NSG को मिले कमीकाज़ी ड्रोन, आतंकियों के सफाए में निभाएंगे अहम रोल

मानेसर में NSG के 34वें स्थापना दिवस पर कमीकाज़ी ड्रोन का लाइव डेमो के साथ अनावरण किया गया. अब आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन में NSG के ब्लैक कैट कमांडो को कमीकाज़ी ड्रोन का साथ मिलेगा.

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कमीकाज़ी ड्रोन (फोटो- कमलजीत कौर संधू) कमीकाज़ी ड्रोन (फोटो- कमलजीत कौर संधू)

राम कृष्ण / खुशदीप सहगल / कमलजीत संधू / जितेंद्र बहादुर सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 16 अक्टूबर 2018,
  • अपडेटेड 6:44 PM IST

आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन्स को धार देने के लिए नेशनल सिक्योरिटी गार्ड्स (NSG) के ब्लैक कैट कमांडो को अब ‘कमीकाज़ी’ ड्रोन्स का भी साथ मिलेगा. ये ड्रोन स्वदेशी तकनीक से विकसित किए गए हैं. मानेसर में मंगलवार को NSG के 34वें स्थापना दिवस पर कमीकाज़ी ड्रोन का लाइव डेमो के साथ अनावरण किया गया.

ड्रोन्स के लिए ये ‘कमीकाज़ी’ नाम जापानी वायुसेना की ओर से द्वितीय विश्व युद्ध में इस्तेमाल की गई स्पेशल अटैक यूनिट मिसाइल से लिया गया है. तब इनका इस्तेमाल जापान की ओर से साझा सेनाओं की नौकाओं को तबाह करने के लिए किया गया था. ये हमले पारंपरिक विमानों की ओर से किए जाने वाले हमलों से ज्यादा असरदार थे.

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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कमीकाज़ी मिसाइल हमलों के लिए मानव पायलटों की जरूरत होती थी, लेकिन भारत में निर्मित कमीकाज़ी ड्रोन रिमोट से संचालित मानव रहित एरियल व्हेकिल (UAV) है. इसका उद्देश्य ब्लैक कैट्स को कम से कम नुकसान सुनिश्चित करना है. जुड़वा कमीकाज़ी ड्रोन गेमचेंजर बन सकता है, क्योंकि हथियारों से लैस UAV किसी इमारत में छुपे आतंकी तक पहुंचकर उसका सफाया करने की क्षमता है.

भारतीय कंपनी वोर्टेक्स यूएएस की ओर से बनाए गए कमीकाजी में दो ड्रोन्स के सेट का इस्तेमाल किया जाता है. पहला ड्रोन विस्फोटक से लक्षित इमारत की खिड़की को तोड़ता है. दूसरा सुसाइड ड्रोन डेटोनेटर ले जाता है, जो सीधा आतंकी के सिर पर जाकर फट सकता है. सुसाइड ड्रोन खुद फट सकता है या बचे भी रह सकता है, जिससे कि जरूरत के हिसाब से उसका दोबारा भी इस्तेमाल किया जा सके.

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के महानिदेशक सुदीप लखटकिया ने इंडिया टुडे को बताया, 'हमने सशस्त्र ड्रोन को अपनी तकनीक को उन्नत बनाने के हिस्से के तौर पर साथ जोड़ा है. टेक्नोक्रेट्स और स्किल इंडिया पहल के तरह स्टार्ट अप उद्यमियों को प्रोजेक्ट से जोड़ा गया है, लेकिन आतंकविरोधी ऑपरेशन्स में सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है.' एक ड्रोन की कीमत डेढ़ लाख रुपये है. NSG को चार ड्रोन मुहैया हो गए हैं, इनमें से दो का कामयाबी से परीक्षण किया जा चुका है. आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन के अलावा इन ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी और संचार के लिए किया जा सकता है. NSG को कमीकाजी ड्रोन के अलावा दुनिया का सबसे छोटा ड्रोन ब्लैक हॉर्नेट नैनो और 38 मिमी सशस्त्र ड्रोन भी मिला है.

इंटरनेशनल वोर्टेक्स यूएएस के हेड मिलिंद कुलश्रेष्ठ ने कमीकाज़ी ड्रोन को विकसित करने के लिए NSG के साथ सहयोग किया है. कुलश्रेष्ठ ने कहा, 'हमारी स्वदेशी तकनीक है, जहां हमने एयरो डायनामिक फ्लो चार्ट के साथ फंक्शन पहलुओं को देखा, जिससे कि ड्रोन की मदद से विस्फोटक को ले जाया जा सके और ट्रांस रिसीवर से ड्रोन को संचालित किया जा सके.  

कॉमर्शियलमें प्रोपेलर्स या बैटरी को साथ ले जाने की क्षमता नहीं होती. जहां आतंक विरोधी आपरेशन तीन से चार दिन तक चलते हैं वहां ये ड्रोन निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं. उपरोक्त कंपनी उत्तरी कमान के लिए भी ड्रोन बना रही है जिनका लेह में सफल परीक्षण हो चुका है. दुनिया के सबसे छोटे मिलिट्री ड्रोन ब्लैक हॉर्नेट नैनो का भी NSG की ओर से इस्तेमाल किया जा रहा है.

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केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है, ‘का हमेशा खतरा रहता है लेकिन NSG  अपने को लगातार उन्नत करता रहता है. ऐसे में तकनीक को विकसित करना हमेशा से प्राथमिकता है.’ NSG ने रिमोट ऑपरेटेड व्हेकिल (ROV) हासिल किए हैं जो 150 किलोग्राम IED  ले जा सकते हैं. ये कैमिकल, बायोलॉजिकल और न्यूक्लियर मैटीरियल को भी साथ ले जा सकते हैं.

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