युद्धपोत क्वीन एलिजाबेथ और वैलिएंट के साथ-साथ एक टैंकर को भी डुबो दिया.

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जिब्राल्टर और अन्य जगहों पर व्यापारिक जहाजों के खिलाफ भी इनका इस्तेमाल किया गया. हालांकि, अंग्रेजों ने जनवरी 1943 की शुरुआत में सिसिली के पालेर्मो बंदरगाह में नए इतालवी क्रूजर उल्पियो ट्रायनो को डुबोकर इटालियंस से अपना बदला ले लिया. इसी हमले में 8,500 टन के एक अन्य समुद्री जहाज को भी नुकसान पहुंचा.

इटली के आत्मसमर्पण के बाद, ब्रिटेन और बाद में जर्मनी ने मानवयुक्त टॉरपीडो का इस्तेमाल जारी रखा. वास्तव में, जर्मनी जुलाई 1944 में नॉर्मंडी बीच के पास अपने नेगर टॉरपीडो का इस्तेमाल करके दो ब्रिटिश माइनस्वीपरों को डुबोने में सफल रहा था.

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