तीन तलाक को अवैध व अपराध घोषित किए जाने वाले कानून के लोकसभा में पास होने के बाद जहां देशभर में मुस्लिम समुदाय की महिलाओं में खुशी की लहर दौड़ी है, वहीं, मुस्लिम समाज के पुरुषों समेत उलेमा मौलाना और इमामों में बेहद नाराजगी देखने को मिल रही है.
देवबंद और मुजफ्फरनगर में भी महिलाओं ने लोकसभा में इस कानून के पास होने के बाद खुशी जाहिर की, लेकिन पुरुष इस कानून से खफा हैं. देवबंद की रहने वाली नजमा को महज़ ढाई साल के भीतर ही उसके शौहर ने दुबई से WhatsApp के जरिए तलाक दे दिया था. नगमा ने अपने हक की लड़ाई के लिए सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चिट्ठी लिखकर इंसाफ की गुहार लगाई थी.
लोकसभा से तीन तलाक का कानून पास होने के बाद नजमा बेहद खुश है और उसे उम्मीद है कि उसके शौहर को भी उसके किए की सजा जरूर मिलेगी. हालांकि, देवबंद और मुजफ्फरनगर में मुस्लिम समुदाय के ज्यादातर पुरुषों ने इस बिल की सीधे-सीधे मुखालफत की. मुफ्ती इलाही ने तो इसे मुसलमानों के मजहब और शरीयत में सरकार का सीधा-सीधा दखल करार दे दिया.
ज़ायद हसन का कहना है कि निकाह और तलाक के लिए शरीयत का कानून बनाया गया है जो सबसे बड़ा है, ऐसे में सरकार को उनके मजहब में दखल नहीं देना चाहिए.
तीन तलाक से पीड़ित महिलाओं ने इन तमाम मुफ्ती और मौलानाओं के खिलाफ बगावत कर दी है और सीधे सवाल पूछा कि जब निकाह में इतने सारे लोग होते हैं, तो तलाक के वक्त यह लोग कहां चले जाते हैं और तब यह मौलाना और मौलवी महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए सामने क्यों नहीं आते.
मुस्लिम समुदाय के कई युवाओं का मानना है कि कानून में तीन तलाक देने वाले को प्रावधान का आगे चलकर गलत इस्तेमाल भी हो सकता है, जबकि महिलाओं का मानना है इसी डर की वजह से महिलाओं को अब रुसवा नहीं होना पड़ेगा.
आशुतोष मिश्रा / दिनेश अग्रहरि