प्रमोशन में आरक्षण पर SC के फैसले के बाद बोली मोदी सरकार- कर रहे चर्चा

एनडीए की सहयोगी एलजेपी ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का विरोध किया है. एलजेपी नेता चिराग पासवान ने लोकसभा में कहा कि वह इस फैसले से सहमत नहीं हैं.

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केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने संसद में दिया बयान (फाइल फोटो) केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने संसद में दिया बयान (फाइल फोटो)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 10 फरवरी 2020,
  • अपडेटेड 6:11 PM IST

  • प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर संसद में हंगामा
  • थावरचंद गहलोत ने लोकसभा में दिया बयान

प्रमोशन में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विपक्ष सरकार पर हमलावर है. लोकसभा में सोमवार को विपक्ष के सांसद कोर्ट की टिप्पणी के बाद केंद्र सरकार पर हमलावर दिखे और सरकार से इस मसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने की मांग की.

इस बीच, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संसद में बयान दिया. केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता थावरचंद गहलोत ने लोकसभा में साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के जिस केस को लेकर फैसला दिया है, उसमें केंद्र सरकार पार्टी नहीं थी. उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत द्वारा नौकरी में प्रमोशन को मूलभूत अधिकार नहीं बताने के फैसले पर सरकार उच्च स्तरीय चर्चा कर रही है.

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एनडीए की सहयोगी एलजेपी ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का विरोध किया है. एलजेपी नेता चिराग पासवान ने लोकसभा में कहा कि वह इस फैसले से सहमत नहीं हैं. चिराग पासवान ने कहा कि महात्मा गांधी और बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के बीच पूना पैक्ट का ही परिणाम है कि आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार है. आरक्षण खैरात नहीं है, यह संवैधानिक अधिकार है. उनकी लोक जनशक्ति पार्टी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं है. केंद्र सरकार इस पर हस्तक्षेप करे. आरक्षण से जुड़े सारे कानून को नौवीं सूची में डाला जाए,  जिससे आरक्षण पर सवाल उठाने की बहस ही खत्म हो जाए.

ये भी पढ़ें- सरकारी नौकरियों में आरक्षण का दावा मौलिक अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि उत्तराखंड सरकार कैसे कह सकती है प्रमोशन में आरक्षण का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है और सरकार का कोई भी दायित्व नहीं है. बसपा ने भी कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं. पार्टी सांसद रितेश पांडे ने कहा कि उत्तर प्रदेश में हम लोगों ने प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था कराई थी. सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना और सरकार का यह पक्ष देना इससे यह साफ है कि ये दलित विरोधी और एससी-एसटी विरोधी सरकार है.

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क्या है कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण का दावा करना मौलिक अधिकार नहीं है. लिहाजा कोई भी अदालत राज्य सरकारों को एससी और एसटी वर्ग के लोगों को आरक्षण देने का निर्देश नहीं जारी कर सकती है. आरक्षण देने का यह अधिकार और दायित्व पूरी तरह से राज्य सरकारों के विवेक पर निर्भर है कि उन्हें नियुक्ति या पदोन्नति में आरक्षण देना है या नहीं. हालांकि, राज्य सरकारें इस प्रावधान को अनिवार्य रूप से लागू करने के लिए बाध्य नहीं हैं.

जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ ने उत्तराखंड सरकार के लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता (सिविल) के पद पर पदोन्नति में एससी और एसटी को आरक्षण से संबंधित मामलों को एक साथ निपटाते हुए यह निर्देश दिया है. बेंच ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए ये व्यवस्था दी है. 2018 में भी सुप्रीम कोर्ट ने जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि ओबीसी के लिए तय क्रीमी लेयर का कॉन्सेप्ट एससी/एसटी के लिए भी नियुक्ति और तरक्की यानी प्रमोशन में लागू होगा.

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