एनजीटी ने कहा कि 15 अक्टूबर को सभी ज्वाइंट सेक्रेट्री अपनी स्टेटस रिपोर्ट के साथ कोर्ट में हाजिर हों और बताएं कि पराली से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए क्या उपाय किए गए हैं. एनजीटी ने साफ किया कि किसी भी हाल में पराली जलने से रोकना केंद्र और राज्य सरकार दोनों की जिम्मेदारी है. लोगों के स्वास्थ्य के लिए ये करना सरकारों के लिए अनिवार्य है.
एनजीटी ने दिल्ली से सटे सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि चीफ सेक्रेटरी के दफ्तर में एक स्पेशल सेल गठित किया जाए, जो अक्टूबर और नवंबर में प्रदूषण की पल-पल की जानकारी रखें और इसकी जानकारी राज्य सरकार अपनी वेबसाइट पर तुरंत अपडेट करे. एनजीटी ने कहा कि छुट्टी या त्योहारों के दिन भी स्पेशल सेल की मॉनिटरिंग जारी रहनी चाहिए.
कोर्ट ने कहा कि अक्टूबर से अगले कुछ महीनों के बीच में पराली जलने के कारण दिल्ली में प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ जाता है कि लोगों के लिए सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है. ऐसे में वक्त से पहले पराली जलने को रोकना सरकार की प्राथमिकताओं में होना चाहिए.
ऑड-ईवन के बाद अब दिल्ली सरकार बदल सकती है दफ्तरों की टाइमिंग
2017 में प्रदूषण का स्तर बेहद खराब था
बता दें कि 2017 में दिल्ली का वायु प्रदूषण सबसे खराब स्तर पर पहुंचने के बाद सियासी गलियारों में पराली जलाने पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठने लगी थी. इस बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पंजाब और हरियाणा से इसे रोकने की अपील की थी. केजरीवाल की अपील का विरोध करते हुए तत्कालीन आप नेता सुखपाल सिंह खैरा ने लुधियाना में किसानों के समर्थन में पराली जलाई थी.
उस वक्त पंजाब के मुख्यमंत्री ने पराली जलाने के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया था और इस पर अंकुश लगाने में असमर्थता जताई थी. उन्होंने कहा था कि किसान पहले ही कर्ज के बोझ तले दबे हैं और पराली नष्ट करने के उपकरण इस्तेमाल करने के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं.
पूनम शर्मा