साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक फैसले तो दिए, लेकिन कुछ ऐसे विवाद भी हुए जिसने काफी किरकिरी कराई. इनमें दो घटनाएं ऐसी हैं जो भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार हुईं. इन घटनाओं को काला दिवस तक कहा गया. साल के शुरुआत में ही यानि 12 जनवरी को देश की सर्वोच्च अदालत के चार जजों ने एक साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पूरे देश को चौंका दिया तो पहली बार किसी मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग लाने की कोशिश की गई.
चार जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने चौंकाया
सबसे पहले बात करते हैं चार जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस की. 12 जनवरी को मीडिया के सामने जैसे ही चार जज सामने आए, पूरा देश सन्न रह गया. ये अपनी तरह का पहला मौका था, जब जजों को अपनी बात रखने के लिए पूरे देश के सामने आना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट की आजादी का सवाल उठाते हुए जजों ने जो बातें कहीं, उससे साफ था कि न्याय के मंदिर में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है. जजों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में जो गलत हो रहा है, उसे बताना उनकी जिम्मेदारी है.
जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस लोकुर और जस्टिस रंजन गोगोई ने सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता के प्रति फिक्रमंद होते हुए जज लोया केस की भी स्वतंत्र जांच की अपील की. इन चार जजों में जस्टिस चेलमेश्वर खासे नाराज थे.
जज लोया की मौत की सुनवाई पर मतभेद
जज बीएच लोया की अप्राकृतिक और रहस्यमयी मौत की सुनवाई पर भी सुप्रीम कोर्ट के जजों में टकराव देखने को मिला था. इस केस की सुनवाई वरिष्ठ जजों को नजरअंदाज कर जूनियर जज को दी गई थी. चार जजों ने अपनी चिट्ठी में भी लिखा कि कई मौकों पर सीजेआई ने रोस्टर बनाने के दौरान बेंच का निर्धारण अपनी पसंद और अतार्किक ढंग से किया.
सीजेआई के खिलाफ महाभियोग
इस साल सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग का भी नाटकीय घटनाक्रम हुआ. हालांकि बाद में महाभियोग के प्रस्ताव को राज्यसभा सभापति द्वारा खारिज करने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाली याचिका कांग्रेस ने वापस ले ली है. इसके बाद 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने इसे खारिज कर दिया. न्यायपालिका के इतिहास में यह पहली बार था जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए नोटिस दिया गया.
मास्टर ऑफ रोस्टर पर रार
अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट के अंदर चल रहा मनमुटाव फिर सबके सामने आया. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के मास्टर ऑफ रोस्टर के मुद्दे पर दायर की गई शांति भूषण की याचिका पर जस्टिस चेलमेश्वर ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया है. उन्होंने कहा कि वह नहीं चाहते हैं कि 24 घंटे के अंदर ही उनका आदेश पलट दिया जाए. उनकी इस बात से साफ जाहिर था कि सीजेआई और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जजों के बीच संबंध कुछ ठीक नहीं थे.
जस्टिस केएम जोसेफ की नियुक्ति पर टकराव
न्यायपालिका की कई मसलों पर केंद्र सरकार से भी मतभेद रहे हैं. इस साल उत्तराखंड के जस्टिस केएम जोसेफ की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के दौरान यह टकराव और ज्यादा दिखा. दरअसल कॉलेजियम की ओर से केंद्र सरकार को जस्टिस जोसेफ का नाम भेजा गया था, लेकिन केंद्र ने वरिष्ठता के उल्लंघन का हवाला देते हुए नाम पुनर्विचार के लिए लौटा दिया. गौरतलब है कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के मामले में केंद्र सरकार को जस्टिस जोसेफ की बेंच के फैसले से झटका लगा था. केंद्र सराकर के विरोध को घटनाक्रम से भी जोड़ कर देखा गया.
CJI को कोई कंट्रोल कर रहा था!
वहीं नवंबर में रिटायरमेंट के बाद जस्टिस कुरियन ने एक बार फिर से जजों की नियुक्ति में देरी पर सवाल उठाते हुए कहा था कि सरकार ने नए नियम लाने में देरी की है. उन्होंने कहा था कि मुझे समझ नहीं आता कि सरकार ये क्यों कह रही है कि मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर अभी भी फाइनल नहीं है. कोलेजियम MoP के ड्राफ्ट के हिसाब से काम कर रहा है. लेकिन सरकार फिर भी उस पर कदम नहीं उठा रही. उन्होंने तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा पर भी सवाल उठाते हुए कहा था कि मुझे लग रहा था कि उन्हें कोई बाहर से कंट्रोल कर रहा था.
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