पटरी से ट्रेन उतरने की घटनाओं के पीछे सबसे बड़ी वजह होती है रेल पटरी में दरार आना या इसमें टूट-फूट होना, देशभर में रेल पटरियों की सलामती का पता लगाने का जिम्मा गैंगमैन पर है जो हर एक पटरी को खुद पैदल चलकर जांचता है लेकिन इसमें मानवीय भूल रह जाना एक आम बात है. देशभर में फैली हुई हजारों-हजार किलोमीटर लंबी रेल पटरियों को ऑटोमेटिक तरीके से जांच-परख पाने के लिए भारतीय रेलवे इस समय दक्षिण अफ्रीका के अल्ट्रासोनिक ब्रोकन रेल डिटेक्शन सिस्टम ट्रायल कर रही है.
अल्ट्रासोनिक ब्रोकन रेल डिटेक्शन सिस्टम दक्षिण अफ्रीका के रक्षा विभाग द्वारा तैयार की गई वह तकनीक है जिसमें अल्ट्रासोनिक तरंगों का इस्तेमाल करके रेल पटरियों के फ्रैक्चर को समय रहते जाना जा सकता है. इस तकनीक
का परीक्षण इस समय उत्तर रेलवे में मुरादाबाद-सहारनपुर रेल सेक्शन पर रुड़की स्टेशन और हिंडन केबिन के बीच में किया जा रहा है. इसी तरह इस तकनीक का दूसरा परीक्षण इलाहाबाद-कानपुर रेल सेक्शन के बीच में बमरौल और
भरवारी के बीच में किया जा रहा है. मुरादाबाद-सहारनपुर रेल सेक्शन पर के जरिए रेल पटरी में 6 जगह पर रेल फ्रेक्चर होने से पहले ही उनको ठीक कर लिया गया. रेलवे के आला अफसरों
के मुताबिक अभी तक यह तकनीक कारगर होती हुई दिख रही है लेकिन अभी इसका अगले दो महीने तक लगातार परीक्षण किया जाएगा, उसके बाद आरडीएसओ इस तकनीक के बारे में अपनी रिपोर्ट रेल बोर्ड को देगा.
ऐसे करता है काम
अल्ट्रासोनिक ब्रोकन रेल डिटेक्शन सिस्टम में अल्ट्रासोनिक तरंगों की गाइडेड तरंग इस्तेमाल की जाती है, इस तकनीक में 1 किलोमीटर लंबी रेल की पटरी में जोड़ों के आसपास अल्ट्रासाउंड तरंगों का इस्तेमाल करके हर मिनट पर रेल
पटरी की सलामती चेक की जाती है जैसे ही पटरी में टूट-फूट की संभावना दिखती है तो सिस्टम का अलार्म इसको संबंधित रेल डिपार्टमेंट को चला जाता है. इस सिस्टम में रेल पटरियों के बीच में एक तरफ रिसीवर लगाए जाते हैं तो
दूसरी तरफ ट्रांसमीटर लगाए जाते हैं रिसीवर और ट्रांसमीटर आपस में एक दूसरे से संपर्क बनाए रखते हैं. का विश्लेषण एक ऑटोमेटिक कंप्यूटर सिस्टम करता रहता है, इसमें जैसे ही कोई व्यवधान नजर आता है
यह सूचना ऑटोमेटिक तरीके से सिस्टम में चली जाती है इसके बाद सिस्टम अलार्म जारी कर देता है.
मेक इन इंडिया के तहत होगा निर्माण
रेल बोर्ड के एक अधिकारी के मुताबिक अल्ट्रासोनिक ब्रोकन रेल डिटेक्शन सिस्टम की कीमत 1500000 रुपये प्रति किलोमीटर आएगी. लेकिन जब इस तकनीक को के जरिए भारत में बनाया जाएगा तो यह कीमत
गिरकर 400000 से 500000 रुपए प्रति किलो मीटर तक आ जाएगी, हाल ही में रेल पटरियों से ट्रेन के उतरने की घटनाओं में हुए इजाफे के बाद रेल मंत्रालय पटरियों में हुई टूट-फूट और आई दरारों को जानने के लिए ऑटोमेटिक
सिस्टम लाने के लिए मन बना चुका है. अब सारा दारोमदार इस तरह के सिस्टम के सफल ट्रायल पर निर्भर करेगा.
सिद्धार्थ तिवारी