इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए चंदा उगाही और राजनीतिक दलों की फंडिंग की पारदर्शिता को लेकर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. केंद्र सरकार के रुख का विरोध करते हुए, चुनाव आयोग (EC) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि इलेक्टोरल बॉन्ड की योजना राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता को प्रभावित करेगी. सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि उसने केंद्र को पत्र लिखकर कहा है कि राजनीतिक चंदे से जुड़े कई कानूनों में बदलाव के पारदर्शिता पर गंभीर परिणाम होंगे.
आयेाग ने कहा कि एफसीआरए 2010 कानून में बदलाव से राजनीतिक दल बिना जांच वाला विदेशी चंदा प्राप्त करेंगे जिससे भारतीय नीतियां विदेशी कंपनियों से प्रभावित हो सकती हैं.
सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करने वाले चुनाव आयोग ने कहा कि 26 मई 2017 को उसने विधि एवं न्याय मंत्रालय को पत्र लिखकर अपने इस नजरिए से अवगत कराया था कि आयकर कानून, जनप्रतिनिधित्व कानून और वित्त कानून में बदलाव राजनीतिक दलों को चंदे में पारदर्शिता के खिलाफ होंगे.
हलफनामे में कहा गया है कि कानून एवं न्याय मंत्रालय को सूचित किया गया है कि ऐसी स्थिति में इलेक्टोरल बॉन्ड के माध्यम से प्राप्त धन को रिपोर्ट नहीं किया जा सकता है. ऐसे में यह जानकारी प्राप्त करना मुश्किल होगा कि क्या रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट की धारा 29बी के तहत कानून उल्लंघन हुआ है या नहीं. इस धारा के तहत सरकार कंपनी या विदेशी स्रोत से राजनीतिक पार्टियां धन प्राप्त नहीं कर सकती हैं.
बता दें कि चुनावी फंडिंग व्यवस्था में सुधार के लिए सरकार ने पिछले साल इलेक्टोरल बॉन्ड की शुरुआत की. सरकार ने इस दावे के साथ इस बॉन्ड की शुरुआत की थी कि इससे राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ेगी और साफ-सुथरा धन आएगा. लेकिन हुआ इसका उल्टा है. इस बॉन्ड ने पारदर्शिता लाने की जगह जोखिम और बढ़ा दिया है, यही नहीं विदेशी स्रोतों से भी चंदा आने की गुंजाइश हो गई है.
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