वाघा बॉर्डर की तर्ज पर J-K के ऑक्ट्राय में भी भव्य 'बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी'

इसके पीछे राज्य सरकार और केंद्र सरकार की ये मंशा है कि जहां ऑक्ट्राय में लोगों की मौजूदगी और आने जाने से जम्मू कश्मीर के टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा. वहीं दूसरी तरफ दोनों देशों के रिश्ते में भी कुछ बदलाव होंगे. जानकारी के मुताबिक जल्द ही BSF जम्मू कश्मीर के इस इलाके में भव्य तरीके से बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी शुरु कर देगा.

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प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर

अंकुर कुमार / जितेंद्र बहादुर सिंह

  • नई दिल्ली ,
  • 08 दिसंबर 2017,
  • अपडेटेड 11:14 AM IST

दिलों को जोड़ने और रिश्तों में गर्माहट लाने के लिए हमेशा भारत पाकिस्तान के साथ मिलकर कुछ न कुछ करता रहता है. BSF आने वाले कुछ समय में जम्मू कश्मीर के उस इलाके में जहां से पुराने समय यानी आज़ादी से पहले पाकिस्तान की ओर सियालकोट के लिए सड़क जाती थी. उसी के नज़दीक भारत की सीमा के अंदर ऑक्ट्राय में बीएसएफ़ अब भव्य "बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी" शुरू करने जा रहा है.

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इसके पीछे राज्य सरकार और केंद्र सरकार की ये मंशा है कि जहां ऑक्ट्राय में लोगों की मौजूदगी और आने जाने से जम्मू कश्मीर के टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा. वहीं दूसरी तरफ दोनों देशों के रिश्ते में भी कुछ बदलाव होंगे. जानकारी के मुताबिक जल्द ही BSF जम्मू कश्मीर के इस इलाके में भव्य तरीके से बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी शुरु कर देगा.

शुरुआती दौर में छोटे स्तर पर सेरेमनी दोनों देशों की तरफ से अभी भी की जाती है. सूत्रों की माने तो इसको अटारी वाघा बॉर्डर पर होने वाली "बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी" की तर्ज पर भव्य बनाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं. इससे इस इलाके में ज्यादा से ज्यादा लोग वाघा बॉर्डर की तर्ज पर यहां पहुचेंगें. यह इलाका आजादी के पहले का वह इलाका है जहां भारत से सियालकोट के लिए सड़क मार्ग बना हुआ था, जिसके जरिए अफगानिस्तान के रास्ते होते हुए एक व्यापारिक मार्ग था. इस जगह को बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी के लिए इसलिए चुना गया है, जिससे कि दोनों देशों के लोग यहां पर आकर एक दूसरे को समझ सके. साथ ही लोग यह देखें कि सीमा पर तनाव के बीच भारत ने एक स्वस्थ पहल की है.

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ऐसी होगी बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी

'बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी', जिसका गवाह बनने के लिए दोनों देशों के हजारों लोग हर रोज भारत-पाकि‍स्तान में अपनी अपनी सीमा के अंदर जुटते हैं. जहां तक वाघा की बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी को देखकर यह साफ होता है कि यहां पर हर शाम दोनों देशों के राष्ट्रीय ध्वज उतारने का अवसर आता है. जम्मू कश्मीर के ऑक्ट्राय में भी कुछ इसी तरीक़े से इस समारोह को संपन्न करने का प्लान है. वाघा बॉर्डर की सेरेमनी की बात करें तो इसकी शुरुआत 1959 में हुई. उसके बाद से यह बिना रुके जारी है. हां, 1965 और 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान इसका आयोजन नहीं किया गया. बंटवारे के बाद से सालों से तनावपूर्ण माहौल के बीच इस दिखावटी दोस्ती का प्रदर्शन हमेशा होता रहता है.

सेरेमनी की शुरुआत में आकर्षक वेशभूषा में सजे बच्चे देशभक्ति वाले गानों पर प्रस्तुति देते हैं. इसके बाद बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी करीब 156 सेकंड चलती है. इस दौरान, दोनों देशों के जवान मार्च करते हुए बॉर्डर तक आते हैं. इसके बाद बीएसएफ़ और रेंजर्स के 2 कमांडर और 6 जवान भारत और पाकिस्तान की ओर से इसमें शामिल होते हैं. इस दौरान दोनों देशों के गार्ड नाक से नाक की बराबरी तक आते हैं. जवान मार्च के दौरान अपने पैर जितना ऊंचा ले जाते हैं, उसे उतना बेहतर माना जाता है. दोनों देशों के जवानों की जोशभरी आवाज और परेड की धमक से कुछ ऐसा माहौल बन जाता है कि सेरेमनी देखने वाले जोश और देशभक्ति से भर उठते हैं.

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लगते हैं देशभक्त‍ि के नारे

बीएसएफ़ और पाक रेंजर्स के जवान जब सेरेमनी शुरू होती है तो जितनी बार वो जोर जोर से चिल्लाते हैं, दर्शकों की भीड़ उतना ही उनका नारे लगाकर हौसला बढ़ाती है. जवान एक-दूसरे देश से बेहतर प्रदर्शन कर सकें. इसके बाद, जवान अपने अपने देश के राष्ट्रीय ध्वज को एक साथ बेहद अचंभित करने वाले अंदाज में उतारते हैं. सबसे आखिर में, जवान कभी बेहद सरलता से तो कभी बेहद गुस्से से एक-दूसरे को देखते हुए हाथ मिलाते हैं. इसके बाद दोनों देशों के दरवाजे बंद हो जाते हैं. कुछ इसी तर्ज पर जम्मू कश्मीर के ऑक्ट्राय की सेरेमनी में दोनों देश के जवान अपना जलवा बिखरेंगे.

खास जूते

बीटिंग रिट्रीट में होने वाले मार्च के दौरान जूते पटकने की परंपरा के चलते जवानों को खासी दिक्कतें उठानी पड़ती है. मार्च करने वाले बीएसएफ के जवानों ने शिकायत की थी कि उन्हें घुटनों में दर्द और कमर से जुड़ी कई परेशानियों से दो-चार होना पड़ता है. इसके लिए भारत सरकार और बीएसएफ़ ने जवानों को विशेष जूते मुहैया कराए हैं. इन खास तरीके के जूतों से BSF जवान जब बीटिंग रिट्रीट में पैर पटकते हैं तो उनके घुटनों में दर्द नहीं होता है. इसके चलते जवानों में और ज्यादा जोशोखरोश बढ़ जाता है.

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