पत्थर जिस्मों पर ज्यादा पड़े या अक्ल पर, आग दुकानों में ज्यादा लगी या दिलों में, नुकसान संपत्ति का ज्यादा हुआ या भाईचारे का, जख्म जिस्मों पर ज्यादा लगे या मुल्क की रूह पर, किससे पूछें, कौन बताएगा, हर ओर मातम है, हर तरफ धुआं है, हर तरफ अफसोस है. दंगों की हिंसा के निशान तो शायद मिट भी जाएंगे, लेकिन कलंक के वो दाग कैसे मिटेंगे जो दंगाइयों ने दिल्ली के माथे पर लगा दिए. पटरी से उतरी जिंदगी धीरे-धीरे पटरी पर वापस लौट आएगी लेकिन ये जवाब कौन देगा कि क्या वो लोग भी वापस घरों को लौटेंगे, जो इन दंगों की भेंट चढ़ गए.