राज्यों ने ढीले किए RERA के नियम, मकान खरीदने वालों को बड़ा झटका!

केंद्र सरकार को उम्मीद है कि 31 जुलाई तक सभी राज्यों में रियल एस्टेट अथॉरिटी बन जाएगी. केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह का कहना है कि राज्यों में अथॉरिटी पर स्थिति साफ नहीं है और केंद्र सरकार की इस पर नजर है. केंद्रीय शहरी विकास और गरीबी उन्मूलन मंत्री वेंकैया नायडू ने कहा हैं कि मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि कोई राज्य सरकार रियल एस्टेट ऐक्ट के किसी प्रावधान को हल्का करने की स्थिति में नहीं है.

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RERA की फोटो RERA की फोटो

मनीष दीक्षित

  • नई दिल्ली,
  • 30 मई 2017,
  • अपडेटेड 9:56 PM IST

केंद्र सरकार को उम्मीद है कि 31 जुलाई तक सभी राज्यों में रियल एस्टेट अथॉरिटी बन जाएगी. केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह का कहना है कि राज्यों में अथॉरिटी पर स्थिति साफ नहीं है और केंद्र सरकार की इस पर नजर है. केंद्रीय शहरी विकास और गरीबी उन्मूलन मंत्री वेंकैया नायडू ने कहा हैं कि मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि कोई राज्य सरकार रियल एस्टेट ऐक्ट के किसी प्रावधान को हल्का करने की स्थिति में नहीं है क्योंकि यह उनकी न्यायिक जवाबदेही है और ऐसा करने पर उन्हें आलोचना का सामना भी करना पड़ सकता है. ऐसे नियमों पर अमल कराने के लिए अधिकृत राज्यसभा की अधीनस्थ विधान समिति निगरानी कर रही है. ताकि मूल एक्ट को किसी भी तरह कमजोर न किया जा सके.

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कानून का पूरी तरह पालन हो : राव इंद्रजीत सिंह
बिल्डरों पर नकेल कसने के लिए बना रियल एस्टेट (रेगुलेशन ऐंड डेवलपमेंट) ACT 2016 यानी रेरा कहने को एक मई से लागू तो हो गया है लेकिन एक महीने के बाद भी रियल एस्टेट अथॉरिटी तो तीन राज्यों के अलावा कहीं नहीं बनी है. राज्यों के लचर रवैये के चलते ये अमल में नहीं आ सका है. इतना ही नहीं राज्यों ने नियमों में फेरबदल कर कानून को हल्का भी कर लिया है जो कि खरीदारों के लिए झटका माना जा रहा है. शहरी आवास राज्यमंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने नियम बदलने पर हरियाणा को पत्र भेजकर कानून का पूरी तरह पालन करने की बात कही है.

दरअसल, किसी भी कानून को लागू करने के लिए नियम बनतें हैं. संविधान के मुताबिक, भूमि राज्य का विषय इसलिए केंद्रीय कानून होने के बावजूद राज्य स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक उसके नियमों में संशोधन कर सकतें हैं. इस ताकत का इस्तेमाल करते हुए कुछ राज्यों ने नियम बदल लिए हैं. आइए देखते हैं कि किन राज्यों ने नियम बदलाव किए -

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उत्तर प्रदेश-
उत्तर प्रदेश के सभी अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट दायरें में नहीं हैं. 60 परसेंट पूरे हो चुके प्रोजेक्ट पर यह नियम लागू नहीं है कंप्लीशन का आवेदन दे चुके प्रोजेक्ट भी बाहर है. जुर्माने की ब्याज दर केंद्र के नियमों में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की कर्ज दर के अनुरूप करने वाले प्रावधान से स्टेट बैंक शब्द हटाया गया है और अथॉरिटी का गठन भी नहीं किया है.

महाराष्ट्र-
महाराष्ट्र में बिल्डरों को दंडित करने और पेनॉल्टी पर स्थिति साफ नहीं की है. प्लान में संशोधन के लिए दो तिहाई खरीददारों की सहमति को हटाकर उनके स्थान पर जमा किए गए आखिरी प्लान को ही मानने का प्रावधान किया है जो कि बिल्डर फ्रेंडली है. अथॉरिटी गठित और रजिस्ट्रेशन भी शुरू कर दिया है.

राजस्थान-
राजस्थान में बिल्डर पर अर्थदंड केंद्रीय कानून के 10 फीसदी के मुकाबले घटाकर पांच फीसदी किया है. अधिसूचना में कैद के प्रावधान की जगह आर्थिक भरपाई से केस के समझौते वाले प्रावधान का जिक्र किया गया है. विधिवत अथॉरिटी के गठन कि जिम्मेदारी एक अफसर को सौंप दी गई है.

बिहार-
बिहार में पेमेंट शेड्यूल पर नोटिफिकेशन की स्थिति साफ नहीं गई है. अथॉरिटी का गठन न होने से कानून का सीधा फायदा जनता को अभी तक नहीं मिला है.

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उत्तराखंड-
उत्तराखंड में पेमेंट शेड्यूल और अधूरे प्रोजेक्ट पर स्थिति साफ नहीं की गई है. नोटिफिकेशन में अर्थदंड का जिक्र नहीं किया गया है. और अथॉरिटी का गठन भी नहीं हुआ है.

मध्यप्रदेश-
मध्यप्रदेश के बिल्डरों को कैद व जुर्माने के प्रावधान में जुर्माने की रकम में संशोधन का अधिकार सरकार ने अपने पास रखा है. इसका जिक्र नोटिफिकेशन में पेमेंट शेड्यूल मे नहीं किया गया है.

गुजरात-
गुजरात में RERA में शामिल परियोजनाओं की परिभाषा नहीं दी गई है. बिल्डरों पर पेनाल्टी का जिक्र भी नहीं हैं फ्लेट या मकान में कोई खामी होने पर खरीददार के अधिकारों का भी जिक्र नहीं है. अथॉरिटी का गठन नहीं किया गया है.

कहां-कहां अधिसूचित किए गए नए नियम-

गुजरात, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, केरल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, दिल्ली और सभी केंद्र शासित क्षेत्र (प्रत्येक केंद्र शासित क्षेत्र के अलग नियम हैं )

सुप्रीम कोर्ट के वकील डी. के. गर्ग कहते हैं कि रेरा एक तरह से भविष्य का कानून है. इसमें पुराने प्रोजेक्ट, जिनके खरीदारों ने इसके लिए असली लड़ाई लड़ी है उनको कोई प्रोटेक्शन नहीं दिया गया है. रूल्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता के बगैर सभी राज्यों में इसका लागू होना संभव नहीं है. मौजूदा हालात के लिहाज इसको लागू करने में सालभर लग सकता है. चुनावी राज्यों में और ज्यादा समय भी लग सकता है. केंद्र राज्यों को किसी नियम को मानने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है, RERA अथॉरिटी से ज्यादा प्रभावी कंज्यूमर फोरम हैं. उसे सारी पॉवर है. फोरम जेल भेजने से लेकर जुर्माना तक लगा सकता है.


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