कौन थे अल्लामा इकबाल जिनकी तस्वीर पर बीएचयू में हुआ बवाल

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में आयोजित एक वेबिनार कार्यक्रम के आमंत्रण पत्र से बीएचयू के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय की तस्वीर हटाकर पाकिस्तान के राष्ट्रीय कवि अल्लामा इकबाल की तस्वीर लगा दी. इसके बाद जब मामले ने तूल पकड़ा तो विभाग ने माफी मांगते हुए तस्वीर को हटाया.

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अल्लामा इकबाल (फाइल फोटो) अल्लामा इकबाल (फाइल फोटो)

रोशन जायसवाल

  • वाराणसी,
  • 10 नवंबर 2021,
  • अपडेटेड 12:51 PM IST
  • BHU के उर्दू विभाग की बड़ी गलती सामने आई
  • पाक के कवि अल्लामा इकबाल की फोटो लगाई

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के उर्दू विभाग में आयोजित एक वेबिनार कार्यक्रम के आमंत्रण पत्र पर बीएचयू के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय की तस्वीर हटाकर पाकिस्तान के राष्ट्रीय कवि अल्लामा इकबाल की तस्वीर लगा दी गई. अल्लामा इकबाल पाकिस्तान के वैचारिक संस्थापक माने जाते हैं. उन्हें पाकिस्तान के राष्ट्रकवि का भी दर्जा मिला हुआ है. 9 नवंबर को 1877 को सियालकोट में जन्में मोहम्मद इकबाल ने ही 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' गीत लिखा था. हालांकि, इकबाल मुसलमानों के लिए पाकिस्तान की मांग करने वाले भी शख्स भी थे. 

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लाहौर के सरकारी कॉलेज से 1899 में इकबाल ने ग्रेजुएशन किया और बाद में कानून की पढ़ाई भी की. बाद में इसी कॉलेज में उन्होंने दो साल पढ़ाया भी, लेकिन दो साल बाद ही सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया. अपनी शुरुआती कविताओं में इकबाल स्वतंत्र और अखंड भारत की बात किया करते थे, लेकिन बाद में ये बदलने लगा. इसे ऐसे समझ सकते हैं कि 1904 में तराना-ए-हिंद (सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा) लिखने वाले इकबाल ने 1910 में तराना-ए-मिल्ली (मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहां हमारा) लिख दिया. 

29 दिसंबर 1930 को इलाहाबाद में इंडियन मुस्लिम लीग के 21वें सेशन में अल्लामा इकबाल ने ही मुसलमानों के लिए अलग देश बनाने की बात कही थी. इसके बाद उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को शामिल कर पाकिस्तान के निर्माण की जद्दोजहद शुरू की. 21 अप्रैल 1938 को उनकी मौत हो गई थी. अपनी मौत से कुछ वक्त पहले उन्होंने एक भाषण में कहा था कि मुसलमानों के पास एक ही रास्ता है और वो ये कि उन्हें जिन्ना का हाथ मजबूत करना चाहिए.

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इकबाल को राष्ट्रवाद का विरोधी भी माना जाता है. उन्होंने दुनिया में रह रहे सभी मुसलमानों को एक ही राष्ट्र के हिस्से के रूप में मान्यता दी, जिसके नेता मोहम्मद हैं, जो मुसलमानों के पैगंबर हैं. 1927 में उन्होंने पंजाब असेंबली का चुनाव भी जीता और 1931 में इकबाल ने लंदन में गोलमेज सम्मेलन में भारतीय मुस्लिम प्रतिनिधि के तौर पर हिस्सा भी लिया था.

क्या है पूरा मामला?

उर्दू दिवस के मौके पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के उर्दू विभाग में एक वेबिनार कार्यक्रम आयोजित किया गया था. इसके आमंत्रण पत्र पर बीएचयू के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय की तस्वीर हटाकर पाकिस्तान के राष्ट्रीय कवि अल्लामा इकबाल की तस्वीर लगा दी गई. बाद में जब इस मामले की शिकायत करने आर्ट्स फैकल्टी के डीन के दफ्तर बीएचयू के छात्र पहुंचे तो आनन-फानन में बैकफुट पर आते हुए अल्लामा इकबाल की तस्वीर हटाकर उर्दू विभाग ने पंडित मालवीय की तस्वीर लगा दी. आर्ट्स फैकल्टी ने इस मामले में माफी भी मांगी है.

इसके अलावा आर्ट्स फैकल्टी के डीन ने एक जांच कमेटी भी बना दी है, जहां उर्दू विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर आफताब अहमद को पेश होकर अपना पक्ष रखने को कहा गया है. डीन ऑफिस में शिकायत करने पहुंचे छात्र पतंजलि ने बताया कि विश्वविद्यालय का छात्र कभी भी मालवीय के सम्मान के साथ खिलवाड़ को बर्दाश्त नहीं कर सकता. परंपरा के उलट उर्दू विभाग ने मालवीय जी की तस्वीर की जगह पाकिस्तान के अल्लामा इकबाल को स्थान दिया. इसके अलावा इस कार्यक्रम की सूचना ना तो विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर दी गई और डीन को भी इस वेबीनार के बारे में कोई जानकारी दी गई. लिहाजा पब्लिक फोरम से इस कार्यक्रम को दूर रखा गया.

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छात्रों ने डीन से की शिकायत.

छात्र पतंजलि ने ये भी आरोप लगाया कि वेबिनार में आपत्तिजनक बातें भी चल रही थीं और शिक्षा की आड़ में धार्मिक एजेंडा को साधने की कोशिश की जा रही थी. उन्होंने कहा कि डीन ने कार्रवाई का आश्वासन दिया है, लेकिन कुछ नहीं होता है तो दो-तीन दिनों के बाद छात्र इस पूरे मामले को लेकर आंदोलन करेंगे.

एक अन्य छात्र गुंजेश गौतम ने बताया कि 9 नवंबर को विश्व उर्दू दिवस पर उर्दू विभाग की ओर से कार्यक्रम आयोजन किया गया था. विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब मदन मोहन मालवीय को पोस्टर से हटाया गया है. गुंजेश ने कहा कि पाकिस्तान के सैद्धांतिक निर्माता अल्लामा इकबाल थे, उनकी तस्वीर पोस्टर पर दो-दो जगह लगाई गई. इसे इन लोगों ने भूल बताया है.

 

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