मनरेगाः नहीं मिल रही तय न्यूनतम मजदूरी, बढ़त हो रही है या गरीबों से मजाक!

ग्रामीण इलाकों में लोगों को रोजगार की गांरटी देने की यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना को साल 2014 में आने वाली एनडीए सरकार ने भी बरकरार रखा, लेकिन इस योजना के तहत हर साल जो मजदूरी बढ़ाई जा रही है वह गरीबों के साथ किसी मजाक से कम नहीं है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रसन्ना मोहंती / दिनेश अग्रहरि

  • नई दिल्ली,
  • 06 अप्रैल 2019,
  • अपडेटेड 1:45 PM IST

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ( MGNREGA या मनरेगा) को कभी ‘यूपीए सरकार की विफलता का स्मारक' बताने वाली मौजूदा सरकार ने इस साल के बजट में उसके लिए सबसे ज्यादा 60,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया है. इसके बावजूद मनरेगा के तहत काम करने वाले लोगों की मजदूरी बहुत कम है और इसमें साल दर साल बढ़त भी ऊंट के मुंह में जीरा जैसी हो रही है.

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चुनावी साल में भी कुछ खास बढ़त नहीं

इस साल 28 मार्च को ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए मनरेगा की मजदूरी में संशोधन की अधिसूचना जारी की. लेकिन कमाल की बात यह है कि इस चुनावी साल में भी जो मामूली बढ़त की गई वह चकित करने वाली और निराशाजनक ही है.

उदाहरण के लिए छह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मनरेगा की मजदूरी में एक रुपये की बढ़त भी नहीं की गई (वही मजदूरी बरकरार रखी गई जो 2018 में थी). इनमें गोवा, कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप शामिल हैं.

दो राज्यों हिमाचल प्रदेश और पंजाब में 2018 की तुलना में मजदूरी में महज 1 रुपये की बढ़त की गई. इसी तरह छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में मजदूरी में महज 2 रुपये की बढ़त की गई. सिर्फ 6 राज्यों में मजदूरी में 10 से 17 रुपये (जो कि अधिकतम है) की बढ़त की गई. ये सभी पूर्वोत्तर के राज्य हैं-अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा. कम से कम 2016 से (जब से आधिकारिक वेबसाइट पर आंकड़े मौजूद हैं) मनरेगा की मजदूरी में ऐसी ही बढ़त देखी जा रही है.

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साल 2018 में 10 राज्यों में मनरेगा की मजदूरी में एक रुपये की भी बढ़त नहीं की गई थी. ये राज्य थे- अरुणाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड, मिजोरम, नगालैंड, राजस्थान, सिक्किम, त्रिपुरा, यूपी और उत्तराखंड. छह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मनरेगा की मजदूरी में सिर्फ 2 रुपये की बढ़त की गई थी. इनमें छत्तीसगढ़, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, दादरा एवं नागर हवेली और दमन दीव शामिल थे. सिर्फ 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मजदूरी में 8 रुपये या उससे ज्यादा (अधिकतम 19 रुपये तमिलनाडु एवं पुड्डुचेरी में) की बढ़त की गई थी.

साल 2017 में भी पांच राज्यों में मनरेगा की मजदूरी में महज 1 रुपये की बढ़त की गई थी. इनमें असम, बिहार, झारखंड, यूपी और उत्तराखंड शामिल हैं. तब 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मजदूरी में बढ़त महज 8 रुपये या उससे ज्यादा की बढ़त गई थी (अधिकतम बढ़त 18 रुपये की थी).

ग्रामीण इलाकों में बढ़ रही परेशानी

ग्रामीण इलाकों के लोग वैसे ही परेशान हैं, उनकी दिक्कतें बढ़ रही हैं, लेकिन मनरेगा की मजदूरी के साथ यह मजाक क्यों हो रहा है, इसके बारे में सार्वजनिक तौर पर किसी का बयान नहीं आया है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के मुताबिक साल 2015-16 से अब तक ग्रामीण इलाकों में मजदूरों को मिलने वाले पारिश्रमिक में बहुत कम, एक अंक में ही बढ़त हो पाई है.

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ग्रामीण क्षेत्र के लोग कितने परेशान हैं, इसका अंदाजा 2018-19 में मजदूरों द्वारा किए जाने वाले श्रम के कार्यदिवस में असाधारण बढ़त से भी लगाया जा सकता है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2018-19 में 266.4 करोड़ व्यक्ति कार्य दिवस का आंकड़ा रिकॉर्ड हुआ. जो एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से अब तक का सर्वाधिक है. साल 2014-15 में 166.21 करोड़ व्यक्ति कार्य दिवस का आंकड़ा था.

न्यूनतम मजदूरी से भी कम

मनरेगा के बारे में चिंता करने वाली एक बात यह भी है कि इसमें मिलने वाली मजदूरी लगातर राज्यों में तय न्यूनतम मजदूरी से भी कम रहती है. मनरेगा संघर्ष समिति के लिए कई एनजीओ द्वारा किए गए एक विश्लेषण से पता चला है कि 33 प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों में मनरेगा के तहत मिलने वाली मजदूरी उस राज्य में तय न्यूनतम मजदूरी से भी कम है.

यह हाल तब है जब 1983 में संजीत रॉय बनाम राजस्थान मामले में सुप्रीम कोर्ट साफ तौर पर यह आदेश दे चुका है कि इस तरह की सभी योजनाओं में मिलने वाली पारिश्रमिक तय न्यूनतम मजदूरी से कम नहीं होनी चाहिए.

पिछले चार साल से तमाम सामाजिक कार्यकर्ता मनरेगा के तहत कम से कम तय न्यूनतम मजदूरी को लागू करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन उनके इस संघर्ष का अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है.

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स्रोत: nrega.nic.in

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