न्याय प्रक्रिया की स्थिति पर PM के सामने भावुक हुए CJI, कहा- सब कुछ जजों के माथे मढ़ना ठीक नहीं

हाल ही में बंगलुरु की एक रिसर्च एजेंसी दक्ष ने जो सर्वे किया उसके नतीजे चौंकाने वाले और न्याय व्यवस्था की दयनीय स्तिथि को दर्शाते हैं. सर्वे के मुताबिक पटना हाई कोर्ट में एक मामले को सुनने में औसतन 2 मिनट का समय ही एक जज दे पाता है.

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अदालतों में जजों की भारी कमी अदालतों में जजों की भारी कमी

रोहिणी स्‍वामी

  • नई दिल्ली,
  • 01 मई 2016,
  • अपडेटेड 8:44 AM IST

हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीशों और मुख्यमंत्रियों के साझा सम्मलेन में देश के मुख्य न्यायधीश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में बेहद भावुक हो गए. उनकी पीड़ा है कि अदालतों में लंबित मामलों के लिए सारी जिम्मेदारी जजों के माथे मढ़ना ठीक नहीं है.

समझा जा रहा है कि सरकार भी इसके लिए जिम्मेदार है, क्योंकि 30 साल पहले विधि आयोग ने कहा था कि प्रति 10 लाख लोगों पर 50 न्यायधीश होने चाहिए जो मौजूदा समय में भी प्रति 10 लाख लोगों पर 10 ही है. देश में करीब 3 करोड़ मामले लंबित हैं.

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निचली अदालत से ऊपरी अदालत तक एक केस 13 साल का वक्त
हाल ही बंगलुरु की एक रिसर्च एजेंसी दक्ष ने जो सर्वे किया उसके नतीजे चौंकाने वाले और न्याय व्यवस्था की दयनीय स्तिथि को दर्शाते हैं. सर्वे के मुताबिक पटना हाई कोर्ट में एक मामले को सुनने में औसतन 2 मिनट का समय ही एक जज दे पाता है. औसतन 20 से 150 मामले एक दिन में हाई कोर्ट का एक जज सुनता है. हाई कोर्ट में कम से कम औसतन 3 साल किसी मामले के निपटारे में लगता है.

निचली अदालत में औसतन किसी मामले को निपटारे में 6 साल लग जाता है. निचली अदालत से होकर सुप्रीम कोर्ट तक किसी मामले के निपटारे में औसतन 13 साल तक लग जाते हैं. एक याचिकाकर्ता के एक दिन में अदालत में औसतन 519 रुपये खर्च होते हैं और सालभर में औसतन 30 हजार रुपये खर्च करता है.

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केस दर्ज कराने के आंकड़े भी बढ़े
अदालतों में लंबित मामलों की एक बड़ी वजह जजों की काम संख्या तो है ही लेकिन जानकार मानते हैं कि लोगों में अपने अधिकारों को लेकर बढ़ती समझ भी इसकी एक बड़ी वजह है. मुकदमे ज्यादा दायर हो रहे हैं क्योंकि लोगों में जागरुकता बढ़ी है. देश के मशहूर कानूनविद सोली सोराबजी मानते हैं कि जजों की संख्या फौरन बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि उनपर दबाव बहुत ज्यादा है. लेकिन जो जज नियुक्त हों वो काबिल हों.

इसके अलावा बड़ी अदालतों, खास तौर पर सुप्रीम कोर्ट को महज एक अपील कोर्ट के तौर पर काम न करने के बजाय सिर्फ महत्वपूर्ण मामलों पर ही सुनवाई करनी चाहिए. जानकार मानते हैं कि अदालतों में लंबित मामलों में बड़ी संख्या ऐसी है जिनमें सरकार पार्टी है यानी सरकारी मुकदमों की संख्या बहुत ज्यादा है. कुछ पूर्व न्यायधीश मानते हैं कि लोगों में ये गलत धरना है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज छुट्टी बहुत लेते हैं. कुछ जज जरूर धीरे या कम काम करते हैं लेकिन हकीकत ये है कि छुट्टी में भी ज्यादातर जजों को अगले दिन सुने जाने वाले मामलों की फाइल पढ़ना पड़ता है.

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