जब हिटलर ने खोला पहला यातना शिविर, ऐसे शुरू हुई थी नरसंहार की शुरुआत

आज के दिन ही हिटलर ने पहला यातना शिविर बवेरिया के डाचाऊ शहर के पास खोला था. यह कैंप हिटलर की यहूदियों को लेकर दमनात्मक नीति का शुरुआती चरण था.

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हिटलर ने म्यूनिख के पास पहला यातना शिविर खोला था, जिसे बाद में यहूदियों की सामूहिक हत्या के लिए इस्तेमाल किया गया (Photo - Reuters) हिटलर ने म्यूनिख के पास पहला यातना शिविर खोला था, जिसे बाद में यहूदियों की सामूहिक हत्या के लिए इस्तेमाल किया गया (Photo - Reuters)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 22 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 6:21 AM IST

22 मार्च 1933 को हिटलर ने पहला यातना शिविर खोला था. यह कैंप आगे चलकर हिटलर की क्रूरता और यहूदियों के प्रति नफरत का प्रतीक बन गया. यह कैंप बवेरिया के डाचाऊ शहर के पास खोला गया था. हिटलर ने बताया था कि वह इस कैंप में अपने 5,000 राजनीतिक विरोधियों को रखेगा.  बाद में नाजियों ने जगह-जगह ऐसे दर्जनों कैंप बनाए,  जिसे होलोकास्ट में यहूदियों के नरसंहार के लिए इस्तेमाल किया गया. यह यहूदियों की सामूहिक हत्या के लिए काफी कुख्यात हुआ.

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एडॉल्फ हिटलर 30 जनवरी, 1933 को नाजी जर्मनी के चांसलर बने और उसी वर्ष मार्च में हेनरिक हिमलर ने पहले यातना शिविर की घोषणा की, जो दक्षिणी जर्मनी के  म्यूनिख के ठीक बाहर स्थित डाचाऊ कस्बे में खोला गया था.

नाज़ी जर्मनी का पहला यातना शिविर
एडॉल्फ हिटलर ने जर्मनी का चांसलर बनने के कुछ ही समय बाद यहूदियों के प्रति अपनी नफरत खुलेआम दिखानी शुरू कर दी. 22 मार्च को  दक्षिणी जर्मनी में स्थित डाचाऊ में खोला गया यह कैंप शुरू में राजनीतिक कैदियों का शिविर था, लेकिन बाद में यह एक मृत्यु शिविर में बदल गया, जहां हजारों यहूदी कुपोषण, बीमारी और अत्यधिक काम के कारण मर गए या उन्हें मार डाला गया.

 यहूदियों के अलावा, शिविर के कैदियों में कलाकार, बुद्धिजीवी, शारीरिक और मानसिक रूप से दिव्यांग लोग भी शामिल थे. द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के साथ, डाचाऊ के कुछ स्वस्थ कैदियों को जर्मनी के लिए हथियार और अन्य सामग्री बनाने के लिए गुलाम मजदूर के रूप में इस्तेमाल किया गया. इसके अलावा, डाचाऊ के कुछ बंदियों पर नाजियों ने क्रूर चिकित्सा प्रयोग भी किए.

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वैकरले डचाऊ कैंप का पहला कमांडेंट था. शुरू से ही शिविर में बंदियों के साथ कठोर व्यवहार किया जाता था. 25 मई, 1933 को म्यूनिख के एक स्कूल शिक्षक सेबेस्टियन नेफ्जगर को डचाऊ में कैद के दौरान पीट-पीटकर मार डाला गया. शिविर का संचालन करने वाले प्रशासकों ने दावा किया कि नेफ्जगर ने आत्महत्या की थी, लेकिन पोस्टमार्टम से पता चला कि उनकी मृत्यु संभवतः दम घुटने या गला घोंटने के कारण हुई थी.

म्यूनिख के लोक अभियोजक ने वैकरले और उसके साथियों पर हत्या का आरोप लगाते हुए तुरंत अभियोग दायर कर दिया. हिटलर ने तुरंत अभियोजक के फैसले को पलट दिया और एक फरमान जारी किया, जिसमें कहा गया कि डचाऊ और अन्य सभी यातना शिविर जर्मन नागरिकों पर लागू होने वाले जर्मन कानून के अधीन नहीं होंगे. शिविरों का संचालन और सजा देने का अधिकार केवल एसएस (शुत्जस्टाफेल- एक अर्धसैनिक नाजी संगठन) प्रशासकों के पास होगा.

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उसी जून में, थियोडोर आइके ने वैकरले की जगह डचाऊ के कमांडेंट का पद संभाला. आइके ने तुरंत शिविर के दैनिक संचालन के लिए नियमों का एक सेट जारी किया. नियम तोड़ने के दोषी पाए जाने वाले कैदियों को बेरहमी से पीटा जाना था. भागने की साजिश रचने वालों या राजनीतिक विचार व्यक्त करने वालों को मौके पर ही मार दिया जाना था.

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कैदियों को अपना बचाव करने या इस दुर्व्यवहार का विरोध करने की अनुमति नहीं थी. आइके के नियम नाजी जर्मनी के सभी यातना शिविरों के संचालन के लिए एक फ्रेमवर्क के रूप में काम करता था.

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