सिर्फ गैरकांग्रेसी राज में ही क्यों इजरायल से बढ़ती है दोस्ती?

एनडीए शासनकाल में इजराइल के साथ संबंधों ने हमेशा नई करवट ली है, हालांकि आजादी के बाद भारत इस रिश्ते को लेकर हिचकिचाहट दिखाता रहा, लेकिन नरेंद्र मोदी के युग में यह हिचकिचाहट भी खत्म हो गई है.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बेंजामिन नेतन्याहू
सुरेंद्र कुमार वर्मा
  • नई दिल्ली,
  • 16 जनवरी 2018,
  • अपडेटेड 1:54 PM IST

भारत में नरेंद्र मोदी के युग में इजराइल के साथ रिश्तों की नई गाथा लिखी जा रही है. हालांकि यह भी सही है कि इजराइल के साथ भारत का रिश्ता कांग्रेस काल के बजाए गैरकांग्रेसी राज में हमेशा सुधरता रहा है.

दोनों देशों के संबंधों को लेकर हमेशा से कहा जाता रहा है कि इनके बीच गोपनीय प्रेम संबंध हैं. लेकिन मोदी के सत्ता में आने के बाद यह प्रेम संबंध खुलकर सामने आ गया है. कुछ ही महीनों के अंतराल में दोनों देशों के शीर्ष नेता एक-दूसरे देश का दौरा कर चुके हैं. दोनों देशों के बीच रक्षा सौदों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.

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ऐसा नहीं है कि कांग्रेसराज में इजराइल के साथ दोस्ती नहीं थी, लेकिन उस दौर में संबंध गोपनीय ही रहा है. शुरुआत जवाहर लाल नेहरू युग से करें तो नेहरू की विदेश नीति में दुनिया की एकता और अहिंसा के सिद्धांत को प्रमुखता दी गई थी. और इस आधार पर भारत फलस्तीन का खुलकर समर्थन करता रहा. हालांकि 1948 में आजाद घोषित करने के बाद इजराइल को भारत ने 1950 में एक स्टेट के रूप में अपनी मान्यता दी.

शीत युद्ध के शुरुआती दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1955 के बांडुंग सम्मेलन में इजराइल को निमंत्रित करने पर विचार किया लेकिन बाद में उन्होंने इरादा बदल लिया था. लेकिन 90 के दशक में शीत युद्ध खत्म होने के बाद दुनिया की परिस्थितियां और भारत की जरूरतें बदलीं. फिर भारत ने इजराइल से सैन्य संबंध बढ़ाना शुरू कर दिया.

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आजादी के बाद भारत में ज्यादातर वक्त तो कांग्रेस का ही शासन रहा, और इस दौर में अरब के देशों के साथ संबंध काफी अच्छे रहे. उन्हें नाराज नहीं करने के कारण भारत कभी भी इजराइल के साथ खुलकर आगे नहीं आ सका. अरब देशों को नाराज नहीं करने के पीछे अहम कारणों में वहां बड़ी संख्या में भारतीयों का काम करना भी था. बदलते वक्त में देश की जरूरतें बदलीं और केंद्र में कांग्रेस राज के अलावा अन्य पार्टियों ने सत्ता का स्वाद चखा, दोस्ती के नए आयाम भी बदले.

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कांग्रेस की तुलना में गैरकांग्रेसी राज में यह दोस्ती लगातार आगे बढ़ी. खासकर भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए शासनकाल में. पहले अटल बिहारी वाजपेयी और अब नरेंद्र मोदी ने इस रिश्ते को आगे बढ़ाया है. एक नजर डालते हैं दोनों देशों के रिश्तों के अब तक के सफर पर...

1948 में स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में ऐलान करने के बाद इजराइल को भारत ने 2 साल बाद 1950 में अपनी मान्यता दी.

इजराइल के साथ रिश्तों की शुरुआत 1960 के दशक से ही हो गई थी. उसने 1962, 1965 और 1971 के युद्ध में भारत को सैन्य मदद की. खुफिया एजेंसी रॉ के गठन पर सहयोग भी दिया.

1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के बाद बांग्लादेश को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने वाला इजराइल दुनिया का पहला देश था.

अगस्त 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के काल में इजराइली विदेश मंत्री ने भारत का गोपनीय दौरा किया. यह उसकी ओर से भारत का पहला बड़ा राजनीतिक दौरा था. इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में गरमाहट आई.

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने पिता पंडित नेहरू की राह अपनाई और विदेश नीति में इजराइल की जगह फलस्तीन के करीबी बनी रहीं.

1985 में तत्कालीन भारतीय पीएम राजीव गांधी ने संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक आम सभा में इजराइली प्रधानमंत्री से मुलाकात की. जो किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की इजराइली समकक्ष से यह पहली मुलाकात थी.

1992 में नरसिम्हा राव के काल में भारत ने इजराइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए. हालांकि इस संबंध ने कोई खास मुकाम हासिल नहीं किया.

1997 में इजराइली राष्ट्रपति एजर वेजमैन ने भारत का दौरा किया. इस समय देश में मिली-जुली सरकार का दौर था. कांग्रेस सत्ता से बाहर थी.

2000 में पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी के काल में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी एक शीर्ष मंत्री के रूप में इजराइल के दौरे पर गए. उसी साल आतंकवाद पर दोनों देशों ने आतंकवाद पर एक जॉइंट वर्किंग ग्रुप भी बनाया.

2000 के अंत में बतौर विदेश मंत्री जसवंत सिंह इजराइल के दौरे पर जाने वाले देश के पहले मंत्री बने.

2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में तत्कालीन इजराइली प्रधानमंत्री एरियल शेरॉन भारत के दौरे पर आए. वह भारत आने वाले इजराइल के पहले प्रधानमंत्री बने.

2006 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए इजराइल का दौरा कर चुके हैं. इसी साल की शुरुआत में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार में मंत्री रहे शरद पवार, कपिल सिब्बल और कमलनाथ ने इजराइल का दौरा किया.

2012 में यूपीए के विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने इजराइल के दौरा किया. जिसे इजराइली पीएम ने दोनों देशों के बीच रिश्तों को नया आयाम देने वाला बताया.

नरेंद्र मोदी के काल में इस दोस्ती ने कई आयाम स्थापित किए. मोदी के साढ़े 3 साल के कार्यकाल में दोनों देशों के शीर्ष नेताओं ने एक-दूसरे देश में कई दौरे किए हैं. खास बात यह है कि इजराइल के साथ बढ़ते संबंध के बावजूद मोदी सरकार ने अरब देशों के साथ भी अच्छे संबंध बनाए रखे हैं. इजराइल के साथ-साथ मोदी कई अरब देशों की यात्रा कर चुके हैं.

13 से 15 अक्टूबर 2015 तक भारतीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इजराइल का दौरा किया. बतौर राष्ट्रपति वह इजराइल जाने वाले पहले भारतीय राष्ट्रपति बने.

पिछले साल दिसंबर में इजराइली राष्ट्रपति रुववेन रिवलिन ने 6 दिन का भारतीय दौरा किया. वह भारत आने वाले इजराइल के दूसरे राष्ट्रपति थे.

पिछले साल जुलाई में नरेंद्र मोदी ने इजराइल का दौरा किया. राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद इजराइल जाने वाले वह भारत के पहले प्रधानमंत्री बने.

अब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू 6 दिवसीय भारत के दौरे पर हैं. 2003 के बाद भारत आने वाले वह दूसरे इजराइली प्रधानमंत्री हैं.

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