कल्बे सादिकः मुस्लिमों में मॉडर्न एजुकेशन के पैरोकार, मंदिर को सौंपना चाहते थे बाबरी की जमीन

इस्लामिक विद्धान मौलाना कल्बे सादिक का मंगलवार रात करीब 10 बजे निधन हो गया, जिन्हें बुधवार को लखनऊ इमामबाड़ा गुफरानमाब चौक में दफनाया जाएगा. हिंदू-मुस्लिम एकता और शिया-सुन्नी एकता के प्रबल समर्थक रहे सादिक की सादगी से विरोधी भी उनके कायल थे. यही वजह थी कि मौलाना कल्बे सादिक का सम्मान हर मजहब और मसलक के लोग करते थे. 

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मौलाना कल्बे सादिक का निधन मौलाना कल्बे सादिक का निधन

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली ,
  • 25 नवंबर 2020,
  • अपडेटेड 10:57 AM IST
  • मौलाना कल्बे सादिक का पूरा जोर शिक्षा पर रहा
  • लखनऊ के शिया-सुन्नी फसाद को खत्म कराया
  • हिंदू-मुस्लिम एकता के पैरोकार थे कल्बे सादिक

विश्व विख्यात इस्लामिक विद्वान और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉ. कल्बे सादिक का मंगलवार रात करीब 10 बजे निधन हो गया, जिन्हें बुधवार को लखनऊ इमामबाड़ा गुफरानमाब चौक में दफनाया जाएगा. हिंदू-मुस्लिम एकता और शिया-सुन्नी एकता के प्रबल समर्थक रहे सादिक की सादगी से विरोधी भी उनके कायल थे. यही वजह थी कि मौलाना कल्बे सादिक का सम्मान हर मजहब और मसलक के लोग करते थे. 

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मौलाना डॉ. कल्बे सादिक की शुरुआती तालीम मदरसा नाजमिया में हुई, उसके बाद सुल्तानुल मदरिस से डिग्री हासिल किया. लखनऊ यूनिवर्सिटी से स्नातक किया, फिर अलीगढ़ गए जहां से एमए और पीएचडी किया. 
 

मॉडर्न शिक्षा को बढ़ावा दिया
दुनिया भर में एक अलग पहचान रखने वाले मौलाना कल्बे सादिक पूरी जिंदगी शिक्षा को बढ़ावा देने और मुस्लिम समाज से रूढ़िवादी परंपराओं से निजात दिलाने की कोशिश करते रहे. लखनऊ से लेकर देश के तमाम जगहों पर उन्होंने कई शिक्षण संस्थाओं की स्थापना कराई. तौहीद-उल मुसलमीन ट्रस्ट के जरिए शिक्षा के लिए स्कॉलरशिप देने और मार्डन एजुकेशन के लिए यूनिटी और एमयू कॉलेज जैसे शिक्षण संस्थाएं शुरू किया. लखनऊ का एरा मेडिकल को स्थापित कराने में कल्बे सादिक का अहम रोल रहा है. 

मौलाना कल्बे सादिक

मौलाना कल्बे सादिक अक्सर ये बात कहा करते थे कि मुस्लिम समाज की सारी समस्या की जड़ सिर्फ जिहालत है. इससे दूर किए बैगर किसी समस्या का हल नहीं हो सकता है. मौलाना कल्बे सादिक का जोर मॉडर्न एजुकेशन पर खास तौर से रहा है. उन्होंने यह बात कई बार कही कि इस्लामिक शिक्षा के साथ-साथ मॉडर्न एजुकेशन पर मुसलमानों को खास महत्व देना चाहिए. मॉडर्न एजुकेशन के जरिए ही आप बेहतर मुकाम हासिल कर सकते हैं. उन्होंने कहा था, 'मेरा जी चाहता है की जरदोज के हाथों से सुई छीन कर कलम थमा दूं और मूंगफली बेचने वाले का बच्चा भी इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़े.'

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हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया
देश में हिंदु-मुस्लिम एकता पर भी मौलाना कल्बे सादिक ने जोर दिया. वो जीवन भर सामाजिक सौहार्द के लिए काम करते रहे. उन्होंने कहा था, देश में हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अगर हरिद्वार के गंगा में भी उन्हें स्नान करना पड़ेगा तो करेंगे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे केसी सुदर्शन और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के साथ उनके अच्छे संबंध रहे. वो 90 के दशक में ही अयोध्या की बाबरी मस्जिद की जमीन को राममंदिर के लिए देने को तैयार थे, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बाकी लोग तैयार नहीं हुए थे. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और बाद में भी इस समस्या को सुलझाने का प्रयास करते रहे. 
 

लखनऊ में शिया-सुन्नी का समझौता
लखनऊ में शिया और सुन्नी समुदाय से बीच काफी लंबे समय तक तनाव रहा है. ऐसे में मौलाना कल्बे सादिक ने शिया-सुन्नी समुदाय के बीच समझौते की पहल की थी. अस्सी के दशक में जब शिया-सुन्नी के बीच लखनऊ में दंगा हुआ तो सुन्नी समुदाय के करीब 200 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी. ऐसे में मौलाना कल्बे सादिक ने कोर्ट में एफिडेविट देकर सुन्नी समुदाय के ऊपर से मुकदमा हटाने की सिफारिश की थी, जिसे लेकर शिया समुदाय में काफी अलोचना भी हुई थी. इसके बाद उन्होंने मौलाना अली मियां के साथ मिलकर दोनों समुदाय के बीच सुलह का रास्ता निकाला. हालांकि, शिया और सुन्नी के बीच अदावत राजनाथ सिंह के यूपी में मुख्यमंत्री रहते हुए खत्म हुई. इसमें भी मौलाना की भूमिका अहम रही.  

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मौलाना कल्बे सादिक

ईद के चांद की गणना वैज्ञानिक आधार पर
इस्लाम में कैलेंडर चांद के मुताबिक चलता है. ऐसे में इस्लाम धर्म के त्योहार भी चांद के अनुसार मनाए जाते हैं. ईद के चांद को लेकर अक्सर विवाद पैदा होता रहता था जिसकी वजह से कई बार ऐसा भी हुआ जब दो-दो दिन ईद की नमाज हुई. इस विवाद को खत्म करने के लिए मौलाना डॉ. कल्बे सादिक वैज्ञानिक गणना के आधार पर काफी पहले ही बता देते थे कि ईद का चांद कब दिखेगा. हालांकि अपने इन विचारों के चलते कई बार उन्हें अपने समाज में ही विरोध का भी सामना करना पड़ा. लेकिन कल्बे सादिक का कहना था कि दुनिया चांद पर पहुंच चुकी है और मुसलमान चांद की तारीख को लेकर झगड़ा कर रहा है. हमें विज्ञान और तकनीक का सहारा लेकर आगे बढ़ना चाहिए.  
 

 

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